Muashra Ke Zawal Ki Ek Wajah - अहले हक़ की बे क़दरी

अए लोगो! अभी भी वक़्त है अपने आप को बदलो अपनी तरजीहात को बदलो और अच्छे मुख़लिस और बा अमल लोगों की क़द्र करना सीखो

इनसानी मुआशरों की तारीख़ में जब भी अख़लाक़ी और रूहानी ज़वाल आया है उसका सबसे नुमायाँ निशान अहले हक़ की बे क़दरी रही है ज़ाहिर परस्ती और सतहियत जब किसी क़ौम पर ग़ालिब आती है तो हक़ीक़ी इल्म तक़वा और इख़्लास पस मंज़र में चले जाते हैं जबकि दिखावा चापलूसी और जज़्बाती ख़िताबत को मेयार ए फ़ज़ीलत समझ लिया जाता है ये अलमिया महज़ चंद अफ़राद की कहानी नहीं बल्कि पूरी उम्मत की इज्तिमाई सोच के बुहरान की अलामत है पेशे नज़र मज़मून में उसी दर्दनाक हक़ीक़त पर रौशनी डाली गई है और उम्मत को अपनी तरजीहात पर नज़रे सानी की दावत दी गई है।

ज़ाहिर परस्ती का ग़लबा और अहले हक़ की बे कदरी 

आज का दौर फ़ितनों दिखावे और ज़ाहिरी चमक दमक का दौर बन चुका है सच्चाई दबती जा रही है और बनावट को इज़्ज़त मिल रही है जो शख़्स जितना ज़्यादा मक्र चालाकी और ज़ाहिरी ख़िताबत दिखा लेता है लोग उसे उतना ही बड़ा आलिम और अल्लामा समझने लगते हैं जबकि जो इख़्लास के साथ दीन की सहीह ख़िदमत करना चाहता है वो मुख़ालिफ़तों तानों और बे क़दरी का शिकार हो जाता है।

दीनी इदारों में बातिल का तसल्लुत

ये हक़ीक़त किसी एक शहर या एक इलाक़े तक महदूद नहीं रही बल्कि आज बहुत सी मस्जिदों मदरसों और दीनी इदारों में ऐसे लोग नुमायाँ हो चुके हैं जिनके पास न हक़ीक़ी इल्म है न फ़िक्र दीन और न ही उम्मत की इस्लाह का दर्द ख़ास तौर पर शहरों की कई मस्जिदों के मिम्बरों पर ऐसे अफ़राद क़बिज़ हैं जो सिर्फ़ आवाज़ जज़्बाती अंदाज़ या ताल्लुक़ात की बुनियाद पर आगे बढ़ गए जबकि हक़ीक़ी अहले इल्म पसे मंज़र में चले गए।

उम्मत पर अज़ाब की सूरत और इसका बुनियादी सबब

मेरे नज़दीक ये उम्मत पर अल्लाह तआला का एक बहुत बड़ा अज़ाब है कि हम आहिस्ता आहिस्ता सच्चे अहले इल्म से महरूम होते जा रहे हैं इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि हमने इल्म तक़वा और इख़्लास के बजाय शोहरत चापलूसी ख़ुशामद और ज़ाहिरी हुजूम को मेयार बना लिया है आज जो शख़्स लोगों की ख़ुशामद कर ले हर एक को राज़ी रखने की कोशिश करे और हक़ बात कहने से बचता रहे वो लोगों में मक़बूल हो जाता है लेकिन जो हक़ बात करे इस्लाह की फ़िक्र करे और दीन को ख़ालिस अंदाज़ में पेश करे वो तनक़ीद का निशाना बना दिया जाता है।

मुख़लिस उलमा की सिफ़ात और उनकी दूरी के असबाब

हक़ीक़ी अहले इल्म के अंदर तसन्नोअ नहीं होता बनावट नहीं होती वो किसी की चापलूसी या दरबारी सियासत नहीं कर सकते यही वजह है कि ऐसे लोग अक्सर मस्जिदों और मदरसों से दूर हो चुके हैं या फिर उन्हें दूर कर दिया गया है अफ़सोस की बात ये है कि उम्मत ख़ुद अपने मोहसिनों को पहचानने से महरूम होती जा रही है।

उम्मत के नाम पुकार और इनतिबाह

अए लोगो! अभी भी वक़्त है अपने आप को बदलो अपनी तरजीहात को बदलो और अच्छे मुख़लिस और बा अमल लोगों की क़द्र करना सीखो ऐसे अफ़राद को आगे लाओ जो वाक़ई दीन का दर्द रखते हों वरना याद रखो! अगर यही हालात रहे तो हमारी इबादतें हमारी नस्लें और हमारा दीनी माहौल मुसलसल तबाही की तरफ़ जाता रहेगा।

आने वाले कल का अलमिया मंज़र

वो दिन दूर नहीं जब लोग इन्हीं मिम्बरों इन्हीं कुर्सियों और इन्हीं फ़ैसलों पर मातम करेंगे जिन्हें आज वो ख़ुद मज़बूत कर रहे हैं इस लिए ज़रूरी है कि हम हक़ को पहचानें अहले हक़ की क़द्र करें और दीन को दुनियावी मफ़ादात के बजाय इख़्लास और इल्म की बुनियाद पर इख़्तियार करें।

नतीजा व पैग़ाम

ख़ुलासा ए कलाम ये है कि अहले हक़ की बे क़दरी किसी भी क़ौम के लिए इज्तिमाई ख़ुदकुशी के मुतरादिफ़ है जब मेयार बदल जाते हैं और हक़ीक़ी अहले इल्म ओ बसीरत को नज़रअंदाज़ करके सतहियत और मुनाफ़िक़त को फ़रोग़ दिया जाता है तो इसका अंजाम सिवाए ज़िल्लत इंतिशार और रूहानी वीरानी के कुछ नहीं होता ज़रूरत इस अम्र की है कि हम अपनी आँखें खोलें हक़ और अहले हक़ की पहचान करें और अपनी तरजीहात का अज़ सर ए नौ जाइज़ा लें याद रखें क़ौमें अपने मोहसिनों की क़द्र कर के ही ज़िंदा रहती हैं वरना तारीख़ के कूड़े दान में फेंक दी जाती हैं।

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