दुनिया की मसरूफ़ियत और आख़िरत की फ़िक्र

दुनिया की मसरूफियत में आखिरत को न भूलें, इस पोस्ट में बताया गया है के, इस फानी दुनिया के दाम ए फरेब में न आएं और आखिरत की तैयारी करें।

इंसान इस दुनिया में हमेशा नहीं रहेगा, दुनिया इंसान का आरज़ी ठिकाना है, लेकिन आज इंसान को देखा जाए तो जो उसकी ज़िन्दगी चंद दिन की है, उसी को सब कुछ समझ बैठा है, इंसान माल, दौलत, कारोबार, और दुनिया में इस क़दर मशगूल हो गया है के, आखिरत को भूल बैठा है।

दुनिया फानी है

लेकिन इस हकीकत को नहीं भूलना चाहिए कि यह जो दुनिया है, वह फानी है, एक दिन यह खत्म हो जाएगी। और आखिरत हमेशा और बाक़ी रहने वाली है। हमारी दुनियावी ज़िन्दगी चाहे कितनी ही लम्बी क्यों न हो, पचास साल, साठ साल, सौ साल क्यों न हो जाए, लेकिन एक दिन इस ज़िन्दगी का खात्मा होना है, यह ज़िन्दगी एक दिन ख़त्म हो जाएगी। मौत आई और हमको इस फानी दुनिया से रुखसत होना है, जबकि आखिरत की ज़िन्दगी अब्दी हमेशा और बाक़ी रहने वाली है। 

समझदार इंसान

इसलिए समझदार और अक़लमंद मोमिन मुसलमान वही है, जो इस फानी दुनिया में रहते हुए, अपना मुहासबा करे, ज़िन्दगी का जाएज़ा ले, और अपनी ज़िन्दगी को कुरान ओ सुन्नत के मुताबिक गुज़ारे, शरीअत की पाबंदी करे, नमाज़ पाबंदी से पढ़े, नेक अमल करे, आखिरत की फ़िक्र करे, आखिरत की तय्यारी करे।

आखिरत की फ़िक्र

आखिरत की फ़िक्र एक ऐसा वस्फ़ है, एक ऐसी खूबी है, जो मोमिन को हमेशा सही सिम्त रखता है, सही जानिब रखता है, और इस बात का अहसास दिलाता है, कि आखिरत अब्दी और बाक़ी रहने वाली है। आखिरत का अहसास मुसलमान को अपनी सारी दौलत, वक़्त, तवानाई, खर्च करने, और दुनियावी राहत व सुकून कुर्बान कर देने पर उभारता है, क्यूंकि आखिरत दाएमी और बाक़ी रहने वाली है।

अल्लाह तआला कुरान ए करीम में फरमाता है: " وَ الْاٰخِرَةُ خَیْرٌ وَّ اَبْقٰى" यानी और आखिरत बेहतर और बाक़ी रहने वाली है। (सूरह अल-आला : 17)

दुनिया में इंसान का वजूद महज़ इसलिए नहीं हुआ के वह मौज मस्ती करे, बल्के इसलिए हुआ है के, अल्लाह तआला एक ख़ास मुद्दत तक इम्तेहान के मरहले से गुज़ार कर आज़माना चाहता है, ताके देखें कौन बेहतर अमल करने वाला है, जो लोग सही अमल करेंगे, उन्हें उसका बदला दिया जाएगा। और जिसने गलत राह को इख्तियार किया होगा, उसे सज़ा दी जाएगी।

कुरान ए करीम में इरशाद है: فَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَيْرًۭا يَرَهُۥ وَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍۢ شَرًّۭا يَرَهُ"ۥ"  यानी फिर जिसने ज़र्रा बराबर नेकी की होगी, वह उसको देख लेगा और जिसने ज़र्रा बराबर भी बदी की होगी, वह उसको देख लेगा। (सूरह अज़-ज़िल्ज़ाल: 7-8)

अगर हम थोड़ी देर की नेकी करें, भलाई करें, तो वह महफूज़ रखी जायेगी, इसी तरह से अगर कोई गुनाह करता है, चाहे चंद सेकेंड गुनाह करे, तो वह महफूज़ रखा जाएगा। और कयामत के दिन सामने रख दिया जाएगा। इसलिए हमें अपनी ज़िन्दगी का हर लम्हा इस अहसास और ज़िम्मेदारी के साथ गुज़ारना चाहिए, के हमारा छोटे से छोटा अमल भी महफूज़ है, और हमें इसका जवाब देना होगा। इंसान को क़यामत के दिन अपने तमाम आमाल का हिसाब देना होगा, इंसान से तमाम आमाल का हिसाब लिया जाएगा, ज़र्रे ज़र्रे का हिसाब देना होगा। तो हमें चाहिए के अपनी ज़िन्दगी के तमाम छोटे बड़े कामों में आखिरत को पेशे नज़र रखे, अच्छे काम करे, नेकियाँ करे। गुनाहों से बचे, बुराइयों से बचे।

आखिरत का शऊर रखने वाले लोग

जो लोग आखिरत का शऊर रखते हैं वह इस बात से वाकिफ होते हैं के, कहीं अल्लाह तआला उनकी छोटी-छोटी हरकात पर पकड़ न ले, वह इस खौफ से डरते हैं। 

कुरान ए करीम में ऐसे लोगों की एक खूबी ब्यान की गई है: " وَ یَخْشَوْنَ رَبَّهُمْ وَ یَخَافُوْنَ سُوْٓءَ الْحِسَابِ " यानी वह अपने रब से डरते हैं, और इस बात का खौफ रखते हैं कि उनसे बुरी तरह हिसाब न लिया जाए। (सूरह अर-रअद: 21)

