तौबा और इस्तिग़फ़ार वह पानी है जो इंसान के गुनाहों को धो देता है इस मज़मून में तौबा की हक़ीक़त उसकी अहमियत और सच्ची तौबा क्या है और उसकी फज़ीलत व फाएदा क्या है वो बताया गया है।
तौबा और इस्तिग़फ़ार का मतलब
तौबा के मानी लौटने और पलट आने के हैं और इस्तिग़फ़ार के मानी माज़ी के गुनाहों से माफ़ी माँगना है। शरीअत में तौबा उसे कहते हैं कि ख़ौफ़ से गुनाह को छोड़ देना और उसकी कबाहत को महसूस कर के उस पर नादिम होना और इस बात का अज़्म करना कि अब बुराई का इर्तिकाब नहीं होगा। तौबा दरअसल उस दिली एहसास को कहते हैं जो गुनाहों के इर्तिकाब पर नदामत के ज़रिए पैदा होता है।
सच्ची तौबा का तकाज़ा
सच्ची तौबा का लाज़िमी तकाज़ा है कि जो बुराई पहले किसी शख्स ने की है उसकी तलाफ़ी करने की वह अपनी हद तक पूरी कोशिश करे और जहाँ तलाफ़ी की कोई सूरत मुमकिन न हो वहाँ अल्लाह से माफ़ी माँगे और ज़्यादा से ज़्यादा नेकियाँ कर के उस धब्बे को धोता रहे जो उसने अपने दामन पर लगा लिया है। लेकिन कोई तौबा उस वक़्त तक हक़ीक़ी तौबा नहीं है जब तक कि वह अल्लाह को राज़ी करने की नियत से न हो। किसी दूसरी वजह या ग़रज़ से किसी बुरे फ़ेल को छोड़ देना सिरे से तौबा की तारीफ़ में नहीं आता।
क़ुरआन में तौबा की तरगीब
क़ुरआन में अल्लाह ने बंदों को तौबा करने की तरगीब इस तरह दी है : कह दो ऐ मेरे बंदो! जिन्होंने अपनी जानों पर ज़ियादती की है और अल्लाह की रहमत से नाउम्मीद न होना अल्लाह तो सब गुनाहों को बख्शता है वह बड़ा बख्शने वाला, मेहरबान है। और एक जगह क़ुरआन में है कि : और अल्लाह से डरो बेशक अल्लाह तौबा क़बूल करने वाला और रहम करने वाला है।
दुनिया में हर इंसान गलती करता है लेकिन बेहतरीन शख्स वह है जो अपनी गलती पर अड़ा नहीं रहता बल्कि उस पर नदामत करता है। हज़रत अनस रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: हर इंसान ख़ता कार है और बेहतरीन ख़ता कार तौबा करने वाले होते हैं। (तिर्मिज़ी)
अल्लाह की तरफ लौटना
बशरी कमज़ोरी के सबब इंसान ख़ता करता है और जब उसे अल्लाह याद आता है तो वह अपने रब की तरफ लौटता है। क़ुरआन में इरशाद हुआ है: जिन का हाल यह है कि उन से जब कोई बुरा काम हो जाता है या कोई गुनाह कर के अपने ऊपर ज़ुल्म कर बैठते हैं तो उन्हें अल्लाह याद आ जाता है। वह उस से अपने गुनाहों की माफ़ी चाहते हैं और अल्लाह के सिवा कौन गुनाहों को माफ़ कर सकता है। (आले इमरान : 135)
तौबा करने वालों के लिए खुशख़बरी
जो लोग तौबा करते हैं अल्लाह तआला न सिर्फ उन्हें माफ़ कर देता है बल्कि उनकी बुराइयों को नेकियों में बदल देता है। तौबा करने के बाद जब मोमिन नेक अमल करता है तो उसके गुनाहों के बदले भी नेकियाँ लिख दी जाती है मगर यह कि जो शख्स तौबा करे ईमान ला कर अमल सालेह करने लगे तो अल्लाह ऐसे लोगों की बुराइयों को नेकियों में बदल देगा। (अल फ़ुरक़ान :170)
तौबा और कामयाबी
तौबा व इस्तिग़फ़ार करने से जहाँ गुनाह माफ़ होते हैं वहीं मोमिन के दर्जात बुलंद होते हैं और कामयाबी के रास्ते खुलते हैं। ऐ मोमिनो! तुम सब मिल कर अल्लाह से तौबा करो। तवक्को है कि फ़लाह पाओगे। (सूरए नूर : 31)
तौबा व इस्तिग़फ़ार एक ऐसी सिफ़त है जो मोमिन की शऊरी ज़िंदगी से शुरू होती है और ज़िंदगी के साथ साथ खत्म होती है और मोमिन किसी भी वक़्त इस से बेनियाज़ नहीं हो सकता। रोज़ मर्रा की ज़िंदगी में मुसलमान से छोटे छोटे गुनाह हो जाते हैं। अल्लाह की पनाह तलब करना ज़रूरी है अल्लाह हमारे गुनाहों को माफ़ फ़रमाए आमीन।
