हालत ए जनाबत में दुबारा सोहबत या सोने का शरई हुक्म और मसनून तरीका

हदीस और फ़िक़ह की रौशनी में जानिए हालत ए जनाबत में दुबारा सोहबत या सोने का शरई और मसनून तरीका आसान अंदाज़ में!

मुहतरम कारईन! इस्लाम एक मुकम्मल दीन है जो इंसान की ज़िंदगी के हर पहलू में रहनुमाई फ़रमाता है, चाहे वह इबादत हो या मुआशरती और घरेलू ज़िंदगी। तहारत (पाकीज़गी) का मसअला भी इन्हीं अहम बाबात में से है, जिस पर शरीअत ने रहनुमाई फरमाई है। अक्सर लोग हालत-ए-जनाबत में दोबारा सोहबत या सोने के बारे में उलझन का शिकार रहते हैं। आज हम क़ुरआनो हदीस और फ़िक़्ह की रौशनी में इस मसअले को आसान और वाज़ेह अंदाज़ में समझेंगे, ताकि हम अपनी ज़िंदगी को शरीअत के मुताबिक़ गुज़ार सकें।

हालत ए जनाबत में मस्नून तरीका क्या है

मसअला: जिस शख़्स पर ग़ुस्ल वाजिब हो (जुन्बी), उसके लिए ग़ुस्ल से पहले दोबारा अपनी अहलिया से क़ुर्बत इख़्तियार करना या सो जाना शरअन जाइज़ है, लेकिन अफ़ज़ल और मस्नून ये है कि पहले वुज़ू कर लिया जाए।
दोस्तों, ग़ौर फ़रमाइए कि शरीअत ने हालत ए जनाबत में दोबारा सोहबत करने या सो जाने को हराम या मना नहीं किया, बल्कि उसे जाइज़ रखा। लेकिन साथ ही हमें एक बेहतर और मुस्तहब तरीक़ा भी बताया कि ऐसा करने से पहले वुज़ू कर लिया जाए। ये शरीअत की वुसअत और हमारी ज़िंदगी के हर पहलू में रहनुमाई का एक और वाज़ेह सबूत है।

वुज़ू करने के शरई और तिब्बी फ़वाइद

अब इस मसनून तरीक़े में जो शरई और तिब्बी फ़वाइद हैं, उनको भी पढ़ते चलें:
नशात और चुस्ती: हदीस ए मुबारका में वुज़ू करने का हुक्म इसलिए दिया गया है ताकि इंसान दोबारा चुस्त हो जाए और सुस्ती दूर हो जाए। (वुज़ू इंसान के आलस और काहिली को दूर करके उसमें ताज़गी और नई ताक़त पैदा कर देता है, जिससे वो दोबारा अपनी अहलिया की तरफ़ रुजू कर सके या सुकून से सो सके।)
ख़िलाफ़ ए औला: बग़ैर वुज़ू या बग़ैर हाथ-मुँह धोए दोबारा सोहबत करना या सो जाना "ख़िलाफ़ ए औला" यानी पसंदीदा अमल के ख़िलाफ़ है, लिहाज़ा कम से कम कुल्ली करना और हाथ धोना ज़रूरी है। इससे यह मालूम हुआ कि एक मोमिन को हर हाल में पाकीज़गी और सफ़ाई का एहतिमाम करना चाहिए।

हदीस से दलील अरबी इबारत के साथ

इस मसअले की बुनियाद एक सहीह हदीस है जो इस तरह है: عَنْ أَبِي سَعِيدِ الْخُدْرِيِّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: "إِذَا أَتَى أَحَدُكُمْ أَهْلَهُ، ثُمَّ أَرَادَ أَنْ يَعُودَ، فَلْيَتَوَضَّأْ" (सहीह मुस्लिम, अल-हदीस: 707 | सुनन अबी दाऊद, अल-हदीस: 220)
हज़रत अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: जब तुम में से कोई अपनी अहलिया (बीवी) के पास जाए, फिर वो दोबारा जाने का इरादा करे, तो उसे चाहिए कि वुज़ू कर ले।
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें हालत ए जनाबत में दोबारा सोहबत करने से पहले वुज़ू कर लेने का हुक्म फ़रमाया है। इस हुक्म में हमारे लिए जिस्मानी और रूहानी, दोनों तरह के फ़वाइद हैं।

फ़िक़ही सराहत फ़तावा हिंदिया की रौशनी में

इस हदीस की रौशनी में फ़ुक़हा ए किराम ने भी इस मसअले की वज़ाहत फ़रमाई है। चुनाँचे फ़तावा-ए-हिंदिया में है: फ़ुक़हा ए किराम फ़रमाते हैं कि वुज़ू करने से क़ब्ल सोने या अपनी बीवी से (दोबारा) सोहबत करने में हरज नहीं लेकिन अगर वुज़ू कर लिया जाए तो ये ज़्यादा बेहतर और मुस्तहब है। (अल-फ़तावा अल-हिंदिया, जिल्द 1, सफ़्हा 16)
तो इस से मालूम हुआ कि वुज़ू किए बग़ैर भी ये काम करना जाइज़ है, लेकिन अफ़ज़ल और बेहतर यही है कि वुज़ू कर लिया जाए।

मजबूरी की सूरत में आसान हुक्म

अब इस मसअले से जुड़ी एक अहम वज़ाहत जिसे जानना ज़रूरी है: अगर कोई शख़्स ग़ुस्ल या वुज़ू करने की ताक़त न रखता हो (मसलन सर्दी या बीमारी की वजह से) तो उसे चाहिए कि कम से कम तयम्मुम कर ले या हाथ-मुँह धो कर कुल्ली कर ले। ये उन लोगों के लिए है जो किसी मजबूरी की वजह से वुज़ू नहीं कर सकते। ऐसी सूरत में भी शरीअत ने रहनुमाई फरमाई, और तयम्मुम या हाथ-मुँह धोने की सूरत में एक आसान रास्ता फ़रमा दिया।

इस मसअले की अहमियत और हवाला

इस तहारत और पाकीज़गी से जुड़ा ये मसअला इतना अहम है कि इमाम मुस्लिम रहमतुल्लाह अलैहि ने इसे सहीह मुस्लिम में किताब अल-हैज़ में दर्ज किया है, जहाँ तहारत के बारीक और अहम अहकाम बयान किए गए हैं।

इख्तितामी कलाम

क़ाराईन हमने इस पोस्ट में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हदीस मुबारक और फ़िक़ह की रौशनी में हालत ए जनाबत में दोबारा सोहबत या सोने के शरई हुक्म और मस्नून तरीक़े को जाना और समझा। दोस्तों इस्लाम इंसान की ज़िंदगी के हर पहलू में रहनुमाई फ़रमाता है, यहाँ तक कि हमारी निजी और ख़ानगी ज़िंदगी के बारे में भी रहनुमाई फरमाई। हमें चाहिए कि हम इन मस्नून तरीक़ों को अपनाएँ ताकि हमारी ज़िंदगी में पाकीज़गी, बरकत और चुस्ती क़ायम रहे।
हम अल्लाह तआला की बारगाह में यही दुआ करते हैं: "या अल्लाह! हमें अपने हबीब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नतों पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा और हमें पाकीज़गी और आफ़ियत वाली ज़िंदगी नसीब फ़रमा। आमीन।

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