अगरचे दुनिया आखिरत की खेती है, लेकिन मोमिन की निगाह हमेशा आखिरत की कामयाबी पर टिकी होती है। वह लम्हा भर के लिए भी यह गवारा नहीं करता के दुनिया की मुहब्बत उसे आखिरत से गाफिल कर दे, और नतीजतन उसे आखिरत में नुकसान उठाना पड़े।

मोमिन इस बात पर यकीन रखता है कि आखिरत की कामयाबी दरअसल हक़ीक़ी कामयाबी है। चाहे उसके लिए दुनिया में किसी मुश्किल का सामना करना पड़े, परेशानी उठानी पड़े, लोगों की मज़म्मत सहनी पड़े या दुनियावी चीज़ों के नुकसान को बर्दाश्त करना पड़े, लेकिन वह आखिरत की कामयाबी को सबसे बड़ी कामयाबी समझता है, आखिरत की कामयाबी ही असल कामयाबी है।

दुनिया से मुहब्बत आखिरत से गफलत

आखिरत की फ़िक्र से गाफिल नहीं होना चाहिए, आखिरत की फ़िक्र को अपने ज़हनो में ताज़ा करते रहना चाहिए, वरना यह ऐन मुमकिन है कि दुनिया की मर्गूबात और दुनिया की दिल्कशियाँ, कहीं आखिरत से मोड़कर दुनिया की तरफ खींच न लें।

दुनिया की चमक दमक इंसान के सामने रहती है, दुनिया की तल्खियां दुनिया की शिरिनियाँ हर वक़्त छलकती रहती हैं। अगर कोई इसके दाम-ए-फरेब में आ जाए तो आखिरत में नुकसान उठाएगा। इसलिए मोमिन मुसलमान को दुनिया में रहते हुए, दुनिया को अपने दिल में  ग़ालिब नहीं होने देना चाहिए, दुनिया आखिरत की खेती है, तो दुनिया में रहते हुए आखिरत की तय्यारी करना चाहिए। 

आखिरत की फ़िक्र का पहला मरहला

आखिरत की फ़िक्र का पहला मरहला मौत की याद है, मौत एक ऐसी हकीकत है,  जिससे कोई फर्द इनकार नहीं कर सकता, ज़रा गौर कीजिए के इस काएनात में मौत से ज़्यादा यकीनी हकीकत और क्या होगी ? 

लेकिन इंसान न जानें क्यों इस से गफलत का शिकार है, दुनिया की पुरतऐश ज़िन्दगी, शान-ओ-शौकत और माल की हवास ने बहुतों को गुमराह किया है। और ऐसे लोग गोर (क़ब्र) कब्र तक पहुँच जाते हैं, लेकिन ख्वाब ए गफलत से बेदार नहीं होते हैं। 

कभी कभी यह सवाल पैदा होता है की, क्या हमारे ज़हनों में आखिरत का तसव्वुर और जवाबदेही का अहसास धुंधला तो नहीं हो गया है? 

कुछ लोगों के साथ ऐसा मुआमला भी है के वह बहुतों को अपने कंधे पर उठाकर मिट्टी के सुपुर्द करके वापस आ जाते हैं, लेकिन आखिरत का अहसास उनके दिलों में बेदार नहीं होता। जबकि मौत का मंज़र यह याद दिलाने के लिए काफी है कि एक दिन उसे भी इसी सफ़र पर जाना है।

इससे पहले के आखिरत में अल्लाह तआला के सामने रुस्वा हों, हम गफलत की नींद से जाग जाएँ। हमें चाहिए के हम कसरत से मौत को याद करें, और अपने ज़हन में बार-बार आखिरत को ताज़ा करें। इसके लिए कभी-कभी कब्रिस्तान भी जाया करें, और उन इस्लामी किताबों का मुताअला करें जिन में जहन्नम के होल्नाक मनाज़िर ज़िक्र किए गए हैं, और तसव्वुर करें के जन्नत की वह लाज़वाल नेअमतें, नेक व सालेह लोगों को अता की जायेंगी, आर कैसे आलिशान महल्लात होंगे जिस में जन्नती रहेंगे, काश; हम भी उसमें रहें।

इख्तिताम

आखिर में यही कहना चहुँगा की यह दुनिया फानी है हमारी ज़िन्दगी आरज़ी है, एक दिन हमको इस दुनिया को छोड़ना है, इस दुनिया से रुखसत होना है। माल-ओ-दौलत, मकान, कारोबार, शोहरत, और दूसरी दुनियावी चीज़ें इंसान के साथ कब्र में नहीं जायेंगी। इंसान के साथ उसके आमाल जाएंगे। और क़यामत के दिन अल्लाह तआला की बारगाह में हाज़िर होकर अपने आमाल का हिसाब देना होगा।

इसलिए हमें चाहिए के अल्लाह तआला ने हमें जो ज़िन्दगी अता फरमाई है, वक़्त और मोहलत अता की है, इसे गनीमत जानें और आखिरत की तय्यारी करें, मौत को याद करें, अपना मुहासबा करें, अपने आमाल का जाएज़ा लेते रहें, गुनाहों से तौबा करें, ज़्यादा से ज़्यादा नेकियों का ज़खीरा करें, और अल्लाह तलाआ की रज़ा हासिल करने की कोशिश करते रहें।

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