आज हम एक ऐसे अहम मसअले पर रौशनी डालेंगे जो हमारी बहनों बेटियों और हमारे घरों की औरतों की इज़्ज़त हया और पर्देदारी से जुड़ा है। ये मसअला है "अजनबी मर्द से औरत या बालिग़ा लड़की का कान छिदवाना"। आजकल बाज़ारों में दुकानों पर और कई जगहों पर ये आम हो गया है कि औरतें ग़ैर-महरम मर्दों से अपने कान छिदवाती हैं और इसे एक मामूली बात समझती हैं। लेकिन शरीअत-ए-मुतह्हरा ने हमारे लिए पर्दे और हया की जो हदें मुक़र्रर की हैं, उनकी रौशनी में ये अमल बिल्कुल नाजाइज़ और सख़्त हराम है। आइए, इस मसअले को क़ुरआन-ओ-हदीस और अपने अकाबिरीन के फ़तावा की रौशनी में तफ़सील से समझते हैं।
ना महरम से औरत या बालिग़ा लड़की का कान छिदवाना हराम
मसअला: औरत के कान "सत्र" (पर्दे) में शामिल हैं, लिहाज़ा किसी भी बालिग़ा औरत या क़ाबिल-ए-शहवत लड़की के लिए ये सख़्त हराम है कि वो किसी अजनबी (गैर,महरम) मर्द से अपने कान छिदवाए। इस फ़ेल में मर्द (छूने वाला) और औरत (छुवाने वाली) दोनों गुनहगार होंगे और दोनों पर तौबा वाजिब है। ये हुक्म बिल्कुल साफ़ और वाज़ेह है। औरत के कान उसके सत्र यानी उसके जिस्म के उन हिस्सों में से हैं जिनका छुपाना शरीअत ने फ़र्ज़ किया है। जब कोई औरत किसी ग़ैर-महरम मर्द से अपने कान छिदवाती है, तो इस अमल में दो बड़े गुनाह लाज़िमी तौर पर शामिल हो जाते हैं: एक तो ये कि वो मर्द उस औरत के कान को छूता है, जो कि लम्स-ए-ना,महरम और हराम है। दूसरे ये कि वो मर्द उसके कान को देखता भी है, जो कि बेपर्दगी और सत्र का इज़हार है। ये दोनों चीज़ें शरीअत में सख़्त मना हैं। इसलिए न तो किसी मुसलमान औरत को ऐसा करना चाहिए और न ही किसी मुसलमान मर्द को ऐसी कोई दुकान या काम करना चाहिए जिसमें उसे ग़ैर-महरम औरतों को छूना पड़े। दोनों ही इस गुनाह में बराबर के शरीक होंगे और दोनों पर सच्ची तौबा करना वाजिब होगा।
शरई वुजूहात का ब्यान
अब हम इस मसअले की शरई वजहें बयान करते हैं ताकि हर कोई समझ सके कि ये अमल क्यों हराम है:
1. लम्स-ए-नामहरम: नामहरम औरत को छूना शरअन मम्नूअ है, जबकि कान छिदवाने में मर्द का औरत के कान को छूना और देखना दोनों लाज़िम आते हैं।
2. सत्र का इज़हार: फ़ुक़हा के नज़दीक औरत के कान का हर हिस्सा सत्र है, जिसे ग़ैर मर्द के सामने खोलना जाइज़ नहीं।
3. मुतबादिल मौजूद है: चूँकि ये काम औरतें या महरम मर्द (अगर वो जानते हों) कर सकते हैं, इसलिए अजनबी मर्द की तरफ़ रुजू करना "ज़रूरत-ए-शरई" में शुमार नहीं होता।
ये तीनों वजहें बहुत जामेअ और अहम हैं। पहली वजह ये कि शरीअत ने ग़ैर-महरम मर्द और औरत का एक दूसरे को छूना हराम किया है। दूसरी वजह ये कि औरत के कान उसके सत्र में शामिल हैं, और सत्र को ग़ैर-महरम के सामने खोलना जाइज़ नहीं है। और तीसरी वजह ये कि शरीअत उसी वक़्त इजाज़त देती है जब कोई ज़रूरत-ए-शरई हो, और उसका कोई हलाल बदल मौजूद न हो। लेकिन यहाँ तो कान छिदवाने का हलाल बदल मौजूद है। बहुत सी औरतें हैं जो ये काम जानती हैं और करती हैं, या फिर औरत अपने किसी महरम जैसे बाप भाई या शौहर से भी ये काम करवा सकती है। इसलिए किसी ग़ैर-महरम मर्द के पास जाने की कोई ज़रूरत ही नहीं है।
लोहे का सूआ चुभो दिया जाए
हदीस ए मुबारक में है : عن معقل بن يسار رضي الله عنه قال: قال رسول الله ﷺ:"لَأَنْ يُطْعَنَ فِي رَأْسِ أَحَدِكُمْ بِمِخْيَطٍ مِنْ حَدِيدٍ، خَيْرٌ لَهُ مِنْ أَنْ يَمَسَّ امْرَأَةً لَا تَحِلُّ لَهُ" हज़रत माक़िल बिन यसार रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: "तुम में से किसी के सर में लोहे का सूआ (बड़ी सूई) चुभो दिया जाए, ये उसके लिए इससे बेहतर है कि वो किसी ऐसी औरत को छुए जो उसके लिए हलाल न हो। (अल-मोजम अल-कबीर लित-तबरानी, रक़्म अल-हदीस: 486)
