नापाकी हालत में तावीज़ पहनने और छूने का शरई हुक्म

जानिए नापाकी जनाबत हैज़ निफ़ास की हालत में तावीज़ पहनने और छूने का शरई हुक्म, ग़िलाफ़ के साथ जाइज़ होने की शर्तें और टॉयलेट में जाने के आदाब तफ़सील मे

प्यारे क़ारईन! नापाकी की हालत में अगर गले में कोई तावीज़ लटका हो तो क्या हुक्म है क्या इसे छू सकते हैं क्या पहन सकते हैं तो इस अहम मसले को फ़िक्ह की रौशनी में सरल अंदाज़ में वाज़ेह तौर पर इस पोस्ट में बताया गया है के जनाबत की हालत में नापाकी की हालत में तावीज़ पहनने और छूने का शरई हुक्म क्या है।

मसअला

नापाकी की हालत में ऐसा तावीज़ पहनना जिस में क़ुरआनी आयात या अल्लाह का नाम लिखा हो शरअन जाइज़ है बशर्ते कि वो तावीज़ किसी चीज़ में महफूज़ हो।

यानी अगर आप नापाकी की हालत में हैं या औरत जनाबत हैज़ या निफ़ास की हालत में हैं और आप के पास ऐसा तावीज़ है जिस पर क़ुरआन की कोई आयत या अल्लाह का कोई नाम लिखा है तो उसे पहनने में कोई हर्ज नहीं लेकिन शर्त ये है कि वो तावीज़ किसी ऐसी चीज़ में बंद हो जो उसे बराहे रास्त हाथ लगने से बचाए। ये इंतिहाई अहम नुक्ता है इसे खूब समझ लीजिए।

तफ़सीली अहकाम

बराह ए रास्त लम्स (छूना) जिस काग़ज़ पर क़ुरआनी आयत लिखी हो उसे नापाकी की हालत में बगैर किसी ग़िलाफ़ के छूना नाजाइज़ है।

और तफसील से समझें। अगर वो तावीज़ खुला हुआ है यानी सिर्फ एक काग़ज़ है जिस पर कुछ लिखा है और आप नापाकी की हालत में हैं या औरत जनाबत या हैज़ की हालत में हैं तो इस काग़ज़ को बराहे रास्त हाथ लगाना जाइज़ नहीं है। क्यूँ? क्योंकि ये कलाम ए इलाही है और नापाक शख़्स के लिए अल्लाह के कलाम को बिला-वास्ता छूना दुरुस्त नहीं। ये अदब का तक़ाज़ा है।

ग़िलाफ़ के साथ हुक्म

अगर तावीज़ चमड़े में सिला हुआ हो प्लास्टिक में कोटिंग (Lamination) हो या किसी ऐसे कपड़े या डब्बी में बंद हो जो उस काग़ज़ से अलग हो तो उसे छूना और पहनना दोनों जाइज़ हैं।

लेकिन जैसे ही ये काग़ज़ किसी ग़िलाफ़ में महफूज़ हो जाए मामला बदल जाता है। फ़र्ज़ कीजिए कि तावीज़ को किसी चमड़े की थैली में रख दिया गया या प्लास्टिक की लेमिनेशन कर दी गई या किसी अलग कपड़े या डब्बी में बंद कर दिया गया जो उस काग़ज़ से जुड़ा हुआ न हो बल्कि अलग हो। अब आप उस ग़िलाफ़ को छू सकते हैं और तावीज़ को पहन कर रख सकते हैं चाहे आप नापाकी की हालत में ही क्यों न हों। ये शरीअत की तरफ से आसानी है।

ग़िलाफ़ की शर्त

फ़ुक़हा के नज़दीक ग़िलाफ़ ऐसा होना चाहिए जो काग़ज़ के साथ जुड़ा हुआ (Fixed) न हो बल्कि एक अलग ग़िलाफ़ की हैसियत रखता हो ( जैसे जुज़्दान या चमड़े की डब्बी )।

