Kya Aap Jaante Hain Bimar Pursi Ke Fayde | मरीज़ की अयादत सुन्नत भी इबादत भी

अयादत मरीज़ महज़ इख़्तियारी अम्र नहीं बल्कि एक मुसलमान का दूसरे मुसलमान पर हक़ होने की वजह से दीनी तक़ाज़ा है

मरीज़ की इयादत और देखभाल करना मुसलमान के हुक़ूक़ में से है ख़्वाह मुसलमान नेक हो या फ़ासिक व गुनाहगार। मामूली बीमारी में इयादत करना सुन्नत है और शदीद बीमारी में जब कोई दूसरा न करे तो फ़र्ज़ है कभी फ़र्ज़ ए ऐन और कभी फ़र्ज़ ए किफ़ाया। बीमार की इयादत सबसे पहले तो क़रीबी रिश्तेदारों या गिर्द ओ पेश में रहने वालों की ज़िम्मेदारी है अगर ये लोग न हों या इस क़ाबिल न हों कि इयादत कर सकें तो मुआशरे के दीगर अफ़राद की ज़िम्मेदारी है कि यह फ़र्ज़ निभाएँ अगर पूरा मुआशरा ही इससे ग़ाफ़िल हो जाए तो सब ही मुजरिम क़रार पाएँगे।

अयादत मरीज़ एक मुसलमान का हक़

अयादत मरीज़ महज़ इख़्तियारी अम्र नहीं बल्कि एक मुसलमान का दूसरे मुसलमान पर हक़ होने की वजह से दीनी तक़ाज़ा है हुज़ूर नूर ए मुजस्सम सल्लल्लाहु अलैहि वासल्ल्लम ने इरशाद फ़रमाया मुसलमान के मुसलमान पर पाँच हक़ हैं सलाम का जवाब देना बिमार की अयादत करना जनाज़ों के साथ जाना दावत क़बूल करना और छींक का जवाब देना एक और हदीस पाक में है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया भूकों को खिलाओ बिमारों की बिमार पुरसी करो और क़ैदियों को छुड़ाओ इन अहादीस से मालूम हुआ कि बिमार की अयादत मुसलमानों की आपसी हमदर्दी मुहब्बत और हुक़ूक़ की अदायगी का अहम हिस्सा है। 

फ़रिश्ते दुआ करते हैं

आदमी की अगर यह नियत हो के में बीमार का हाल चाल और बीमार की मिज़ाज पुरसी से अल्लाह तआला मुझसे राज़ी हो जाए उसकी खुशनूदी हासिल हो जाए उसकी रज़ा हासिल हो जाए अगर यह नियत हो बीमार पुरसी करने वाले की तो अयादत करने वाले के हक में नूरी मखलूक यानी फ़रिश्ते दुआएं करते हैं और उसे जन्नत की खुशखबरी दी जाती है।

इयादत एक आज़ीम इबादत और जन्नत में जाने का ज़रिया

मरीज़ की इयादत बड़ी फ़ज़ीलत वाली और आला दर्जे की इबादत है यह इंसानी हमदर्दी का अमल है जो हर इंसान में फ़ितरी तौर पर मौजूद होता है बीमार पुरसी का सवाब और बदला जन्नत है हज़रत सवाबान रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं सरकार ए अक़दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया मुसलमान जब अपने भाई की इयादत करता है तो जब तक लौट नहीं आता जन्नत में होता है। (मुस्लिम)

हज़रत अबू हुरैरा से रिवायत है आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया क़यामत के दिन अल्लाह तआला फरमाएगा ऐ इंसान! मैं बीमार हुआ तूने मेरी मिज़ाज पुर्सी न की बंदा कहेगा इलाही मैं तेरी इयादत कैसे करता तू तो सारे जहानों का पालने वाला है अल्लाह तआला फरमाएगा क्या तुझे मालूम नहीं था कि मेरा फलाँ बंदा बीमार है मगर तूने उसकी इयादत न की क्या तुझे मालूम नहीं कि अगर तू उसकी इयादत करता तो मुझे उसके पास पाता। (मुस्लिम)

हुज़ूर की सुन्नत मुबारका

इयादत की फ़ज़ीलत इससे बढ़कर और क्या होगी कि यह हुज़ूर सरवर ए कौनैन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत मुबारका है हज़रत सैदना उस्मान ए गनी बयान करते हैं आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमारे मरीज़ों की इयादत फरमाते हमारे मरने वालों के जनाज़ों में शरीक होते और ग़ुर्बत हो या ख़ुशहाली हर हालत में हमारी ग़मख़्वारी फरमाया करते। (मुस्नद अहमद)

मरीज़ की इयादत के मामूल  में यह इम्तियाज़ नहीं था कि कोई मुआशरे का मुअज्ज़ज़ और साहिब ए रुत्बा फ़र्द है या कमज़ोर और तंगदस्त आदमी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मिस्कीनों और ख़स्ता हाल लोगों की भी अयादत फ़रमाया करते थे और उनसे उनका हाल पूछा करते थे मामूली बीमारी में भी अयादत करना आपके मामूलात में शामिल था आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मसाकीन और ख़स्ता हाल लोगों की भी इयादत फरमाया करते। 

ग़ैर मुस्लिम की अयादत

यहाँ तक कि एक यहूदी लड़के की इयादत फरमाई जो आपकी खिदमत करता था उसकी बीमार पुरसी के बारे में  हज़रत अनस रज़ीअल्लाहु अन्हु बयान करते हैं एक यहूदी लड़का जो अपनी ख़ुशी से आपकी ख़िदमत किया करता था जब बिमार हुआ तो नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसकी अयादत के लिए तशरीफ़ ले गए और उसके सिरहाने तशरीफ़ फ़रमा हुए अयादत के दौरान उसे इस्लाम की दावत दी लड़का पास बेठे हुए अपने बाप की तरफ देखने  लगा  बाप बोला बेटा अबुल कासिम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बात मान लो चुनांचे वह मुसलमान हो गया। 

नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बाहर तशरीफ लाए तो आपकी ज़बान ए अक़दस पर था अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी अन्क़ज़हू मिनन्नार (यानी अल्लाह का शुक्र है जिसने इस लड़के को मेरी वजह से जहन्नम की आग से बचा लिया) (बुख़ारी)

आखरी कलाम 

बीमार पुरसी से बीमार का मर्ज़ खत्म तो नहीं होगा मगर इससे उसके दुखी दिल को कुछ क़रार आ जाएगा उसकी ढाढ़स बंधेगी और तसल्ली आमेज़ कलमात से उसे उम्मीद ए हयात मिलेगी यह हौसला और उम्मीद बीमारी के ख़िलाफ़ लड़ने में उसके लिए मददगार साबित होगा मरीज़ नफ़्सियाती तौर पर तवाना और मज़बूत हो जाएगा। इसलिए बीमार का ख़याल रखते हुए मरीज़ की इयादत ज़रूर करें यह मुसलमान का मुसलमान पर हक़ भी है अज़ीम इबादत भी जन्नत के हुसूल का ज़रिया भी और हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुबारक सुन्नत भी।

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