नमाज़ के बाद ज़िक्र व दुरूद, अहले सुन्नत व जमाअत नमाज़ के बाद तीन मर्तबा बुलंद आवाज़ से कलिमा शरीफ पढ़ते हैं, फिर मुख़्तसर दुआ मांगकर सुन्नतें पढ़ते हैं, सुन्नतों के बाद दुरूद ओ सलाम पढ़ते हैं, और आखिर में दुआ मांगते हैं, इस तरह करना मुस्तहब अमल है।
जिन फर्ज़ों के बाद सुन्नतें हों, उसमें तवील लम्बे वज़ीफे नहीं पढ़ने चाहिए, बल्के मुख़्तसर ज़िक्र व दुआ पढ़कर सुन्नतें व नवाफिल पढ़कर वज़ीफे पढ़ें जाएँ।
नमाज़ के बाद ज़िक्र करना हदीस से साबित है
वहाबी हज़रात कहते हैं के नमाज़ के बाद कलिमा व दुरूद शरीफ पढ़ना, हाथ उठाकर दुआ करना, फिर हाथ मुंह पर फेरना बिदअत है, जब के नमाज़ के बाद ज़िक्र करना अहादीस से साबित है। मुस्लिम शरीफ में हज़रत आएशा सिद्दीक़ा रज़ीअल्लाहू तआला अन्हा से रिवायत है: हुज़ूर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब नमाज़ से सलाम फेरते तो, न बैठते मगर "अल्लाहुम्मा अन्तस्सलामु व मिन्कस्सलामु तबारकता या ज़ल जलाली वल इकराम की मिकदार पढ़ लेते। (सहीह मुस्लिम)
नमाज़ फ़र्ज़ के बाद बुलंद आवाज़ से ज़िक्र की दलील
सहीह बुखारी की हदीस है: हज़रत इब्ने अब्बास रज़ी अल्लाहू अन्हु से मर्वी है, आप रज़ी अल्लाहु अन्हु फरमाते हैं, में रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नमाज़ खत्म होना तकबीर से पहचानता था। (सहीह बुखारी)
इमाम नववी रहमतुल्लाही अलैहि: इस हदीस शरीफ की शरह में फरमाते हैं, यह हदीस उन बाज़ असलाफ की दलील है, जिन्होंने फरमाया के फ़र्ज़ नमाज़ के बाद बुलंद आवाज़ से तकबीर व ज़िक्र करना मुस्तहब है (शरह सहीह मुस्लिम)
इस हदीस की शरह में हज़रत हकीम उल उम्मत मुफ़्ती अहमद यार खान नईमी रहमतुल्लाहि अलैहि मिरआतुल मनाजीह में फरमाते हैं: यानी में (हज़रत इब्ने अब्बास रज़ी अल्लाहु अन्हु) ज़माना ए नब्वी में बहुत कम उम्र था, इसलिए कभी-कभी जमाअत में हाज़िर न होता, मगर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और तमाम सहाबा-ए-किराम अलैहिमुर्रिज़वान नमाज़ के बाद इतनी बुलंद आवाज़ से तकबीरें कहते थे, के घरों में आवाज़ पहुँच जाती थी, और हम पहचान लिया करते थे के नमाज़ खत्म हो गई।
मज़ीद फरमाते हैं बाज़ मशाइख हर नमाज़ के बाद बुलंद आवाज़ से, तीन बार कलिमा तय्यिबा पढ़ते हैं। पंजाब में फज्र और इशा के बाद ऊँची आवाज़ से दुरूद शरीफ पढ़ा जाता है, इन सब का माअख्ज़ यही हदीस है। बल्के मुस्लिम शरीफ में है के, नमाज़ों के बाद ज़िक्र बिलजहर यानी बुलंद आवाज़ के साथ हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा-ए-किराम अलैहिमुर्ररिज़वान के अहद में आम मुरव्वज था। (मिरआतुल मनाजीह शरह मिश्कातुल मसाबीह)
नमाज़ के बाद कलिमा तय्यिबा पढ़ने की फ़ज़ीलत
नमाज़ के बाद कलिमा तय्यिबा का जो ज़िक्र किया जाता है, उसकी बहुत फ़ज़ीलत है। हदीस पाक में है के, नमाज़ के बाद तीन मर्तबा ला इलाहा इल्लल्लाह पढ़ने पर तीन नूर अता किए जाएँगे, एक कब्र में, एक हश्र में, एक पुल सिरात पर, यहाँ तक के उसे जन्नत में दाखिल कर दे।
