Deeni Jalson Mein Badhta Kursi Culture : अहले इल्म की दिल शिकनी का सबब

आइए अब इस नए कल्चर पर ग़ौर करें जो हमारे दीनी जलसों में दाख़िल हो गया है और जिसने बहुत से लोगों को फ़िक्रमंद कर दिया है।

इस गुफ्तगू में हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि दीनी जलसे सिर्फ़ एक रस्म नहीं बल्कि पूरे इस्लाम की नुमाइंदगी करने वाले इज्तिमा होते हैं।

दीनी जलसे और मज़हबी इज्तिमाअत महज़ तक़रीरों और नअत ख़्वानी के प्रोग्राम नहीं होते बल्कि यह दीन-ए-इस्लाम की नुमाइंदगी करने वाले इज्तिमाअत होते हैं। इन महाफ़िल से लोगों को यह पैग़ाम मिलता है कि इस्लाम अपने उलमा मशाइख़ और दीनी ख़िदमतगारों के साथ किस तरह का बरताव करने की तालीम देता है। इसी लिए इन मजालिस का हर पहलू दीन की तालीमात के मुताबिक़ होना चाहिए।

स्टेज पर कुर्सी कल्चर एक परेशान करने वाला मंज़र

आइए अब इस नए कल्चर पर ग़ौर करें जो हमारे दीनी जलसों में दाख़िल हो गया है और जिसने बहुत से लोगों को फ़िक्रमंद कर दिया है।

अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि आज बाज़ दीनी जलसों में एक ऐसा कल्चर आम होता जा रहा है जिसने बहुत से संजीदा लोगों को तशवीश में मुब्तला कर दिया है स्टेज पर चंद मख़सूस अफ़राद के लिए कुर्सियाँ सजा दी जाती हैं जबकि बाक़ी उलमा ए किराम हुफ़्फ़ाज़ ए क़ुरआन आइम्मा ए मसाजिद और दीनी ख़िदमत अंजाम देने वाले अफ़राद नीचे बैठे होते हैं बाज़ औक़ात मंज़र यह होता है कि इल्म ओ फ़ज़्ल में मुमताज़ शख़्सियात भी नीचे मौजूद होती हैं और महज़ इंतज़ामिया के क़रीब या साहिब ए हैसियत अफ़राद ऊपर कुर्सियों पर बराजमान होते हैं।

असल सवाल दर्जे बनाना या दीन की ख़िदमत

यहाँ हमें अपने आप से यह बुनियादी सवाल करना होगा कि आख़िर इन इज्तिमाअत का असल मक़सद क्या है।

सवाल यह है कि क्या दीनी इज्तिमाअत का मक़सद लोगों के दरमियान दर्जात क़ायम करना है या दीन की ख़िदमत करना? क्या एक आलिम ए दीन की इज़्ज़त इस बात की मोहताज है कि उसे स्टेज पर कुर्सी मिले या न मिले अगर नहीं तो फिर ऐसा निज़ाम क्यूँ बनाया जाता है जिससे बाज़ अहल ए इल्म की दिल आज़ारी हो और उन्हें यह एहसास हो कि उनकी कोई क़द्र नहीं?

उलमा ए किराम का मक़ाम और इस रवैये का असर

इस्लाम में उलमा को जो बुलंद मक़ाम हासिल है उसे ध्यान में रखना बेहद ज़रूरी है ताकि हम इस कुर्सी कल्चर के असल असर को समझ सकें।

हक़ीक़त यह है कि उलमा ए किराम अंबिया ए किराम के वारिस हैं उनकी इज़्ज़त ओ तकरीम इस्लामी मुआशरे की बुनियादी अक़दार में से है। जब किसी जलसे में चंद अफ़राद को नुमायाँ करके बाक़ी उलमा को नज़रअंदाज़ किया जाता है तो यह तर्ज़ ए अमल न सिर्फ़ नामुनासिब महसूस होता है बल्कि एक हद तक अहल ए इल्म की तहक़ीर और दिल शिकनी का सबब भी बनता है अगरचे नीयत तहक़ीर की न हो लेकिन अमल का असर वही ज़ाहिर होता है।

मुंतज़िमीन के लिए ज़रूरी हिदायत अद्ल और अहतराम का मामला

अब बात करते हैं इस मसले के हल की कि किस तरह मुंतज़िमीन एक ऐसा निज़ाम बना सकते हैं जिससे सबकी इज़्ज़त बरक़रार रहे।

मुंतज़िमीन ए जलसा को चाहिए कि वह ऐसी तरतीब इख़्तियार करें जिससे तमाम उलमा और दीनी शख़्सियात की इज़्ज़त बरक़रार रहे अगर स्टेज बनाया जाए तो वहाँ मौजूद अफ़राद के इंतिख़ाब में अद्ल और अहतराम को मलहूज़ रखा जाए और अगर जगह महदूद हो तो ऐसा इंतज़ाम हो कि किसी आलिम ए दीन को एहसास ए महरूमी न हो दीनी महाफ़िल में इत्तिहाद मोहब्बत और बाहमी अहतराम का माहौल पैदा होना चाहिए न कि एहसास ए बरतरी और एहसास ए कमतरी का।

उलमा की इज़्ज़त हमारा दीनी फ़र्ज़ है

आख़िर में एक बहुत ज़रूरी बात याद रखने की है कि उलमा की इज़्ज़त करना कोई एहसान नहीं बल्कि हमारा दीनी फ़र्ज़ है।

याद रखना चाहिए कि उलमा की इज़्ज़त किसी फ़र्द या तंज़ीम पर एहसान नहीं बल्कि दीन ए इस्लाम का तक़ाज़ा है जो मुआशरा अपने उलमा की क़द्र करता है वह इल्म और दीन दोनों की क़द्र करता है और जो अहल ए इल्म की इज़्ज़त को कम करता है वह दरहक़ीक़त अपने इल्मी व दीनी सरमाया ही को नुक़सान पहुँचाता है।

दुआ और इल्तिमास

इस पूरे मज़मून के बाद हम अल्लाह तआला से दुआ करते हैं कि वह हमें सही समझ और अमल की तौफ़ीक़ दे।

अल्लाह तआला हमें अपने उलमा मशाइख़ और अहल ए दीन की सही क़द्र ओ मंज़िलत पहचानने और उनके साथ अदब ओ अहतराम का मामला करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए आमीन।

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