आज के इस मज़मून में, हम रहमत-ए-आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की एक बेहद प्यारी और हिकमत से भरपूर सुन्नत का ज़िक्र करेंगे। ये सुन्नत है "क़ैलूला" यानी दोपहर का मुख़्तसर आराम। ये वो अमल है जो ज़ाहिरी तौर पर तो बहुत मामूली नज़र आता है, लेकिन इसके पीछे रूहानी और जिस्मानी फ़वाइद का एक ऐसा ख़ज़ाना छुपा हुआ है जिसका इदराक हम नहीं कर सकते है। आइए, इस मौज़ू पर रौशनी डालते हैं और देखते हैं कि हमारे प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें क्या हिदायत फ़रमाई।
दोपहर को थोड़ी देर आराम और हदीस ए मुबारका
इस सिलसिले में हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से एक जामेअ हदीस मर्वी है। आप रज़ियल्लाहु अन्हु बयान फ़रमाते हैं, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
قِيلُوا، فَإِنَّ الشَّيَاطِينَ لَا تَقِيلُ
"क़ीलू, फ़-इन्नश-शयातीना ला तक़ीलु।
इस हदीस-ए-पाक का तर्जुमा और मफ़हूम ये है: हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: "क़ैलूला (दोपहर को थोड़ी देर आराम) किया करो, क्योंकि शयातीन क़ैलूला नहीं करते।
हदीस की तफ़सील तशरीह और ख़ुलासा
इस मुख़्तसर से जुमले में उम्मत के लिए कितनी बड़ी हिकमत और रहमत छुपी है ज़रा ग़ौर कीजिए। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमें हुक्म दे रहे हैं कि "क़ीलू" यानी दोपहर के वक़्त तुम लोग ज़रूर आराम करो। इस हुक्म के पीछे जो वजह बताई गई, वो बेहद अहम है: "फ़-इन्नश-शयातीना ला तक़ीलु" यानी इसलिए कि शैतान और उसके लश्कर कभी भी दोपहर का आराम नहीं करते।
ग़ौर फ़रमाइए! यहाँ सिर्फ़ एक जिस्मानी फ़ायदे की बात नहीं की जा रही, बल्कि इस अमल को शैतान की मुख़ालफ़त भी बताया जा रहा है। इसका ख़ुलासा ये हुआ कि जब आप दुनियावी मसरूफ़ियात से कुछ देर के लिए अलग होकर, सुन्नत की नीयत से दोपहर को आराम करते हैं, तो ये आपका एक महज़ जिस्मानी फ़ेल नहीं रहता, बल्कि ये एक इबादत बन जाता है। क्यों? क्योंकि आपने वो काम किया जो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया यानी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: "क़ैलूला (दोपहर को थोड़ी देर आराम) किया करो, दोपहर में थोड़ी देर सोना आराम करना सुन्नत है और शैतान की मुखालिफत भी, क्योंकि शयातीन क़ैलूला नहीं करते। दोपहर का आराम नहीं करते।
दोपहर में सोने के फाएदे
ये रूहानी तासीर का मुआमला है। जब बंदा थोड़ी देर आराम करता है तो उसका ज़हन और जिस्म ताज़गी हासिल करते हैं। नतीजतन वो जागने के बाद बाक़ी दिन की इबादत, ख़ास तौर पर शाम की नमाज़ें और रात के नफ़्ल (तहज्जुद) ज़्यादा बेदारी और तवज्जोह के साथ अदा कर पाता है। लेकिन शैतान का काम ही ये है कि वो इंसान को थका कर, सुस्त कर के और आलस में मुब्तला करके उसे अल्लाह की याद से ग़ाफ़िल कर दे। जब आप क़ैलूला करके अपनी ताक़त बहाल करते हैं, तो गोया आप शैतानी चालों के ख़िलाफ़ अपनी एक ढाल तैयार कर रहे होते हैं।
हदीस की सेहत
ये हदीस-ए-पाक किस क़दर मज़बूत सनद के साथ हम तक पहुँची है, इसकी वज़ाहत यूँ है कि इसे बड़े बड़े मुहद्दिसीन ने अपनी किताबों में लिखी है। हवाला जात इस तरह हैं:
अल-जामेअ उस-सग़ीर लिल-सुयूती:
अल-हदीस: 6168, (मतबूआ: दारुल कुतुब अल-इल्मिय्या, बैरूत, सन-ए-तबाअत: 2004)
अल-मोजम उल-औसत लित-तबरानी:
जिल्द 1, सफ़्हा 13, अल-हदीस: 28 (मतबूआ: दार अल-हरमैन, क़ाहिरा, सन-ए-तबाअत: 1995 ई.)
शोअब उल-ईमान लिल-बैहक़ी:
जिल्द 6, सफ़्हा 181, अल-हदीस: 4403, (मतबूआ: मकतबा अल-रुश्द, रियाज़)
सहीह अल-जामेअ उस-सग़ीर लिल-अल्बानी:
अल-हदीस: 4431 (हुक्म-ए-हदीस: हसन)
और अल्लामा अल्बानी रहिमहुल्लाह ने इस हदीस को "हसन" क़रार दिया है।
तिब्बी नुकात
अब इसी मौज़ू के तहत कुछ इल्मी-ओ-तिब्बी नुकात की तरफ़ भी तवज्जोह दिलाना ज़रूरी है, ताकि हम जान लें कि दीन-ए-इस्लाम की हर बात इंसानी फ़ितरत के मुवाफ़िक़ है।
क़ैलूला का वक़्त: ये ज़वाल-ए-आफ़ताब के वक़्त या ज़ोहर की नमाज़ से पहले या बाद का मुख़्तसर आराम है, जिसका मक़सद रात की इबादत (तहज्जुद) के लिए क़ुव्वत हासिल करना है। (यहाँ ये वज़ाहत दी गई है कि क़ैलूला कोई गहरी नींद नहीं बल्कि हल्की आँख लगना है, ताकि रात की नींद पर असर न पड़े।)
शयातीन की मुख़ालफ़त: शैतान चूँकि हर वक़्त शर फैलाने में मसरूफ़ रहता है और आराम नहीं करता, इस लिए सुन्नत की नीयत से आराम करना उसकी मुख़ालफ़त है।
जदीद तिब्बी तहक़ीक़: साइंस के मुताबिक़ दोपहर का 15 से 20 मिनट का आराम (Power Nap) ब्लड प्रेशर को मुतवाज़िन रखता है, याददाश्त तेज़ करता है और दिल के दौरे के ख़तरात को कम करता है। (सुब्हान अल्लाह! आज की मेडिकल साइंस इस बात की ताईद कर रही है जो हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने चौदह सौ साल पहले बता दिया था।)
खुलासा
हमने आज क़ैलूला की मुबारक सुन्नत के बारे में पढ़ा और समझा। ये हमारे दीन की जामेइयत है कि उसने हमारी नींद और आराम को भी इबादत बना दिया, बशर्ते कि उसे सुन्नत की नीयत से किया जाए। हमें चाहिए कि हम अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इस सुन्नत पर ज़रूर अमल करें, ताकि हम तंदुरुस्त भी रहें और अपने आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुहब्बत और इताअत का सुबूत भी दे सकें।
आख़िर में, हम अपने रब करीम से यही दुआ करते हैं, या अल्लाह! हमें अपनी ज़िंदगी के हर शोबे में सुन्नत-ए-नबवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा और हमें शैतान के मक्र-ओ-फ़रेब से अपनी पनाह में रख। आमीन।
