मकातिब और मदारिस का वजूद हर उस शख़्स के लिए रूह की तरह ज़रूरी है जो अपने दिल में ईमान की ताज़गी चाहता है। जिस तरह इंसान को ज़िंदा रहने के लिए हवा और पानी की ज़रूरत होती है, ठीक उसी तरह बल्कि उससे भी बढ़कर एक ज़िंदादिल मुसलमान के लिए मकातिब और मदारिस का क़ायम रहना लाज़िमी है। ये वो चिराग़ हैं जिनसे हमारी आने वाली नस्लें क़ुरआन और दीन की रौशनी पाती हैं। अगर ये चिराग़ बुझ गए तो अंधेरा इतना गहरा होगा कि दीन की इमारत का बचना मुश्किल हो जाएगा। आइए इसी अहम मौज़ू पर ग़ौर करें और अपनी ज़िम्मेदारी को समझें।
मकातिब-ओ-मदारिस क्यों ज़रूरी हैं?
अगर मकातिब और मदारिस न हों तो हमारी क़ौम के छोटे बच्चे क़ुरआन-ए-पाक और दीनी तालीम कहाँ से हासिल करेंगे? मस्जिदों में इमामत करने वाले, जुमा और ईदैन की नमाज़ें पढ़ाने वाले, निकाह पढ़ाने वाले, जनाज़े की नमाज़ पढ़ाने वाले ये सब इमाम और मुदर्रिसीन मदारिस से ही तैयार होकर आते हैं। जब हर तरफ़ से क़ुरआन और हदीस पर एतिराज़ात किए जाएँगे तो उनका जवाब देने वाला भी यहीं का पढ़ा हुआ आलिम ही होगा। यही वजह है कि हमारी ग़यूर क़ौम के लोग मकातिब और मदारिस की अहमियत को अपनी जान से भी ज़्यादा समझते हैं और उनसे लिल्लाह फ़िल्लाह मुहब्बत करते हैं।
अगर मदरसे न रहे तो क्या होगा
ख़ुदा न करे कि ऐसा वक़्त आए जब तमाम मकातिब और मदारिस को जड़ से ख़त्म कर दिया जाए। उस वक़्त का अंजाम कितना भयानक होगा, इसका सिर्फ़ तसव्वुर ही रूह को कँपा देता है। आज इर्तिदाद (धर्म-त्याग) की आँधी चल रही है, लेकिन अगर मदारिस न रहे तो यही आँधी तूफ़ान का रूप ले लेगी। जो उलेमा-ए-किराम और हुफ़्फ़ाज़-ए-इज़ाम इस वक़्त मौजूद हैं, वे अपनी ज़िंदगी पूरी करके दुनिया से रुख़्सत हो जाएँगे। उनके बाद जब नए आलिम और हाफ़िज़ तैयार करने के सारे रास्ते बंद कर दिए जाएँगे तो हमारी नस्लें दीन किससे सीखेंगी? अपने दीनी मसाइल किससे पूछेंगी? यह सवाल सोचने पर मजबूर करता है कि मदारिस के बग़ैर मुसलमान का दीन पर क़ायम रहना कितना दुश्वार हो जाएगा।
मौजूदा निज़ाम और हमारी ज़िम्मेदारी
मुग़लिया सल्तनत के ज़वाल के बाद हमारे मदारिस का निज़ाम भी दरहम-बरहम हो गया था, लेकिन यह हमारे ग़ैरतमंद मुसलमानों का हौसला ही है कि वे अपनी मेहनत की कमाई से इन मकातिब और मदारिस को चला रहे हैं। इन शा अल्लाह यह निज़ाम क़यामत तक चलता रहेगा। सच तो यह है: "नूर-ए-ख़ुदा है कुफ़्र की हरकत पे ख़ंदाज़न, फूँकों से यह चिराग़ बुझाया न जाएगा।" लेकिन हमारे मुआशरे से यह शिकायत भी आती है कि बाज़ लोग मदारिस के नाम पर अपनी दुकान चलाते हैं और अमानत में ख़ियानत करते हैं। ये दरअसल बहरूपिए होते हैं जो मौलाना का भेस धर कर चोरी, ख़ियानत और हरामख़ोरी जैसे क़बीह काम करते हैं और अपना ठिकाना जहन्नम बनाते हैं। ऐसे लोगों की मदरसा-नुमा दुकानें हमारे लिए नमूना नहीं हैं और न ही उनकी वजह से तमाम मदारिस पर लान-तान करना दुरुस्त है।
सोशल मीडिया और इस्लाह का सही तरीक़ा
कुछ लोग सोशल मीडिया पर एक लाठी से तमाम मदारिस को हाँकने की कोशिश करते हैं। मेरे ख़याल में ऐसे लोग अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे होते हैं, क्योंकि मदारिस तो आपके अपने ही हैं और इनके बग़ैर आपकी दीनी ज़िंदगी अधूरी है। ग़ौर कीजिए: अगर जिस्म के किसी हिस्से पर फोड़ा निकल आए तो सिर्फ़ उसी फोड़े का इलाज किया जाता है, नश्तर लगाकर उसे ठीक किया जाता है, पूरा अंग नहीं काटा जाता। ठीक इसी तरह जहाँ कहीं अमानत में ख़ियानत या कोई बुराई नज़र आए तो उसे रोकने की कोशिश कीजिए। अगर ताक़त हो तो हाथ से रोकिए, यह मुमकिन न हो तो ज़बान से समझाइए कि तुम ग़लत कर रहे हो, और अगर यह भी मुमकिन न हो तो दिल में उसे बुरा जानिए। लेकिन ख़ुदा के वास्ते सोशल मीडिया पर अपने मकातिब और मदारिस की रुसवाई का ज़रिया न बनिए।
आख़िरी दुआ और पैग़ाम
अल्लाह तआला हमारे तमाम मकातिब और मदारिस को हर शर, फ़ितने और फ़साद से महफ़ूज़ रखे और उनकी ख़िदमात को क़बूल फ़रमाए। आमीन या रब्बल-आलमीन।
