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हमारे प्यारे आक़ा व मौला हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रहमतुल्लिल-आलमीन हैं। और आपकी दी हुई तालीमात भी इंसानियत के लिए रहमत, अमन, मुहब्बत और सलामती का पैगाम है।
आज का दौर विभिन्न (मुख्तलिफ़) तरह के फ़ितनों, आपसी नफरत, लड़ाई-झगड़े और बदअमनी से परेशान है। ऐसे हालात में अगर इंसान सच्चे दिल से रसूल-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तालीमात पर अमल करे, तो समाज, मुआशरे में फैली हुई बहुत सी बुराइयों का इलाज मुमकिन है।
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तालीमात पर अगर हम अमल पैरा हो जाएँ तो, हमारे घरों, मोहल्लों और समाज में अमन व सुकून की फिज़ा पैदा हो सकती है।
सलाम को आम करना अमन का पैगाम है
हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया: "अपने बीच सलाम की रस्म आम करो" (मिश्कात शरेफ, सफ़्हा389)
यह जुमला देखने में बहुत मुख़्तसर है, लेकिन इसके अंदर अमन व सलामती का बहुत बड़ा पैगाम मौजूद है। जब एक मुसलमान दूसरे मुसलमान से मिलता है तो कहता है "अस्सलामु अलैकुम" और दूसरा मुसलमान भाई जवाब देता है "वअलयकुमुस्सलाम" सलाम का मतलब ही सलामती और आफियत है। इसलिए जब कोई मुसलमान अपने दूसरे भाई को "अस्सलामु अलैकुम" कहता है तो गोया वह उसके लिए सलामती की दुआ करता है और यह पैगाम देता है की अल्लाह तुम्हारे दीं व दुनिया को सलामत रखे।
इसके साथ ही इसमें भाईचारे और हक की पाबंदी का अहसास भी मौजूद है। सलाम करने वाला मानो यह कहता है कि मैं तुम्हारी जान, माल और आबरू की हुरमत को तस्लीम करता हूँ और उन पर ज़ुल्म या ज़्यादती करना मेरे लिए जाइज़ नहीं।
दूसरा मुसलमान जब वअलइकुम अस्सलाम कहता है तो वह भी अपने भाई के लिए सलामती की दुआ करता है और अपनी तरफ से मुहब्बत, हमदर्दी और खैरख्वाही का इज़हार करता है।
इस तरह अस्सलामु अलैकुम और वअलैकुमुस्लसाम सिर्फ मिलने जुलने के अलफ़ाज़ नहीं, बल्कि दो मुसलामानों के बीच मुहब्बत, भाईचारे और अमन का पैगाम है।
फिर जब दोनों मुसलमान एक-दूसरे से मुसाफा करते हैं तो यह आपसी मुहब्बत को और मज़बूत करता है। इस तरह एक सुन्नत मुबारक समाज में आपसी भरोसे और भाईचारे को बढ़ाने का ज़रिया बन जाती है।
सलाम की जगह नए अंदाज़ के सलाम
आज हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में सलाम का रिवाज कम होता जा रहा है। फैशन और बदलते मुआशराती तौर तरीकों की वजह से कोई गुड मॉर्निंग, कोई हेल्लो और कोई बाय-बाय कहकर आगे बढ़ जाता है।
सोचिए एक तरफ वह जुमला है जिसमें अपने भाई के लिए सलामती और अमन की दुआ है और दूसरी तरफ ऐसे अल्फाज़ हैं जिनमें इस ख़ास इस्लामी पैगाम की वह रूह मौजूद नहीं।
इसलिए हमें अपनी मुलाकातों में सलाम करना चाहिए और बच्चों को भी छोटी उम्र से सलाम की अहमियत और उसका अदब सिखाना चाहिए।
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रास्ते का भी हक है
रसूल-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तालीम जहाँ सलाम को आम करने की है वहीं आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने समाज में रहने के ऐसे उसूल भी बताए हैं जिनसे लोगों के हुकूक की हिफाज़त होती है और फितने व फसाद के रास्ते बंद होते हैं।
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया: "रास्तों पर बैठने से बचो" (मिश्कात शरीफ सफ़्हा 390) यानी बाज़ारों और रहगुज़ारों में न बैठा करो। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: "तो रास्ते का उसका हक अदा करो" सहाबा-ए-किराम ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रास्ते का क्या हक है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया: नज़र नीची रखना, किसी को ईज़ा न देना, सलाम का जवाब देना, नेक काम की तलकीन करना और बुरे काम से रोकना। (मिश्कात शरीफ सफ़्हा 390)
