हुज़ूर मुख्तारे काएनात को अल्लाह तआला ने सारी काएनात का मालिक व मुख्तार और हाकिम व बादशाह बनाया है। हर अकीदत मंद आशिक़ ए रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कलमा गो मुसलमान का यही अक़ीदा होना चाहिए के अल्लाह तआला ने हमारे आक़ा खातिम ए पैगम्बरां सरवरे आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को काएनात ए आलम की कुल मिलकियत अता फरमाकर मालिक व मुख्तार ए दो आलम बना दिया है।
आगे के मज़मून में हम मुख्तारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इख्तियारात तसर्रुफात पर कुरान और हदीस से चंद हवाले लिख रहे हैं पेश कर रहे हैं जिस से यह साबित हो जाएगा के आका करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह तआला की अता से मालिक ओ मुख्तार हैं।
रसूल जो दें वह लेलो जिस से मना करें रुक जाओ
रब तआला फरमाता है: وما أتاكم الرسول فخذوه وما نهكم عنه فانتهو यानि और रसूल जो कुछ तुम्हें अता फरमाएं वह लेलो और जिस से तुम्हें मना फरमाएं तो तुम बाज़ रहो (सुरह अल हश्र आयत 7)।
इस आयत ए मुबारका से मालूम हुआ, पता चला के रसूलुल्लाह सल्लाल्ल्हू अलैहि वसल्लम जो चाहें अता फरमा सकते हैं, अब चाहे वह शरीअत के अहकाम हों या माल ओ दौलत हो।
हुज़ूर गनी करते हैं
अल्लाह तआला फरमाता है: وما نقمواإلا أن أغنهم الله ورسوله من فضله यानी उन्हें यही बुरा लगा के अल्लाह और उसके रसूल ने उन्हें अपने फज़्ल से गनी कर दिया। (सूरह तौबा आयत 74 पारा 10)
कुरान करीम की इस आयत से भी यह मालूम हुआ की रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम भी लोगों को गनी और मालदार फरमाते हैं, और दूसरों को गनी वही करता है जो खुद मालिक व मुख्तार होता है, तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह तआला के इज़्न और उसके हुक्म से मुख्तार ए कुल हैं, जिसको जो चाहें जैसा चाहें नवाज़ दें, यही हमारा अकीदा है।
दो नमाज़ों की शर्त
एक शख्स नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बारगाह में हाज़िर हुआ और अर्ज़ करने लगा के में इस्लाम कुबूल करना चाहता हूँ लेकिन मेरी शर्त यह है के में सिर्फ दो नमाज़ें पढूंगा, नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इसे कुबूल फरमा लिया। (हवाला मुसनद अहमद बिन हम्बल जिल्द 5 सफा 25)
हुज़ूर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इख्तियार मुलाहिज़ा फरमाएं और देखें के पूरी उम्मत को हुक्म है पांच नमाज़ों का, लेकिन नबी मुख्तार हैं जिसके लिए चाहें कमी करदें।
हरम शरीफ की घास काटना हलाल फरमा दिया
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फतह मक्का के मौके पर दीन में इख्तियारात का एलान फरमाते हुए इरशाद फरमाया के अल्लाह ने मक्के को हरम बनाया है। "अल्लाह ने मक्का को हरम बनाया है, के यहाँ का कोई काँटा भी न तोड़ा जाए, यहाँ के दरख्त न काटे जाएँ, और यहाँ की घास न उखेड़ी जाए, तो हज़रत सय्यदेना अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब यानी रसूल ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चचा खड़े हो गए अर्ज़ करते हैं या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम इज़्खिर घास काटने की इजाज़त देदी जाए, इसलिए के वह हमारे घरों के छप्पर बनाने के काम आती है, क़ब्रों में जब मुर्दों को लिटाया जाता है तो तख्ते पर उसको लगाया जाता है, और जब कोई सोने का कारोबार करने वाला सुनार अपना सोना पिघलाता है तो उसमें इस्तेमाल करता है, या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इसकी इजाज़त देदी जाए। मेरे आक़ा ने फरमाया हाँ इजाज़त है इज़्खिर घास की, इज़्खिर घास काटने की इजाज़त है।
गौर फरमाइए एक तरफ तो मेरे आक़ा ने यह फरमाया था के कोई काँटा यहाँ का न तोड़ा जाए, कोई दरख़्त न काटा जाए, कोई घास न उखेड़ी जाए, गोया हर खूदरू दरख्त घास कटीला वगैरा काटना हराम फरमा दिया, मगर दूसरी तरफ जब हज़रत अब्बास ने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम से इज़्खिर घास काटने को हलाल करने की दरख्वास की तो मेरे आक़ा ने यह न कहा के यहाँ पर मेरा इख्तियार सल्ब हो गया, मेरा कोई इख्तियार काम नहीं करता, अल्लाह का यही हुक्म है, उसी ने मक्के को हरम बनाया है, वह अगर जाइज़ करेगा तो जाइज़ होगा , वरना नहीं, बल्कि मेरे आक़ा ने फरमाया जाओ इज़्खिर घास काटने की इजाज़त है। (हवाला बुखारी जिल्द 1सफा 216 मुस्लिम जिल्द 1 सफा 438, 439 व अबू दाऊद)
इस से यह समझ में आ गया के मेरे आक़ा रसूले अकरम सय्यदे आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अल्लाह ने हलाल और हराम के बारे में यह इख्तियार दे दिया है, के जिस चीज़ को चाहें हलाल करें, और जिस चीज़ को चाहें हराम फरमा दें।
तसर्रुफ़ व इख्तियारात
हुज़ूर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अल्लाह तआला के अता किए हुए इख्तियारात व कमालात की बदौलत कभी ऊँगली के इशारे से आसमान पर चाँद को तोड़ा, और कभी डूबे हुए सूरज को मोड़ा, कभी सियाह फाम चेहरे को बद्र ए मुनीर बना दिया, और कभी अपनी जुबान ए हक़ तर्जमान से जन्नत का मुस्दह सुनाया, और कभी जमादात व नबातात को क़ुव्वते गोयाई से सरफ़राज़ फरमाया, कभी ठोकरों से मुर्दों को जिलाया, कभी ला इलाज मरीज़ों को शिफायाब फरमाया, और कभी अपनी अंगुश्त हाए मुबारका से पानी के चश्में रवां फरमाए।
आखरी कलाम खातिमा
मैंने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तसर्रुफात व इख्तियारत पर चंद आयात ए मुक़द्दसा और अहादीस मुबारका पेश की (इनके अलावा और बहुत सी आयत व अहादीस ए मुबारका पेश की जा सकती हैं) जिस से यह साबित हो गया के हमारे आका सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह की अता से मालिक ओ मुख्तार हैं और अल्लाह तआला ने हमारे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मालिक ओ मुख्तार बनाकर भेजा है।
खालिक़ ए क़ुल ने आपको मालिक ए कुल बना दिया - दोनों जहाँ हैं आपके क़ब्ज़ा ए इख़्तियार में।
कुंजी तुम्हें दी अपने खज़ानों की खुदा ने - महबूब किया मालिक ओ मुख्तार बनाया।
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