ग़ौर फ़रमाइए इस हदीस-ए-पाक पर। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमा रहे हैं कि अगर किसी मर्द के सर में लोहे की बड़ी सूई चुभो दी जाए, तो ये सख़्त तकलीफ़ और दर्द की बात है। लेकिन हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमा रहे हैं कि ये दर्द और ये तकलीफ़ भी उस मर्द के लिए इससे बेहतर और कम है कि वो किसी ऐसी औरत को छुए जो उसके लिए हलाल न हो। इसका मतलब ये हुआ कि ग़ैर-महरम औरत को छूना लोहे की सूई के सर में चुभने से भी ज़्यादा बुरा और सख़्त गुनाह है। अब सोचिए कि जब सिर्फ़ छूना इतना बड़ा गुनाह है, तो फिर कान छिदवाने के लिए बार-बार छूना और देखना कितना बड़ा गुनाह होगा। इसलिए इससे हर हाल में बचना ज़रूरी है।
फ़तावा ए रिज़विय्या की रौशनी में
इसी तरह हमारे अकाबिरीन ने भी इस मसअले पर बहुत वाज़ेह फ़तवा दिया है। चुनाँचे इमाम अहले-सुन्नत इमाम अहमद रज़ा ख़ान अलैहिर्रहमा फ़रमाते हैं: जिन आज़ा का छुपाना फ़र्ज़ है, उनमें से कुछ खुला हो... तो इस तौर पर तो औरत को ग़ैर महरम के सामने जाना मुतलक़न हराम है, ख़्वाह वो पीर हो या आलिम, या आमी, जवान हो या बूढ़ा। (फ़तावा-ए-रिज़विय्या, जिल्द 22, सफ़्हा 240-239, रज़ा फ़ाउंडेशन, लाहौर)
ग़ौर फ़रमाइए,आला हज़रत फ़रमाते हैं कि औरत के जिस्म का जो हिस्सा छुपाना फ़र्ज़ है, अगर उसमें से थोड़ा-सा भी खुल जाए, तो उस हालत में औरत का ग़ैर-महरम के सामने जाना बिल्कुल हराम है, चाहे वो ग़ैर-महरम कोई बुज़ुर्ग हो, आलिम हो, जाहिल हो, जवान हो या बूढ़ा। कान भी उन्हीं आज़ा में से हैं जिनका छुपाना फ़र्ज़ है। इसलिए जब औरत अपने कान छिदवाने के लिए किसी ग़ैर-महरम मर्द के सामने जाती है और अपने कान खोलती है, तो ये अमल आला हज़रत के फ़तवे के मुताबिक़ मुतलक़न हराम है।
हुक्म ए शरई का ख़ुलासा और ज़रूरी वज़ाहत
अब हम इस पूरे मसअले का ख़ुलासा और एक ज़रूरी वज़ाहत पेश करते हैं: हुक्म-ए-शरई का ख़ुलासा: औरतों को चाहिए कि वो कान या नाक छिदवाने के लिए किसी माहिर औरत ही से अपने कान छिदवाए या अपने किसी महरम (बाप, भाई, शौहर वग़ैरा) की मदद लें। दुकानों पर जा कर ग़ैर मर्दों से ये काम करवाना बेपर्दगी और मासियत का बाइस है। तो दोस्तों हमें चाहिए कि हम अपने घरों की औरतों और बेटियों को समझाएँ कि वो अपने कान या नाक छिदवाने के लिए किसी औरत के पास जाएँ, न कि किसी ग़ैर-महरम मर्द के पास। और अगर कोई औरत न मिले तो अपने किसी महरम जैसे बाप, भाई या शौहर से ये काम करवा लें। लेकिन ग़ैर-महरम मर्द के सामने जाना और अपने कान छिदवाना हरगिज़ जाइज़ नहीं है।
यह भी जान लें के काबिले शहवत लड़की से मुराद कौन है, क़ाबिल-ए-शहवत लड़की से मुराद वो लड़की है जो सन्न-ए-बुलूग़ के क़रीब हो या इतनी बड़ी हो कि उसे देख कर रग़बत पैदा हो सके। ये वज़ाहत इसलिए ज़रूरी है ताकि लोग ये न समझें कि ये हुक्म सिर्फ़ बड़ी औरतों के लिए है। बल्कि जो लड़की बालिग़ होने के क़रीब हो या जिसे देख कर शहवत पैदा हो सकती हो, उसके लिए भी यही हुक्म है कि वो किसी ग़ैर-महरम मर्द से अपने कान न छिदवाए।
अल्लाह के नेक बंदो और ईमान वालो
हमने आज रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हदीस और अपने अकाबिरीन के फ़तावा की रौशनी में ये जाना और समझा कि किसी भी बालिग़ा औरत या क़ाबिल-ए-शहवत लड़की का किसी ग़ैर-महरम मर्द से अपने कान छिदवाना सख़्त हराम और नाजाइज़ है। इस अमल में बेपर्दगी, लम्स-ए-ना,महरम और सत्र के इज़हार जैसे कई बड़े गुनाह है। हमें चाहिए कि हम अपनी बहनों, बेटियों और घर की औरतों को इस गुनाह से बचाएँ और उन्हें समझाएँ कि वो इस काम के लिए किसी औरत या अपने किसी महरम का ही सहारा लें। यही हमारी इज़्ज़त, हमारी हया और हमारे दीन की हिफ़ाज़त है। या अल्लाह! हमें अपनी औरतों की इसमत व हया की हिफ़ाज़त करने और शरई हदूद में रहने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा। आमीन।
