हम अपने बुज़ुर्गान ए दीन की सीरत पढ़ते हैं उनकी ज़िन्दगी का मुताला करते हैं तो हमें यह मालूम होता है यह पता चलता है के हमारे बुज़ूर्गान जो भी अमल करते वह अल्लाह के लिए करते, अल्लाह की रज़ा हासिल करना मकसद होता, उनके आमाल में इखलास होता, लोगों को दिखाने के लिए नहीं करते थे। बल्कि अल्लाह की रज़ा और उसकी खुशनूदी हासिल करने के लिए करते थे।
हज़रत ज़ैनुल आबिदीन का वाकिया
मिसालें बहुत हैं में यहाँ पर एक मिसाल हज़रत ज़ैनुल आबिदीन रज़ीअल्लाहु अन्हु की देना चाहता हूँ जिससे हमें यह मालूम हो जाएगा के हमारे बुजुर्ग जो भी काम करते थे अल्लाह की रज़ा के लिए करते थे लोगों को दिखाने के लिए नहीं करते थे। वाकिया यूँ है के मदीना मुनव्वरा में सौ से ज़ियादा घर ऐसे थे जो गरीब थे, उनको हर महीने राशन मिला करता था, लेकिन उन घर वालों को यह भी मालूम नहीं था के वह कौन है जो यह राशन दे जाता है। इस तरह से उन मुसतहिक़ लोगों का महीने का खर्चा चला करता था।
जब हज़रत ज़ैनुल आबिदीन रज़ीअल्लाहु अन्हु का विसाल हुआ और आपको गुस्ल देने लगे तो देखा गया के आपकी पुष्त मुबारक और कन्धों पर बोझ उठाने के निशानात हैं तो मालूम हुआ के जो गरीबों और मिसकीनों के यहाँ हर महीने पाबन्दी के साथ राशन पहुँचता था वह कोई और नहीं बल्कि हज़रत ज़ैनुल आबिदीन खुद अपनी पीठ पर राशन की बोरियां लादकर रात की तारीकी में गरीबों के दरवाज़े पर रख दिया करते थे। (हवाला, अल्बिदाया वन्निहाया, जिल्द, 9 सफा, 105)
गौर करें हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन के इस अमल पर के गरीबों की इस तरह मदद फरमा रहें हैं के घर वालों को भी मालूम नहीं होता था के हमारी मदद करने वाला कौन है। तो मालूम हुआ के हमारे बुज़ुर्गान जो भी अमल करते जो काम करते वह लोगों को दिखाने के लिए नहीं करते थे बल्कि अल्लाह तअला की रज़ा के लिए करते थे।
आज अमल में इख्लास नहीं रहा
आज जब हम मुआशरे में नज़र डालते हैं लोगों को देखते हैं तो दिखावा नज़र आता है, अगर किसी ने सदक़ा किया किसी की मदद की तो उसकी विडियो बना लेता है उमरा किया तो घर से रुखसत होने से लेकर वापस घर पहुँचने तक हर मंज़र की विडियो ग्राफी और तस्वीर फिर इन सब कामों की विडियो और तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया जाता है। अब यहाँ सवाल यह है के हम जो नेक काम कर रहे हैं तो हमारे दिल में नियत क्या है क्या हम यह सारे काम लोगों को दिखाने के लिए कर रहे हैं या अल्लाह तआला की रज़ा के लिए कर रहे हैं?
अपने हर काम अल्लाह तआला की रज़ा के लिए करें, अपने आमाल में इखलास पैदा करें दिखावा से बचें, आमाल ए सालेहा के अज्र व सवाब को ज़ाया होने से बचाएं।
दिखावा जो करते हैं
अल्लाह तआला फरमाता है: فَوَیْلٌ لِّلْمُصَلِّیْن الَّذِیْنَ هُمْ عَنْ صَلَاتِهِمْ سَاهُوْن الَّذِیْنَ هُمْ یُرَآءُوْنَ तर्जुमा उन नमाज़ियों के लिए खराबी है जो अपनी नमाज़ से गाफिल हैं वह जो दिखावा करते हैं। (सूरह अल माऊन आयत 4, 5, 6)।
नियत की अहमियत
आक़ा ए दो जहां सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद मुबारक है: اِنَّمَا الْاَعْمَالُ بِالنِّیَّاتْ यानी आमाल का दारो मदार नियतों पर है (हवाला, सही बुखारी शरीफ) अगर किसी नेक काम के करने पर नियत अल्लाह तआला की रज़ा हासिल करने की है तो इस में अज्र व सवाब है और अगर उसी नेक काम करने पर नियत दिखावे की है तो अज्र व सवाब से महरूमी है और अज़ाब भी है। इसको एक मिसाल से और समझें के दो शख्स हैं और दोनों ही ने एक नेक काम किया यानि किसी गरीब को खाना खिलाया या किसी गरीब की मदद की, उन दोनों लोगों में से एक ने गरीब को खाना खिलाया या मदद की ताकि उसके इस काम से अल्लाह तआला राज़ी हो जाए, वहीँ दुसरे शख्स ने गरीब को खाना खिलाया या उसकी मदद की और नियत यह थी के लोग उसे बड़ा कहेंगे सेठ सखी कहेंगे, काम और अमल दोनों के एक जैसे हैं लेकिन दोनों की नियत मैं फर्क था, तो जिसकी नियत अल्लाह तआला की रज़ा हासिल करना था उसे इस काम पर सवाब मिलेगा और जिसकी नियत दिखावे की थी वह सवाब से महरूम रहेगा।
सोशल मीडिया और हम
अगर आप किसी यतीम बे सहारा गरीब की मदद करते हैं और आपको कोई नहीं देख रहा है आपकी कोई तारीफ नहीं कर रहा है आपकी पोस्ट में कोई लाइक और कमेंट्स नहीं कर रहा है तो ऐसी सूरत में आप गरीबों की मदद करना जारी रखेंगे या नहीं? अगर इसका जवाब है के हम मदद करते रहेंगे तो अल्लाह तआला का शुक्र अदा कीजिए। और अगर दिल में यह बात आए के लोग मेरी तारीफ करें मुझे बड़ा आदमी कहें तो फिर अपनी नियत को दुरुस्त कीजिए अपनी नियत की इस्लाह कीजिए।
आखरी बात खातीमा
हमको चाहिए के हम लाइक कमेंट्स और व्यू के चक्कर में ना रहें बल्कि अल्लाह तआला की रज़ा हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए हमारी एक नेकी जो अल्लाह तआला की रज़ा के लिए की हुई होगी तो वही नेकी इंशा अल्लाह तआला हमारे लिए निजात का ज़रिया बन जाएगी।
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