क्या खतना पर मिठाई बांटना जरूरी है जानिए इस्लामी हुक्म क्या है

खतना पर मिठाई बांटना कैसा है क्या यह सुन्नत है या सिर्फ रिवाज जानिए शरीअत की रोशनी में सही हुक्म जरूरी बातें और आम गलतफहमियों का खुलासा।

आज हम बात करेंगे एक ऐसे मुद्दे पर जो हममें से तकरीबन हर किसी की ज़िंदगी में कभी न कभी आता है। घर में खुशी का मौका हो, बच्चे का खतना हो, तो मिठाई बांटना आम बात है। लेकिन क्या यह सिर्फ एक रिवाज है? क्या इसका इस्लाम में कोई दर्जा है? कहीं हम इसे ज़रूरी तो नहीं समझ बैठते? चलिए, इन सवालों को थोड़ा तफसील से समझते हैं।

खतना क्या है?

खतना सुन्नत है और हमारे दीन इस्लाम  का "शिआर" यानी पहचान है। जैसे अज़ान, ईद की नमाज़, वगैरह ये सब इस्लाम की निशानियाँ हैं, वैसे ही खतना भी है। यही वजह है कि आम बोलचाल में इसे "मुसलमानी" भी कहा जाता है। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की यह सुन्नत है,सेहत के लिहाज़ से भी यह बेहद फायदेमंद है, और इस्लाम की पहचान है।

खतना के मौक़े पर मिठाई बांटना कैसा है?

अक्सर लोग पूछते हैं कि खतना के मौके पर मिठाई बांटना, दावत देना—यह सब इस्लाम में कैसा है? तो इसका सीधा-सा जवाब है: जाइज़ है, बल्कि एक अच्छी आदत है। जब हम कोई नेक काम पूरा करते हैं, तो अल्लाह का शुक्र अदा करना और खुशी मनाना फितरी बात है। खतना जैसी अहम सुन्नत पर अमल हो, तो चंद मिठाई के दाने बांटकर, रिश्तेदारों-दोस्तों को बुलाकर खुशी का इज़हार करना—यह सब इस बात की निशानी है कि हम इस्लाम की इस पहचान पर फख्र महसूस करते हैं और अल्लाह का शुक्र कर रहे हैं।

हमारे ओलामा ए किराम ने भी इसे साफ तौर पर जाइज़ कहा है। "बहार-ए-शरीअत" में है: "खतना सुन्नत है और यह शिआर-ए-इस्लाम में से है कि मुसलमान और ग़ैर-मुसलमान में इससे इम्तियाज़ (फर्क) होता है। इसी लिए आम लोग इसे 'मुसलमानी' भी कहते हैं। (बहार-ए-शरीअत, जिल्द 3, पेज 589) और "फतावा-ए-अमजदिया" में है: "खतना सुन्नत है और शिआर-ए-इस्लाम से है इसलिए लोग इसे सुन्नत और मुसलमानी भी कहते हैं... इसमें खुशी करना, मिठाई बांटना, अअज़्ज़ा-अहबाब (रिश्तेदारों और दोस्तों) की दावत करना जाइज़ है।

(फतावा-ए-अमजदिया, जिल्द 2, पेज 229)

यहाँ एक बहुत ज़रूरी बात समझ लें

शरीअत ने इस काम को जाइज़ तो कहा है, लेकिन इसे वाजिब या ज़रूरी नहीं कहा है। यानी:जाइज़ है – मिठाई बांटना, दावत देना। अगर कोई ऐसा करे, तो यह खुशी जाहिर करने का एक अच्छा तरीका है। इस मौके पर मिठाई तकसीम करने को ज़रूरी समझना यह गलत है। अगर कोई मिठाई न बांटे, तो न उस पर कोई गुनाह है, न उसके खतने में कोई कमी आती है।

आजकल की आम गलतफहमियाँ

लेकिन आजकल कुछ लोगों में यह बात देखने में आती है कि मानो बिना मिठाई बांटे खतना पूरा ही नहीं होता। कई बार लोग दिखावे के चक्कर में इतना खर्च कर बैठते हैं कि उनकी हैसियत से बाहर हो जाता है, कर्ज़ लेना पड़ता है। यह बिल्कुल गलत है। शरीअत में इस तरह के दिखावे और बोझ की कोई गुंजाइश नहीं है। असली मकसद अल्लाह की रज़ा के लिए सुन्नत पर अमल करना है—बाकी सब कुछ लवाज़िमात है।

कुछ ज़रूरी बातें, जो हमेशा याद रखें

यह काम सिर्फ अल्लाह की रज़ा और उसकी नेमत का शुक्र अदा करने के लिए करें, न कि दिखावे या रिवाज के लिए। जितना हो सके उतना करें। थोड़ी सी मिठाई से भी खुशी जाहिर की जा सकती है। कर्ज़ लेकर तबाही मोल लेना अक्लमंदी नहीं। मिठाई और दावत सिर्फ ज़ायका हैं, मकसद नहीं। मकसद है अल्लाह और उसके रसूल के हुक्म पर अमल करना।

आखिर में

प्यारे भाइयों और बहनों, हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि: खतना सुन्नत और शिआर ए इस्लाम पहचान है। इस मौके पर खुशी जाहिर करना, मिठाई बांटना, दावत देना जाइज़ है। लेकिन इसे लाजिमी और ज़रूरी  समझना गलत है। हमेशा नीयत को दुरुस्त रखें और अपनी हैसियत का ख्याल करें। असल मकसद यह नहीं कि "लोग क्या कहेंगे", बल्कि यह है कि अल्लाह हमारे अमल को कबूल फरमाए।

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