parda wajib hai काफ़िरा औरत से मुसलमान औरत का

हम अपनी बच्चियों और नौजवान लड़कियों को परदे के मसाइल शुरू से सिखाएँ ताकि वो बालिग़ होने पर बिना शर्म-ओ-झिझक इस पर अमल कर सकें।

आज हम इस मज़मून में एक बहुत ही अहम मोज़ू पर बात करेंगे और वह है काफ़िरा औरत से मुसलमान औरत का पर्दा। ये हुक्म हमारे अकाबिर उलमा ए अहले सुन्नत ख़ुसूसन आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान क़ादरी (रहमतुल्लाह अलैह) ने क़ुरआन हदीस और फ़िक़्ह की रौशनी में बयान फ़रमाया है। आइए तो इस अहम मसअले पर ग़ौर करते हैं और उसे तफ़्सील से समझते हैं बेहतरीन खुलासा और वज़ाहत के साथ।

काफ़िरा औरत से मुसलमान औरत का पर्दा वाजिब है

जैसी कि आला हज़रत (क़ुद्दिसा सिर्रहु) फ़रमाते हैं: "शरीअत का तो ये हुक्म है कि काफ़िरा औरत से मुसलमान औरत को ऐसा पर्दा वाजिब है जैसा कि मर्द से। यानी सर के बालों का कोई हिस्सा, या बाज़ू, या कलाई, या गले से ले कर पाँव के टख़्नों के नीचे तक जिस्म का कोई हिस्सा मुसलमान औरत का काफ़िरा औरत के सामने खुला होना जाइज़ नहीं। (फ़तावा रज़विय्या, जिल्द 23, सफ़्हा: 692)

आइए अब इस इबारत के हर जुमले की तौज़ीह पढ़ें।

पहला जुमला: शरीअत का तो ये हुक्म है कि काफ़िरा औरत से मुसलमान औरत को ऐसा पर्दा वाजिब है जैसा कि मर्द से। अब इस इबारत की मुख़्तसर तशरीह और खुलासा पढ़ें

शरीअत का तो ये हुक्म है – इन अल्फ़ाज़ से यह मालूम हुआ कि ये कोई इमाम साहब की अपनी राय नहीं बल्कि यह अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का दिया हुआ वाज़ेह फ़रमान है। और याद रखें जब शरीअत का हुक्म होता है तो उसमें किसी क़िस्म की ढील नहीं होती। ये दीन का एक अहम उसूल है और इस पर अमल करना हर मुसलमान औरत पर  फ़र्ज़ और वाजिब है।

काफ़िरा औरत से – इसका मतलब यह है की  हर ग़ैर-मुस्लिम औरत से मुसलमान औरत को पर्दा ज़रूरी है।

मुसलमान औरत को ऐसा पर्दा वाजिब है जैसा कि मर्द से – यह इबारत पूरे पूरे मसअले की जान है। शरीअत ने जो पर्दा एक मुसलमान औरत के लिए ग़ैर-महरम मर्द से वाजिब किया है, ठीक वैसा ही पर्दा काफ़िरा औरत से भी वाजिब है।

इस अहम नुक़्ते पर ग़ौर कीजिए: काफ़िरा औरत का मुसलमान औरत के साथ उठना-बैठना, मेल-जोल, या नज़दीकी होने से शरीअत में उसे "महरम" का दर्जा नहीं मिल जाता। इस्लाम ने ये इन्तिहाई सख़्त एहतियात इसलिए बरती ताकि मुसलमान औरत का जिस्म, उसकी अज़मत और उसकी सतर (जिस्म के वो हिस्से जिनका छुपाना फ़र्ज़ है) हर उस नज़र से महफ़ूज़ रहे जो ग़ैर-महरम की है।

दूसरा जुमला किन हिस्सों को छुपाना वाजिब है आला हज़रत फ़रमाते हैं: यानी सर के बालों का कोई हिस्सा या बाज़ू या कलाई या गले से ले कर पाँव के टख़्नों के नीचे तक जिस्म का कोई हिस्सा मुसलमान औरत का काफ़िरा औरत के सामने खुला होना जाइज़ नहीं।

आइए हर जुमले को एक-एक करके समझते हैं

सर के बालों का कोई हिस्सा – यानी अगर एक बाल भी काफ़िरा औरत के सामने ज़ाहिर हो गया, तो ये शरीअत की खिलाफ वर्ज़ी है। ये पूरे सर को ढकने का हुक्म है। ख़्वाह बालों का सिर्फ़ अगला किनारा हो, या पीछे का जूड़ा, या कनपटी के बाल; कोई भी हिस्सा नहीं खुला होना चाहिए। इससे पता चला कि मात्र सर पर दुपट्टा रख लेना काफ़ी नहीं, बल्कि इस तरह ढकना है कि एक बाल भी न दिखे।

