हमारे मुआशरे में यह एक आम रिवाज है कि जो शख्स हज या उमरा पर जाने लगता है या वहाँ से वापस आता है तो वह अपने अज़ीज़ व अकारिब दोस्त अहबाब और मुतअल्लिकीन की दावत करता है तो आज इसी मोज़ू पर गुफ्तगू है के हज उमराह पर जाने से पहले या वहां से आने के बाद दावत करना कैसा है इस ताल्लुक़ से यह बात याद रखें के अगर यह अमल ख़ालिस अल्लाह तआला की रज़ा के लिए किया जाए कोई रियाकारी दिखावा न हो सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की रज़ा के लिए किया जाए तो यह अमल बाइस ए अज्र व सवाब है दावत में इखलास होना निहायत ज़रूरी है।
दावत में इख़लास और नियत की अहमियत
दावत का एहतिमाम इस नियत से नहीं होना चाहिए कि अगर दावत न दी तो लोग बातें करेंगे या मुआशरे में बुरा समझा जाएगा इसी तरह लोगों को दिखाने शोहरत हासिल करने या फ़ख्र व नुमाइश के लिए दावत देना भी दुरुस्त नहीं क्योंकि आमाल की कुबूलियत का दारोमदार नियत पर है।
हदीस-ए-पाक में है: जिस अमल में नियत न हो वह कुबूल नहीं।
एक और मशहूर हदीस में इरशाद फ़रमाया गया:
तर्जुमा: आमाल का दारोमदार नियतों पर है और हर शख्स के लिए वही है जिसकी उसने नियत की। हवाला: सहीह बुखारी।
दावत पर हाज़िर न होने वालों पर तअ्न न किया जाए
अगर किसी को दावत दी जाए और वह किसी मजबूरी या मस्रूफियत की वजह से शरीक न हो सके तो उस पर तअ्न व तश्नीअ नहीं करनी चाहिए बाज़ लोग इस मौके पर शिकवा करते हैं और कहते हैं जब यह हज करने गया था तो हमने इतने पैसे दिए थे लेकिन हमारी बारी आई तो यह आया ही नहीं।
इस किस्म के जुमले इख़लास के मनाफी हैं और दावत के अस्ल मकसद को मुतअस्सिर करते हैं नेकी सिर्फ अल्लाह तआला की रज़ा के लिए होनी चाहिए न कि बदले या एहसान जताने के लिए।
हज या उमरा पर रवानगी से पहले क्या करना चाहिए
जो शख्स हज या उमरा के लिए रवाना हो उसके लिए मुस्तहब है कि वह अपने खानदान रिश्तेदारों और दीगर लोगों से अपने हुकूक माफ़ करवाए और अगर किसी का हक़ उसके ज़िम्मे हो तो उसे अदा करने की कोशिश करे यह सफ़र ए हज की तैयारी का अहम हिस्सा है और दिलों की सफ़ाई का बेहतरीन ज़रिया भी।
वापसी पर तहाइफ़ लाना
हज या उमरा से वापस आने वाले के लिए मुस्तहब है कि वह अपने अज़ीज़ों और दोस्तों के लिए आबे ज़मज़म और खजूरें लेकर आए यह अमल मुहब्बत और खुशी के इज़हार का ज़रिया है अलबत्ता यह तहाइफ़ खुशदिली और अपनी इस्तिताअत के मुताबिक लाए जाएँ ऐसा न हो कि सिर्फ लोगों के तअ्नों या बातों के ख़ौफ़ से मजबूरी में तहाइफ़ खरीदे जाएँ।
टोपी तस्बीह और दीगर तहाइफ़ देने का हुक्म
आजकल बाज़ मकामात पर यह तरीका राइज हो गया है कि हज या उमरा पर जाने वाला वहाँ से आबे ज़मज़म और खजूरें ले आता है फिर अपने मुल्क में आकर टोपियाँ तस्बीहें वगैरह खरीद लेता है और रिश्तेदारों में आबे ज़मज़म और खजूरों के साथ यह चीज़ें भी तक्सीम करता है यह तरीका जाइज़ है क्योंकि आम तौर पर लोगों को मालूम होता है कि आबे ज़मज़म और खजूरें मक्का मुकर्रमा या मदीना मुनव्वरा की हैं जबकि टोपी या तस्बीह मक़ामी बाज़ार से भी खरीदी जा सकती है अलबत्ता अगर कोई शख्स यहाँ से खरीदी हुई चीज़ों के बारे में झूठ बोले और लोगों को यह यक़ीन दिलाए कि यह सब सामान मक्का या मदीना से लाया गया है तो ऐसा करना जाइज़ नहीं क्योंकि इसमें धोखा और झूठ शामिल है।
खुलासए कलाम
हज व उमरा के मौके पर अज़ीज़ व अकारिब को दावत देना एक अच्छा अमल है दावत में इख़लास और अल्लाह तआला की रज़ा की नियत होनी चाहिए दिखावे शोहरत या लोगों के ख़ौफ़ से दावत देना सवाब का बाइस नहीं दावत पर हाज़िर न होने वालों पर तअ्न व मलामत नहीं करनी चाहिए हज या उमरा पर रवानगी से पहले लोगों से अपने हुकूक माफ़ करवाना मुस्तहब है वापसी पर आबे ज़मज़म और खजूरें तोहफ़े के तौर पर लाना मुस्तहब है टोपी तस्बीह और दीगर तहाइफ़ देना जायज़ है लेकिन उनके बारे में झूठ बोलना या धोखा देना नाजाइज़ है अल्लाह तआला हमें हर नेक अमल में इख़लासे नियत नसीब फ़रमाए और हज व उमरा की बरकतों से मालामाल फ़रमाए आमीन।
