क्या आपने कभी किसी के बुरे वक़्त पर मन ही मन खुशी महसूस की है? क्या कभी किसी की परेशानी देखकर आपके मन में यह ख़्याल आया है कि "सही हुआ उसे मिला जो चाहिए था"? अगर हाँ, तो यह ब्लॉग पोस्ट आपके लिए है। हमारे प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलेइहि व सल्लम ने एक ऐसी ही इंसानी कमज़ोरी के बारे में हमें खबरदार किया है जो हमारे ईमान और इंसानियत दोनों के लिए ख़तरनाक है। इसका नाम है "शमातत" दूसरे की मुसीबत पर खुश होना। तिर्मिज़ी शरीफ़ में दर्ज यह हदीस मुबारक हमें सिखाती है कि हमारा यह ज़हरीला रवैया हमारे लिए ही कैसे तबहकुन साबित हो सकता है। आइए, इस हदीस के रोशनी में हम अपने दिलों का इलाज करें और समझें कि एक सच्चा मोमिन दूसरों के दुख-दर्द के सामने कैसा सुलूक करना चाहिए।
इस ब्लॉग पोस्ट में हम तफ्सील से जानेंगे:
शमातत क्या है और यह हमारे दिल में कैसे पनपती है?
हदीस मुबारक की तालीमात और वार्निंग
शमातत के अख्लाकी और सामाजिक नुकसान
एक सच्चे मोमिन का दूसरों के दुख के बारे में क्या रवैया होना चाहिए
चलिए अपने दिलों के दरवाज़े खोलते हैं और इस अहम हदीस की रोशनी में अपने अमल को सुधारने की कोशिश करते हैं।
हदीस मुबारक का मफ़हूम और अलफ़ाज़
हज़रत वासिला बिन अस्क़ा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलेइहि व सल्लम ने इरशाद फ़र्माया:
ला तुज़्हिरिश्शमातता लि-अख़ीका फ़ा-यरहमहुल्लाहु व यब्तलियका
अपने (मुसलमान) भाई की मुसीबत पर ख़ुशी का इज़हार न करो वरना ऐसा न हो कि अल्लाह तआला उस पर रहम फ़रमा दे और तुम्हें (उसी तरह की) आज़माइश में डाल दे। (जामे तिर्मिज़ी, हदीस नंबर: 2506, हसन)
शमातत क्या है
शमातत के मानी हैं: किसी के दुख, तकलीफ़, नुक़सान या मुश्किल में फंसने पर ख़ुश होना उस का मज़ाक उड़ाना या यह कह कर अपनी ख़ुशी का इज़हार करना के देखा, तुम्हें हुआ क्या था? तुम्हारे साथ ही ऐसा होना था यह एक ऐसा ज़हरीला जज़्बा है जो इंसान के दिल में कीना बुग़्ज़ और हसद की बुनियाद पर पैदा होता है।
हदीस मुबारक की वज़ाहत और चंद अहम पहलू
1. अपने भाई की वुसअत: यहाँ भाई से मुराद सिर्फ़ ख़ून का रिश्ता नहीं, बल्कि हर वह शख़्स है जो मुसलमान है। इस लिए किसी भी मुसलमान के साथ शमातत का रवैया रखना इस वईद में शामिल है। बअज़ उलमा के नज़्दीक यह हुक्म आम है, चाहे वह नेक हो या गुनहगार।
2. अल्लाह की रहमत का ऐलान: हदीस का यह हिस्सा फ़ा-यरहमहुल्लाहु (कि अल्लाह उस पर रहम फ़रमा दे) बहुत ग़ौर तलब है। हम किसी की मुसीबत पर ख़ुश हो रहे हैं मगर हम यह नहीं जानते कि अल्लाह के हाँ उस का क्या मक़ाम है। हो सकता है यह मुसीबत उस के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाए उस के दरजात बुलंद कर दे और अल्लाह उसे माफ़ फ़रमा दे। फिर किसी ऐसे शख़्स की तकलीफ़ पर ख़ुश होना गोया अल्लाह की रहमत पर ऐतराज़ के मुतरादिफ़ है।
3. ख़ुद को आज़माइश में डालना: हदीस का आख़िरी हिस्सा व यब्तलियका (और तुम्हें आज़माइश में डाल दे) एक वाज़ेह इंतिबाह है। इस के दो पहलू हो सकते हैं:
दुनियावी आज़माइश: अल्लाह तआला तुम्हें भी वैसी ही या उस से बड़ी मुसीबत में मुब्तला कर दे ताकि तुम्हें एहसास हो कि दूसरे का दुख कैसा लगता है।
आख़िरत की महरूमी: अल्लाह तुम्हें अपनी रहमत से दूर कर दे और आख़िरत में तुम्हें शर्मिंदगी उठाना पड़े।
शमातत के अख़लाक़ी और मुआशरती नुक़सानात
ईमानी कमज़ोरी: यह अमल ईमान की कमज़ोरी की निशानी है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलेइहि व सल्लम ने फ़र्माया: "तुम में से कोई शख़्स उस वक़्त तक कामिल मोमिन नहीं हो सकता जब तक कि अपने भाई के लिए वही पसंद न करे जो अपने लिए पसंद करता है।" (बुख़ारी व मुस्लिम) क्या हम अपने लिए मुसीबत पसंद करते हैं? नहीं
तअल्लुकात की ख़राबी: यह रवैया मोहब्बतों को नफ़रतों में बदल देता है, भाई चारे को ख़त्म करता है और मुआशरे में फूट डालता है।
क़ल्ब की बीमारी: शमातत से दिल सख़्त हो जाता है, रहम के जज़्बात ख़त्म होते हैं और इंसान की रूहानी मौत वाक़ेह होती है।
सच्चे मोमिन का रवैया क्या होना चाहिए
एक सच्चा मोमिन वह है जो दूसरे मुसलमान भाई के दुख को अपना दुख समझे। उस का रवैया हमदर्दी और ख़ैर ख़्वाही पर मबनी हो।
दुआ करना: उस मुसीबत ज़दा भाई के लिए दुआ करें कि अल्लाह तआला उसे इस तकलीफ़ से नजात अता फ़रमाए और उसे सब्र दे। इन्नमल मोमिनूना इख़्वतुन (अल-हुजुरात:10) बेशक मोमिन आपस में भाई भाई हैं।
मदद करना: अगर मुमकिन हो तो अमली तौर पर उस की मदद के लिए आगे बढ़ें।
तसल्ली देना: उसे तसल्ली दें, नर्मी से बात करें और उस के ग़म में शरीक हों।
आख़िरी बात
प्यारे भाईओ और बहनो! हमेशा याद रखें, ज़िंदगी का पहिया घूमता रहता है। आज कोई और मुसीबत में है कल हम ख़ुद किसी आज़माइश में मुब्तला हो सकते हैं। इस लिए दूसरों के साथ वही सुलूक करें जो हम चाहते हैं कि मुश्किल के वक़्त में दूसरे हमारे साथ करें।
अल्लाह तआला हम सब को शमातत के मुहलक अमल से बचने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए, हमारे दिलों में हमदर्दी और मोहब्बत के जज़्बात पैदा फ़रमाए, और हमें अपने और अपने मुसलमान भाईयों के दुखों को दूर करने वाला बनाए।
आमीन या रब्बल आलमीन।
