Kya Aap Jaante Hain Bimar Pursi Ke Fayde | मरीज़ की अयादत सुन्नत भी इबादत भी

अयादत मरीज़ महज़ इख़्तियारी अम्र नहीं बल्कि एक मुसलमान का दूसरे मुसलमान पर हक़ होने की वजह से दीनी तक़ाज़ा है

मोहतरम हाज़िरीन! आज हम एक ऐसे अमल के बारे में बात करेंगे जो देखने में बहुत आसान लगता है लेकिन अल्लाह तआला के यहाँ उसका दर्जा बहुत बुलंद है यह अमल है मरीज़ की इयादत (बीमार पुरसी) और उसकी देखभाल।

हम सब अपनी ज़िंदगी में कभी न कभी बीमारी से गुज़रते हैं जब इंसान तंदुरुस्त होता है तो अपने काम खुद कर लेता है लेकिन जब बीमारी उसे बिस्तर पर ला देती है तब उसे दवा से ज़्यादा अपनेपन हमदर्दी और तसल्ली की ज़रूरत होती है  ऐसे वक़्त में अगर कोई उसके पास बैठकर दो प्यार भरे बोल बोल दे उसका हाल पूछ ले और उसके लिए दुआ कर दे तो उसका दुख आधा हो जाता है।

यही वजह है कि इस्लाम ने मरीज़ की इयादत को सिर्फ एक अच्छा काम नहीं बल्कि मुसलमानों के आपसी हुक़ूक़ में शामिल किया है।

मरीज़ की इयादत मुसलमान का हक़ है

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया मुसलमान के मुसलमान पर पाँच हक़ हैं सलाम का जवाब देना मरीज़ की इयादत करना जनाज़े के साथ जाना दावत क़बूल करना और छींकने वाले को जवाब देना। (सहीह बुख़ारी सहीह मुस्लिम)

गौर कीजिए मरीज़ की इयादत को उन बुनियादी हुक़ूक़ में शामिल किया गया है जो एक मुसलमान का दूसरे मुसलमान पर हैं।

इस्लाम की तालीम यह नहीं है कि हम सिर्फ अपने आराम और अपनी ज़रूरतों तक महदूद रहें बल्कि यह है कि हम अपने भाई के दुख-दर्द में उसके साथ खड़े हों।

अगर किसी मोहल्ले में कोई बीमार पड़ जाए और उसके रिश्तेदार पड़ोसी और जानने वाले उसकी ख़बर तक न लें तो यह इस्लामी अख़लाक़ के ख़िलाफ़ है मामूली बीमारी में इयादत करना सुन्नत है लेकिन जब कोई गंभीर बीमारी में हो और उसकी देखभाल करने वाला कोई न हो तो यह ज़िम्मेदारी फ़र्ज़ हो जाती है।

कुरआन की तालीम और इंसानी हमदर्दी

कुरआन मजीद में अल्लाह तआला फरमाता है नेकी और परहेज़गारी के कामों में एक-दूसरे की मदद करो।(सूरह अल-माइदा: 2)

बीमार की मदद करना उसका हाल पूछना और उसके लिए दुआ करना इसी नेकी और तक़वा का हिस्सा है।

इस्लाम एक ऐसा दीन है जो सिर्फ मस्जिद तक महदूद नहीं है यह इंसान के घर समाज रिश्तों और व्यवहार तक फैला हुआ है इसलिए जो इन्सान  मरीज़ की तकलीफ़ को महसूस करता है और उसकी मदद करता है उसे अल्लाह की रज़ा हासिल होती  है।

फ़रिश्तों की दुआएँ और जन्नत की खुशख़बरी

मोहतरम दोस्तों! जब कोई मुसलमान सिर्फ अल्लाह की रज़ा की नीयत से किसी बीमार की इयादत करता है तो यह एक आम मुलाक़ात नहीं रहती बल्कि इबादत बन जाती है।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जो मुसलमान सुबह किसी बीमार की इयादत करे उसके लिए शाम तक सत्तर हज़ार फ़रिश्ते दुआ करते रहते हैं और जो शाम को इयादत करे उसके लिए सुबह तक सत्तर हज़ार फ़रिश्ते दुआ करते रहते हैं।   (तिर्मिज़ी)

सोचिए! एक इंसान कुछ मिनटों के लिए अपने बीमार भाई का हाल पूछने जाए और उसके बदले में फ़रिश्ते उसके लिए दुआएँ करें इससे बड़ी खुशक़िस्मती और क्या हो सकती है?

