वुज़ू के आज़ा को तरतीब से धोना सुन्नत ए मुअक्कदा है

मसअला: फ़िक़ह ए हनफ़ी के मुताबिक़ वुज़ू के आज़ा को क़ुरआन करीम में बयान करदा तरतीब के मुताबिक़ धोना सुन्नत ए मुअक्कदा है।

आज के इस ब्लॉग पर हम तहारत और वुज़ू के एक अहम मसअले पर रौशनी डालेंगे जो अक्सर लोगों के ज़हन में परेशानी और शुबहात का बाइस बन जाता है। ये मसअला है "वुज़ू में आज़ा की तरतीब बदलने का शरई हुक्म" हम सब जानते हैं कि वुज़ू नमाज़ की कुंजी है और इसे हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बताए हुए तरीक़े के मुताबिक़ अदा करना हर मुसलमान के लिए लाज़िम है। लेकिन कभी-कभी भूल-चूक या नादानी में इंसान वुज़ू के आज़ा की तरतीब को बदल देता है। ऐसे में ये सवाल पैदा होता है कि क्या उसका वुज़ू हो गया या नहीं, और शरीअत में इसका क्या हुक्म है। आइए, फ़िक़ह ए हनफ़ी की मोतबर किताबों की रौशनी में इस मसअले को तफ़सील से समझते हैं।

मसअला और उसकी तफसील

सबसे पहले हम इस मसअले का असल हुक्म और उसकी तफ़सील पेश करते हैं:

मसअला: फ़िक़ह ए हनफ़ी के मुताबिक़ वुज़ू के आज़ा को क़ुरआन करीम में बयान करदा तरतीब के मुताबिक़ धोना सुन्नत ए मुअक्कदा है। अगर कोई शख़्स भूले से या नादानी में तरतीब बदल दे (मसलन पहले पाँव धो ले और फिर चेहरा) तो उसका वुज़ू हो जाएगा लेकिन सुन्नत ए मुअक्कदा छूटने की वजह से ये अमल नापसंदीदा है।

ये हुक्म बिल्कुल साफ़ और वाज़ेह है। हनफ़ी फ़िक़ह के मुताबिक़ वुज़ू में आज़ा की तरतीब यानी पहले चेहरा, फिर हाथ, फिर सर का मसह, फिर पाँव धोना, ये सुन्नत ए मुअक्कदा है। इसका मतलब ये है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी पूरी ज़िंदगी में वुज़ू इसी तरतीब से किया और इसी तरह करने की ताकीद फ़रमाई। इसलिए जान-बूझ कर इस तरतीब को बदलना मकरूह और नापसंदीदा है। लेकिन अगर कोई शख़्स भूले से या नादानी में तरतीब बदल देता है, मसलन पहले पाँव धो लेता है और बाद में चेहरा, तो उसका वुज़ू फ़ासिद नहीं होता बल्कि वुज़ू हो जाता है और उससे नमाज़ पढ़ी जा सकती है। हाँ उसे ये अहसास रहना चाहिए कि उसने एक सुन्नत ए मुअक्कदा को छोड़ दिया और  ये अमल नापसंदीदा है।

मसअला की अहम वज़ाहत

अब इस मसअले की दो बहुत ज़रूरी वज़ाहतें हैं जिन्हें समझना हर मुसलमान के लिए ज़रूरी है:

1. आदत बनाना:

अगर कोई शख़्स जान-बूझ कर या सुन्नत की परवाह न करे और उसे मामूल बना ले, तो वो सुन्नत ए मुअक्कदा के तारिक होने की बिना पर गुनहगार होगा।

वज़ाहत, अगर किसी से भूल-चूक हो गई, तो वो माफ़ है। लेकिन अगर कोई शख़्स जान-बूझ कर और बग़ैर किसी मजबूरी के सुन्नत ए मुअक्कदा की परवाह न करे और हमेशा वुज़ू में तरतीब को बदलता रहे, तो ये गलत है और ऐसा करने वाला गुनहगार होगा। क्योंकि वो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की एक अहम सुन्नत को जान-बूझ कर छोड़ रहा है।

2. दोबारा धोना:

अगर वुज़ू के दौरान याद आ जाए कि तरतीब ग़लत हो गई है, तो मुस्तहब ये है कि दोबारा तरतीब से धो ले लेकिन ये वाजिब नहीं है।