यहाँ एक बारीक सी शर्त है जिसे फ़ुक़हा ने बयान फरमाया है। वो ये कि ग़िलाफ़ इस तरह का हो जो काग़ज़ के साथ मुस्तक़िल तौर पर सिला या चिपका हुआ न हो बल्कि एक अलग चीज़ हो जिसे आप खोल कर काग़ज़ निकाल सकें। जैसे कोई जुज़्दान (पर्स) या चमड़े की डब्बी। अगर वो चमड़ा काग़ज़ के साथ ही सिल दिया गया है और अलग नहीं होता तो फिर कुछ किराहत बाक़ी रह जाती है लिहाज़ा बेहतर यही है कि अलग ग़िलाफ़ हो।

फ़िक़्ही हवाला फ़तावा आलमगीरी

जुनुबी और बे-वज़ू शख़्स के लिए क़ुरआन मजीद को छूना जाइज़ नहीं है मगर ऐसे ग़िलाफ़ के साथ जो उससे जुदा हो जैसे जुज़्दान या वो चमड़ा जो उसके साथ (मुस्तक़िल) सिला हुआ न हो यही सही क़ौल है । इसी तरह अल्हिदाया और अल्जौहरा अन्नायरा में है और इसी पर फ़तवा है। (अलफ़तावा अलहिंदिया, जिल्द 1, सफ़्हा 38)

अब आइए फ़िक़्ह की मोतबर किताब की तरफ। फ़तावा आलमगीरी (जिसे फ़तावा हिंदिया भी कहते हैं) में साफ लिखा है कि जुनुबी और बे-वज़ू शख़्स क़ुरआन मजीद को बराहे रास्त नहीं छू सकता हाँ अगर ग़िलाफ़ जुदा हो जैसे जुज़्दान या वो चमड़ा जो कि मुस्तक़िल सिला हुआ न हो तो उस की गुंजाइश है। यही सही क़ौल है और इसी पर फ़तवा है। यही क़ौल मशहूर कुतुब जैसे अल्हिदाया और अल्जौहरा अन्नायरा में भी है।

बैतुल ख़ला Toilet में दाख़िला

अगर तावीज़ चमड़े या कपड़े में सिला हुआ हो और कमीस के अंदर छुपा हुआ हो तो उसे पहन कर बैतुल ख़ला में जाने की गुंजाइश है ताहम अगर बाहर निकला हुआ हो तो उसे अंदर कर लेना या उतार देना अदब के ज़्यादा क़रीब है।

एक और अहम नुक्ता जिस पर अक्सर लोग पूछते हैं: क्या तावीज़ पहन कर टॉयलेट जा सकते हैं? तो जवाब ये है कि अगर तावीज़ किसी ग़िलाफ़ (चमड़े या कपड़े) में सिला हुआ है और वो आपकी कमीस के अंदर छुपा हुआ है तो जाने में कोई हर्ज नहीं। अलबत्ता अगर तावीज़ बाहर लटक रहा हो (मिसालन लंबी डोर में) तो बेहतर ये है कि उसे अंदर कर लें या उतार कर रख दें। ये ज़्यादा अदब वाला तरीक़ा है क्योंकि बैतुल ख़ला नजासत की जगह है और अल्लाह के कलाम को वहाँ ले जाने से बचना चाहिए।

खुलासा

असल मुमानियत बराहे रास्त क़ुरआनी हुरूफ़ को छूने की है जब वो ग़िलाफ़ में आ जाए तो हुक्म में आसानी पैदा हो जाती है।

तो दोस्तो बात बिल्कुल वाज़ेह है। असल चीज़ ये है कि अल्लाह के कलाम को बराहे रास्त हाथ न लगाया जाए जब आप नापाक हों। लेकिन जब वो कलाम किसी ग़िलाफ़ के अंदर महफूज़ हो जाए तो फिर शरीअत ने आसानी फरमा दी है। आप उस ग़िलाफ़ को छू सकते हैं तावीज़ पहन सकते हैं।

दुआई जुमला

या अल्लाह ! हमें दीन की सही समझ अता फरमा और हमें हर किस्म की ज़ाहिरी व बातिनी नापाकी और बीमारियों से अपनी पनाह में रख। आमीन

ऐ अल्लाह! हमें दीन की सही समझ दे हमें तौफ़ीक़ दे कि हम तेरे कलाम का अदब करें और हमें हर तरह की नापाकी से चाहे वो ज़ाहिरी हो या बातिनी और हर बीमारी से अपनी पनाह में रख। आमीन या रब्बल आलमीन!

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