प्यारे इस्लामी भाइयो और बहनो! क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे ईमान की सबसे निचली शाखा क्या है? या फिर यह कि एक ऐसा अमल जो बाज़ाहिर बिल्कुल मामूली लगता है, अल्लाह के यहाँ इतना अज़ीम दर्जा रखता है कि एक नेकी पर दस गुना सवाब मिले, ईमान का हिस्सा कहलाए, बख्शिश का ज़रिया बन जाए, और सदक़े का सवाब भी दे जाए? यह अमल कोई बड़ी मशक्कत वाली इबादत नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हर किसी के बस की चीज़ है और वह क्या है वह रास्ते से तकलीफ़देह चीज़ हटाना है।
हाँ, वही एक काँटा, एक पत्थर, शीशे का टुकड़ा, केले का छिलका, या गंदगी जो किसी राहगीर को ठोकर लगा सकती है, गिरा सकती है, या तकलीफ़ पहुँचा सकती है। इस्लाम ने इस छोटे-से काम को इतना बड़ा बना दिया है कि यह हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत है, ईमान की सत्तर से अधिक शाखाओं में से एक शाखा है, और इसके करने वाले के लिए दस गुना नेकियों का वादा है। फ़िक़्ह की किताबों में इसे “दीन का हिस्सा” कहा गया है, और हदीसों में एक शख़्स की मग़फिरत की मिसाल आती है जिसे महज़ इसी अमल की बदौलत बख्श दिया गया।
आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम इन सभी पहलुओं को तफ़सील से समझेंगे—हदीसों की रौशनी में, फ़िक़्ही ज़बान में, और अपनी ज़िंदगी से जोड़ते हुए। ताकि हम जान सकें कि कैसे एक छोटा-सा काम हमारे नामे-आमाल में नेकियों का इज़ाफा कर सकता है, और हमें अल्लाह की रज़ा और उसकी खुशनुदी हासिल हो जाए। आइए, इस नेक अमल की अहमियत को समझें और इस पर अमल की कोशिश करें।
एक नेकी दस का सवाब
हज़रत अबू उबैदा बिन जर्राह रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:
مَنْ مَازَ أَذًى عَنْ طَرِيقٍ ، فَلَهُ حَسَنَةٌ، وَالْحَسَنَةُ بِعَشْرِ أَمْثَالِهَا
तर्जुमा: “जिस शख़्स ने रास्ते से कोई तकलीफ़देह चीज़ दूर की, तो उसके लिए एक नेकी लिखी जाएगी, और एक नेकी का सवाब उस जैसी दस नेकियों के बराबर है।
(मुस्नद अहमद, हदीस: 1700 – और मुहक़्क़िक़ीन के नज़दीक यह हदीस ‘हसन’ दर्जे की है)
इस हदीस में दो बातें ग़ौरतलब हैं
पहली. *माज़ा* यानी हटाना – यहाँ पर ज़ोर अमल पर है। सिर्फ़ यह सोचना कि “हाँ, यह तो अच्छा है” काफ़ी नहीं; असल में उसे हाथ से हटाना है, चाहे वह पत्थर हो, काँटा हो या गंदगी।
दूसरी. *एक नेकी, दस का सवाब* – अल्लाह ने कुरआन में वादा किया है कि जो एक नेकी लेकर आएगा, उसे दस गुना मिलेगा। यह हदीस उसी कुरआनी उसूल की मिसाल है।
ईमान की शाखाओं में से एक
जहाँ इस अमल पर सवाब है यानी रास्ता से तकलीफ देह चीज़ हटाने में सवाब है वहीँ यह काम यह अमल हमारे ईमान का ही एक हिस्सा है। सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम में हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:
الْإِيمَانُ بِضْعٌ وَسَبْعُونَ شُعْبَةً ... وَأَدْنَاهَا إِمَاطَةُ الْأَذَى عَنِ الطَّرِيقِ
तर्जुमा: “ईमान की सत्तर से कुछ ऊपर शाखाएँ हैं... और उनमें से सबसे अदना शाखा रास्ते से तकलीफ़देह चीज़ हटाना है।
सोचिए! जब हम रास्ते से एक काँटा हटाते हैं, तो जहां इस पर सवाब है वहीँ यह ईमान का एक जुज़ भी है। इसलिए यह अमल किसी मामूली चीज़ से कम नहीं।
यह ‘दीन’ का हिस्सा है
अब यही मसअला फ़िक़्ह की किताबों में क्या है? *फ़तावा हिंदिया* (जो हनफ़ी फ़िक़्ह की बहुत मानी हुई किताब है) में साफ़ लिखा है:
"إِمَاطَةُ الْأَذَى عَنِ الطَّرِيقِ مِنَ الدِّينِ"
यानी “रास्ते से तकलीफ़देह चीज़ दूर करना दीन (मज़हब) का हिस्सा है।