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शारेह बुखारी इमाम इब्ने रजब रहमतुल्लाहि अलैहि नक़ल करते हैं: हज़रत इब्ने उमर रज़ी अल्लाहु अन्हु से रिवायत है के, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, जो शख्स नमाज़ों के बाद और अपने बिस्तर पर जाते वक़्त "अल्लाहु अकबर और ला इलाहा इल्लल्लाह" तीन-तीन मर्तबा पढ़े, उसके लिए कब्र में नूर होगा, हश्र में नूर होगा, और पुल सिरात पर नूर होगा, यहाँ तक के वह जन्नत में दाखिल हो जाएगा। (फ़तहुल बारी ली इब्ने रजब)।
दुआ की कुबूलियत फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद
फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद हाथ उठाकर दुआ करना बिल्कुल जाइज़ है, और हदीस पाक में तो फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद दुआ करने वालों को, मकबूलियत की बशारत अता फरमाई गई है। चुनांचे जामे तिर्मिज़ी शरीफ की बसनद हसन हदीस पाक में आता है: हज़रत अबू उमामा रज़ी अल्लाहु अन्हु बयान फरमाते हैं के, अर्ज़ किया गया के, या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम: कौनसी दुआ ज़्यादा मकबूल होती है? तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, आधी रात और फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद मांगी जाने वाली दुआ। (जामे तिर्मिज़ी)।
हाथ उठाकर दुआ करना और चहरे पर हाथ फेरना
दोनों हाथ उठाकर दुआ मांगना और चेहरे पर फेर लेना, दुआ के आदाब में से है। जैसा के हदीस शरीफ में हज़रत इब्ने अब्बास रज़ी अल्लाहु अन्हु से यह कलीमात मर्फूअन मर्वी हैं: "तुम अल्लाह तआला से हथेलियों के पेटों से सुवाल करो, और उनकी पीठों से सुवाल न करो। यानी (सीधे हाथ उठाकर सुवाल करो) और जब फारिग हो जाओ तो हाथों को अपने चेहरे पर फेर लो"। (सुनन अबू दाऊद)।
बुलंद आवाज़ से ज़िक्र पर एतराज़ और उनके जवाब
ज़्यादा बुलंद आवाज़ से ज़िक्र न किया जाए के नमाज़ियों की नमाज़ में खलल वाक़े हो, बाज़ लोग इसी पर एतराज़ करते हैं, के लोगों की नमाज़ में खलल वाक़े होता है, इसलिए जाइज़ नहीं, जब्के इस क़दर ज़िक्र करने से नमाज़ियों की नमाज़ में खलल वाक़े नहीं होता है।
अय्यामे तशरीक की तकबीरों से दलील
अगर यह नाजाइज़ होता तो शरीअत कभी भी, अय्यामे तशरीक में हर नमाज़ के बाद बुलंद आवाज़ से तकबीरें कहने की इजाज़त न देती। तो जब अय्यामे तशरीक में बुलंद आवाज़ से तकबीरें कहना नाजाइज़ नहीं, तो कलिमा शरीफ पढ़ना क्यूँ नाजाइज़ है?
खुलासा ए कलाम
अहले सुन्नत व जमाअत का नमाज़ के बाद कलिमा तय्यिबा पढ़ना, ज़िक्र करना, दुरूद शरीफ पढ़ना, हाथ उठाकर दुआ मांगना, और बाद में हाथ चेहरे पर फेरना, बहुत सी अहादीस, और अक़वाल-ए-अइम्मा से साबित है। फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद मुख़्तसर ज़िक्र व दुआ करना, फिर सुन्नतें और नवाफिल अदा करना, और उसके बाद वज़ाइफ पढ़ना मुस्तहब तरीक़ा है। साथ में यह भी ज़रूरी है के, ज़िक्र में इतनी बुलंदी न हो के दूसरों की नमाज़ या इबादत में खलल पैदा हो।
अल्लाह तलाआ हमें सुन्नते नब्वी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर अमल करने की तौफीक अता फरमाए, और ज़िक्र व दुआ की बरकतें नसीब फरमाए।
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