वज़ाहत, अगर वुज़ू करते वक़्त बीच में ही याद आ जाए कि मैंने तरतीब ग़लत कर दी, तो बेहतर ये है कि दोबारा तरतीब से धो लिया जाए। लेकिन ये वाजिब और ज़रूरी नहीं है। अगर कोई दोबारा नहीं धोता और अपना वुज़ू पूरा कर लेता है, तो भी उसका वुज़ू हो जाएगा और वो नमाज़ पढ़ सकता है।

फ़िक़ही इबारत

ये जो कुछ हमने बयान किया, इसकी ताईद में फ़िक़ह की मोतबर किताबों में यूँ लिखा है। इबारत पर ग़ौर फ़रमाइए:

फ़िक़ही इबारत: "وَيُرَتِّبُ الْوُضُوءَ التَّرْتِيبُ عِنْدَنَا سُنَّةٌ مُؤَكَّدَةً عَلَى الصَّحِيحِ"

तर्जुमा और मफ़हूम: और वुज़ू करने वाला तरतीब क़ायम रखे। हमारे नज़दीक सहीह क़ौल के मुताबिक़ (वुज़ू में आज़ा की) तरतीब सुन्नत ए मुअक्कदा है। इससे मालूम हुआ कि वुज़ू में तरतीब क़ायम रखना सुन्नत ए मुअक्कदा है।

तहक़ीक़ी हवाला जात

ये मसअला और इसकी वज़ाहत फ़िक़ह-ए-हनफ़ी की किन किन मोतबर किताबों में मौजूद है,ये जानना भी हमारे लिए ज़रुरी है। यहाँ हम चंद मोतबर हवाला जात पेश कर रहे हैं:

अल-जौहरा अन-नय्यरा शरह मुख़्तसर अल-क़ुदूरी:

जिल्द 1, सफ़्हा 7, किताब अत-तहारा, सुनन अत-तहारा

(मतबूअ: अल-मतबआ अल-ख़ैरिय्या, मिस्र / मकतबा हक़्क़ानिया, मुल्तान)

बहार-ए-शरीअत: जिल्द 1, हिस्सा 2, सफ़्हा 299,

(मतबूअ: मकतबा अल-मदीना, कराची, सन-ए-तबाअत: 2013)

अद-दुर्र अल-मुख़्तार मअ रद्द अल-मुहतार (फ़तावा शामी):

जिल्द 1, सफ़्हा 241

(मतबूअ: एच. एम. सईद कंपनी, कराची, सन-ए-तबाअत: 1424 हि.)

अल-फ़तावा अल-हिंदिया (आलमगीरी):

जिल्द 1, सफ़्हा 8, किताब अत-तहारा, अल-बाब अल-अव्वल,

(मतबूअ: दार अल-कुतुब अल-इल्मिय्या, बैरूत, सन-ए-तबाअत: 2000 ई.)

आख़िरी कलिमात

हमने आज फ़िक़ह की मोतबर किताबों की रौशनी में वुज़ू में आज़ा की तरतीब बदलने के शरई हुक्म को तफ़सील से पढ़ा और समझा। ये मसअला हमें सिखाता है कि हमारी शरीअत-ए-मुतह्हरा ने हमें हर इबादत को हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बताए हुए तरीक़े के मुताबिक़ अदा करने की तालीम दी है। वुज़ू में तरतीब क़ायम रखना सुन्नत ए मुअक्कदा है, इसलिए हमें इसकी पाबंदी करनी चाहिए। लेकिन अगर कभी भूल-चूक हो जाए, तो घबराने की ज़रूरत नहीं, वुज़ू हो जाता है। हाँ, आदतन और जान-बूझ कर तरतीब छोड़ना गुनाह है, इससे बचना चाहिए। अल्लाह तआला हमें अपनी इबादतों को सुन्नत के मुताबिक़ अदा करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। या अल्लाह! हमें अपनी इबादात को सुन्नत ए नबवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मुताबिक़ ख़ूबसूरत तरीक़े से अदा करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा। आमीन।

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JawazBook एक सुन्नी इस्लामी ब्लॉग है, जहाँ हम हिंदी भाषा में कुरआन, हदीस, और सुन्नत की रौशनी में तैयार किए गए मज़ामीन पेश करते हैं। यहाँ आपको मिलेंगे मुस्तनद और बेहतरीन इस्लामी मज़ामीन।

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