इयादत जन्नत तक पहुँचाने वाला अमल

हज़रत सवबान रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जब मुसलमान अपने बीमार भाई की इयादत करता है तो वापस आने तक जन्नत के बाग़ों में रहता है। (सहीह मुस्लिम)

यह हदीस हमें बताती है कि अल्लाह तआला के यहाँ इस अमल की कितनी अहमियत है।

आज बहुत से लोग नफ़्ली इबादतों की तलाश में रहते हैं लेकिन कभी-कभी एक बीमार इंसान के पास बैठकर उसका दिल बहलाना और उसके लिए दुआ करना ऐसी इबादत बन जाती है जिसका सवाब इंसान सोच भी नहीं सकता।

क़यामत के दिन का हैरतअंगेज़ मंज़र

हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया क़यामत के दिन अल्लाह तआला फ़रमाएगा ऐ इंसान! मैं बीमार था तूने मेरी इयादत नहीं की बंदा अर्ज़ करेगा ऐ मेरे रब मैं तेरी इयादत कैसे करता जबकि तू तो सारे जहानों का परवरदिगार है अल्लाह तआला फ़रमाएगा मेरा फलाँ बंदा बीमार था अगर तू उसकी इयादत करता तो मुझे उसके पास पाता। (सहीह मुस्लिम)

यह हदीस बताती है कि अल्लाह तआला अपने कमज़ोर और बीमार बंदों से कितनी मुहब्बत फरमाता है।

हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुबारक सुन्नत

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पूरी ज़िंदगी रहमत मुहब्बत और हमदर्दी से भरी हुई है हज़रत उस्मान ग़नी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमारे बीमारों की इयादत फरमाते हमारे जनाज़ों में शरीक होते और हर हाल में हमारी ग़मख़्वारी करते थे।

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम केवल बड़े लोगों या अमीरों की इयादत नहीं करते थे बल्कि ग़रीबों मिस्कीनों और कमज़ोर लोगों का भी हाल पूछते थे।

आज हम देखते हैं कि कभी-कभी लोग सिर्फ़ रसूख़दार और मालदार लोगों की ख़बर लेते हैं लेकिन इस्लाम हमें सिखाता है कि इंसान की क़ीमत उसके माल से नहीं बल्कि उसकी इंसानियत से होती है।

ग़ैर मुस्लिम की इयादत 

इस्लाम की खूबसूरती यह है कि उसकी रहमत सिर्फ मुसलमानों तक सीमित नहीं।

हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि एक यहूदी लड़का नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़िदमत किया करता था जब वह बीमार हुआ तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसकी इयादत के लिए तशरीफ़ ले गए आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसके सिरहाने बैठे और उसे इस्लाम की दावत दी लड़के ने अपने बाप की तरफ देखा उसके बाप ने कहा अबुल क़ासिम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बात मान लोचुनाँचे वह मुसलमान हो गया।

जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम वहाँ से बाहर निकले तो आपकी ज़बान मुबारक पर यह अल्फ़ाज़ थे सारी तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं जिसने इस लड़के को मेरी वजह से  जहन्नम की आग से बचा लिया। (सहीह बुख़ारी)

दुनिया की एक आसान मिसाल

ज़रा सोचिए, जब हम खुद बीमार पड़ते हैं और कोई दोस्त रिश्तेदार या पड़ोसी हमें देखने आता है तो हमारे दिल को कितनी ख़ुशी होती है उसकी मौजूदगी हमें यह एहसास दिलाती है कि हम अकेले नहीं हैं  डॉक्टर दवा देता है लेकिन कई बार मोहब्बत भरे लफ़्ज़ एक मुस्कुराहट और एक सच्ची दुआ भी शिफ़ा का ज़रिया बन जाती है।

आज जदीद मेडिकल साइंस भी यह मानती है के मरीज़ की ज़हनी ताक़त उसके इलाज में अहम् किरदार अदा करती है जो मरीज़ तनहा महसूस नहीं करता उसे जल्द आराम मिलता है।

इयादत का सही तरीका

मरीज़ की इयादत करते समय कुछ बातों का ख़याल रखना चाहिए:

मरीज़ को तकलीफ़ न दी जाए।

ज़्यादा देर बैठकर उसे थकाया न जाए।

हौसला अफ़ज़ाई की जाए।

उसके लिए दुआ की जाए।

अगर उसे किसी मदद की ज़रूरत हो तो उसे पूरा करने की कोशिश की जाए।

बीमारी के बारे में डराने वाली बातें न की जाएँ।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब किसी बीमार की इयादत फरमाते तो उसके लिए शिफ़ा की दुआ करते और उसे अल्लाह की रहमत की उम्मीद दिलाते।

आख़िरी बात

मोहतरम हाज़िरीन! मरीज़ की इयादत से बीमारी तो खत्म नहीं होती लेकिन बीमार के दिल को सुकून मिलता है उसका हौसला बढ़ता है और उसे यह एहसास होता है कि उसका समाज और उसके अपने लोग उसके साथ खड़े हैं। याद रखिए मरीज़ की इयादत एक मुसलमान का दूसरे मुसलमान पर हक़ है यह अज़ीम इबादत है जन्नत के हुसूल का ज़रिया है फ़रिश्तों की दुआओं का सबब है और हमारे प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुबारक सुन्नत है।

आइए आज यह इरादा करें कि जब भी हमें किसी बीमार की ख़बर मिले हम उसकी इयादत करेंगे उसके लिए दुआ करेंगे और अपनी मौजूदगी से उसके दुख को कम करने की कोशिश करेंगे। अल्लाह तआला हमें अपने बंदों के साथ हमदर्दी रहमत और ख़िदमत का जज़्बा अता फरमाए और हमें हुज़ूर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नतों पर अमल करने की तौफ़ीक़ नसीब फरमाए। आमीन या रब्बल आलमीन।

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