साथ ही उसी किताब में यह भी बयान किया गया है कि रास्ते में ऐसी चीज़ डालना जिससे लोगों को रुकावट या तकलीफ़ हो, *नाजायज़ और गुनाह* है, और उसे हटाना *कार-ए-सवाब* है। यानी इस्लाम सिर्फ़ हटाने का हुक्म नहीं देता, बल्कि खुद डालने को मना करता है। कितनी बड़ी बात है कि एक मुसलमान दूसरे के रास्ते में रुकावट डालने से बचे और अगर कहीं तकलीफ देने वाली चीज़ पड़ी हो तो उसे हटाने में जल्दी करे।
(हवाला: अल-फ़तावा अल-हिंदिया, जिल्द 5, सफ़्हा 342)
मग़फिरत का ज़रिया
हदीस में एक बहुत प्यारा वाक़िया आता है कि एक शख़्स को महज़ इस वजह से बख्श दिया गया कि उसने रास्ते से काँटों से भरी हुई एक टहनी हटा दी थी, ताकि मुसलमानों को तकलीफ़ न हो। इस वाक़िया से हमें मालूम हुआ कि अल्लाह के यहाँ छोटे अमल की बड़ी क़द्र है। जब एक काँटों भरी टहनी हटाने पर बख्शिश हो गई, तो हम रोज़ाना कितने ऐसे मौके गँवा देते हैं, जो हमारे लिए निजात का ज़रीया हो सकते थे।
सदक़ा का सवाब
हम अक्सर सोचते हैं कि सदक़ा सिर्फ़ माल से दिया जाता है, लेकिन अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें सिखाया कि हर वह अमल जो मख़लूक़-ए-ख़ुदा (अल्लाह की मख़लूक़) को आसानी पहुँचाए, वह अल्लाह के यहाँ सदक़ा का दर्जा रखता है। रास्ते से कोई तकलीफ़देह चीज़ हटाना भी एक सदक़ा है। कितना आसान है न? बिना जेब से एक पैसा निकाले, बिना किसी बड़ी तैयारी के, हम दस गुना सवाब और सदक़े का सवाब दोनों कमा सकते हैं।
यह अमल क्यों इतना अज़ीम है
इस अमल की अज़मत के पीछे एक बड़ी हिकमत यह भी है कि *तकलीफ़ को दूर करने* का अमल है। इस्लाम खैर ख्वाही का दीन है। जब हम रास्ते से एक पत्थर हटाते हैं, तो हम न जाने कितने लोगों को ठोकर लगने, गिरने, या ज़ख्मी होने से बचाते हैं। यही वो सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी है जो इस्लाम हमें सिखाता है। एक मुसलमान सिर्फ़ अपनी ज़ात के लिए नहीं जीता, बल्कि वह दूसरों की आसानी के लिए कोशाँ रहता है।
तहक़ीक़ी हवाले एक नज़र में
इस मज़मून में जितनी भी बातें पेश की गई हैं, वे दरज-ज़ेल किताबों पर मबनी हैं:
1. मुस्नद अहमद बिन हनबल, हदीस: 1700 – हसन दर्जा
2. सहीह बुखारी, किताब-उल-ईमान, हदीस: 9
3. सहीह मुस्लिम, किताब-उल-ईमान, हदीस: 35
4. अल-फ़तावा अल-हिंदिया (आलमगीरी) , जिल्द 5, सफ़्हा 342
5. बहार-ए-शरीअत, जिल्द 3, हिस्सा 16, सफ़्हा 603 (मकतबा-ए-मदीना)
आज के लिए अमली पैग़ाम
दोस्तो! हम रोज़ कितनी बार सड़कों, गलियों, बाज़ारों से गुज़रते हैं? फुटपाथ पर शीशे के टुकड़े, बीच रास्ते में पड़ा पत्थर, सड़क पर गिरा केले का छिलका, या कहीं काँटों वाली टहनी। हम शिकायत तो खूब करते हैं कि लोग रास्ते गंदे कर देते हैं, लेकिन क्या हमने कभी उसे हटाने की ज़हमत उठाई?
आज से हम यह तय कर लें कि हर उस चीज़ को जो किसी के लिए तकलीफ़ का सबब बन सकती है, हम हटा देंगे। चाहे वह हमारी गली हो या कोई सार्वजनिक जगह। यह अमल न सिर्फ़ हमारे लिए सवाब का ज़रिया बनेगा, बल्कि इस से दूसरों का भला होगा।
इख़्तिताम और दुआ
आख़िर में हम अपने रब से दुआ करते हैं:
या अल्लाह! हमें रास्ते की हर उस चीज़ को हटाने वाला बना जो तेरे बंदों को तकलीफ़ देती है। हमारे ईमान को मज़बूत फरमा, हमें हर छोटे बड़े नेक अमलों की अहमियत समझने की और उन पर अमल की तौफीक़ अता फरमा। हमारी इन छोटी-सी कोशिशों को अपनी बारगाह में क़बूल फरमा और हमारे लिए ज़रिया ए निजात बना। आमीन।
दोस्तों इस्लाम ने हमें सिखाया है कि दूसरों का दुख दूर करना भी इबादत है। रास्ते का एक काँटा हटाने से जहाँ दुनिया में किसी का भला होता है, वहीं आख़िरत में हमारे लिए निजात का सामान बन जाता है। आइए, आज से हम इस सुन्नत को अपनी आदत बना लें।