इन हिदायतों में समाज की भलाई
ग़ौर कीजिए रसूल ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इन मुख़्तसर मगर जामेअ तालिमात मैं समाज की कितनी बड़ी भलाई और इस्लाह मौजूद है।
1. नज़र नीची रखना
इंसान जब अपनी नज़र की हिफाज़त करता है तो बद निगाही और उस से पैदा होने वाली बहुत से बुराइयों से बच जाता है। जब नज़र पाकीज़ा होगी तो समाज भी अच्छा होगा।
2. किसी को ईज़ा न देना
दूसरों को तकलीफ पहुँचाने से रोकना इस्लाम की अहम तालीम है। जब हर आदमी दूसरे की जान, माल, इज़्ज़त और सुकून का ख्याल रखेगा तो आपसी टकराव और दुश्मनी नहीं होगी।
3. सलाम का जवाब देना
सलाम का जवाब देना आपसी मुहब्बत और भाईचारे को बढ़ाता है। एक मुसलमान दूसरे मुसलमान से मिलते हुए जब सलाम करता है और उसका जवाब मिलता है तो दोनों के बीच खैरख्वाही और अपनापन पैदा होता है।
4. नेक काम की तलक़ीन करना
समाज में जब अच्छे कामों की हौसला अफ़ज़ाई होगी तो लोगों में नेकी करने का और ज़्यादा जज़्बा पैदा होगा। लोग एक-दूसरे को भलाई की तरफ बुलाएंगे तो समाज में अच्छे अख़लाक़ और बेहतर माहौल पैदा होगा।
5. बुरे काम से रोकना
बुराई को बुराई समझना ज़रूरी है और बुराई को हिकमत व अच्छे अंदाज़ के साथ रोकना भी ज़रूरी है। ताकि फैली बुराइयां ख़त्म हों।
तालीम-ए-रहमत का असली पैगाम
मुसलमानों, ज़रा सोचिए कि हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रास्ते का भी हक़ बयान फ़रमाया। नज़र कि हिफाज़त हो, किसी को ईज़ा ना दी जाए, सलाम का जवाब दिया जाए, नेकी कि तरफ बुलाया जाए और बुराई से रोका जाए, अगर इन तालीमात पर अमल किया जाए तो बहुत सी सामाजिक मुआशरती बुराइयों पर क़ाबू पाया जा सकता है।
लेकिन आज हालत यह है कि रास्तों और बाज़ारों में बैठना आम होता जा रहा है। बदनिगाही को कभी-कभी आधुनिक सोच या खुली नज़र का नाम दे दिया जाता है। दूसरे को तकलीफ पहुँचाने से बचने के बजाय लोग अपने फायदे को प्राथमिकता देते हैं।
सलाम जैसी प्यारी सुन्नत को भी कई जगहों पर भुलाया जा रहा है और उसकी जगह मुख्तलिफ आधुनिक अंदाज़ों ने लेली है। इसी तरह नेकी कि तलक़ीन को भी कभी पुरानी सोच समझ लिया जाता है और बुराई से रोकने पर भी कुछ लोगों को बुरा लग जाता है।
ऐसे माहौल मैं हमें जहाँ हम दूसरों को नसीहत करें वहीँ हमें पहले रसूल ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कि तालीमत पर अमल करने कि ज़रुरत है।
अमन और सुकून का रास्ता
आज दुनिया को अमन चाहिए, समाज को सुकून चाहिए, परिवारों को मुहब्बत चाहिए और इंसान को एक दूसरे के हुक़ूक का अहसास चाहिए।
इन सबके लिए रसूल-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तालीम ही में हल मौजूद है। अगर हम अमन सुकून मुहब्बत और इंसाफ चाहते हैँ तो हमें हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कि तालीमत पर अमल करना होगा।
हमें चाहिए कि सलाम को आम करें, नज़र कि हिफाज़त करें, किसी को ईज़ा न पहुंचाए, दूसरों के हुक़ूक का लिहाज़ करें, लोगों के हुक़ूक अगर हम पर आईद हों तो उन्हें अदा करें, नेकी कि दावत दें, नेकी कि तलक़ीन करें और बुराई को हिकमत के साथ रोकें।
यही हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कि तालीम ए रहमत है और इसी मैं इंसान के लिए अमन, आफियत, सुकून और राहत है।
दुआ है कि अल्लाह तआला हमें रसूल ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तालीमत को समझने, उन पर अमल करने और उन्हें अपने घरों व समाज मैं आम करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।
आख़िरी पैगाम
दोनों आलम में तुझे मतलब गर आराम है, उनका दमन थाम ले जिनका मुहम्मद नाम है। सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम।