या बाज़ू – बाज़ू से मुराद पूरा हाथ कंधे से लेकर कलाई तक है। आधी बाँह की कमीज़ पहनकर या कोहनी तक खुले बाज़ू रखना सख़्त मुमानिअत है। बाज़ू का कोई हिस्सा खुला न रहे।

या कलाई – कलाई (यानी हथेली और बाज़ू के जोड़ वाली जगह) और उसके आस-पास की हड्डी का बाहर होना भी जाइज़ नहीं। कुछ औरतें सिर्फ़ कोहनी तक आस्तीन रख कर कलाई खुली छोड़ देती हैं ये सख़्त मना है। अक्सर "मर्द से पर्दे" में भी चेहरे और हथेलियों के अलावा कलाई को ढकने की ताकीद की जाती है, लेकिन यहाँ आला हज़रत ने ब-तौर-ए-तनबीह कलाई की वज़ाहत फ़रमा दी कि काफ़िरा के सामने ये भी खुली न हो।

या गले से ले कर पाँव के टख़्नों के नीचे तक जिस्म का कोई हिस्सा – ये पूरी बदन की ऊपरी और निचली हद बता दी गई।

गले से मुराद: गला (गर्दन) और छाती का ऊपरी हिस्सा (सीना) शामिल है। मानी ख़ेज़ बात ये है कि गला ही नहीं बल्कि गले के नीचे का हिस्सा भी किसी भी सूरत न दिखे। अक्सर औरतें को देखा जाता है के  दुपट्टा इस तरह डालती हैं  है कि गला का हिस्सा  और सीने का ऊपर का हिस्सा झलकता है, ये मुमानिअत के दायरे में है।

पाँव के टख़्नों के नीचे तक: यानी पाँव के टख़्ने (गिट्टे, ऐड़ी के ऊपर की हड्डियाँ) से लेकर पैर का पूरा हिस्सा सब छुपाना वाजिब है। सिर्फ़ टख़्नों तक पाजामा या शलवार पर्याप्त नहीं, ऐसा लिबास हो जो टख़्नों के नीचे तक ढके। मोज़े या जुराब पहनना बेहतरीन है ताकि पाँव का कोई हिस्सा ज़ाहिर न हो।

जिस्म का कोई हिस्सा खुला होना जाइज़ नहीं – यानी सर के बाल बाज़ू कलाई गले से ले कर पाँव के टख़्नों के नीचे तक जिस्म के हर हिस्से का ढकना फ़र्ज़ है। 

"जाइज़ नहीं" का फ़िक़्ही मतलब "हराम" और "गुनाह" है। इसलिए, अगर बे-ख़बरी में या जानबूझ कर ऐसी बेपर्दगी हुई, तो शरीअत की नाफ़रमानी होगी, जिससे तौबा करनी लाज़िम है।

काफिरा औरत से पर्दे का हुक्म क्यूँ है

मुमकिन है किसी के दिल में सवाल आए काफ़िरा औरत तो औरत ही है उससे इतना कड़ा पर्दा क्यों? इस्लामी फ़िक़्ह की रौ में इसकी वजूहात ये हैं:

पहली वजह. काफ़िरा औरत इस्लाम की पाबंद नहीं है उसे मुसलमान औरत की सतर और बेपर्दगी के अहकाम अज़ीज़ नहीं हैं। उसके द्वारा किसी ग़ैर-महरम मर्द (ख़ास तौर पर उसके रिश्तेदारों या पराए मर्दों) के सामने मुसलमान औरत की हालत और जिस्मानी ख़ूबियों का ज़िक्र होने का ख़तरा है। शायरी या सादा बातचीत में भी इस वस्फ़ का नुक़्सान पहुँच सकता है।

दूसरी वजह: ग़ैर-मुस्लिम औरतों का माहौल अक्सर पर्दे से दूर होता है। ऐसी औरतों के साथ बे-तकल्लुफ़ी मुसलमान औरत के दिल में पर्दे की अहमियत को कम कर सकती है और उन्हें कपड़ों में ढील बरतने पर उभार सकती है।

तीसरी वजह: हदीस और फ़िक़्ह में आता है कि मुसलमान औरत का जो हिस्सा मर्दों से छुपाना है, वही हिस्सा काफ़िरा औरत से भी छुपाना है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत उम्मे सलमा और हज़रत आइशा (रज़ि.) के वाक़ियात में इस पहलू को बयान किया है। इमाम अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी ने इसी दलील को सामने रखते हुए ये फ़ैसला लिखा कि “हुक्म वही है जो मर्द के सामने है। ग़ौरतलब बात ये है कि उन्होंने इस हुक्म में कोई ढील नहीं दी, बल्कि “जैसा कि मर्द से” कहकर तमाम एहतियात वाजिब फ़रमा दी।

मज़मून का खुलासा और अमली पाबंदी

प्यारी बहनों! शरीअत-ए-मुतह्हरा के इस अहम हुक्म को हमें समझना और अपनी ज़िंदगी में ढालना चाहिए इस पर अमल करना चाहिए:यानी जब भी कोई काफ़िरा औरत (चाहे वो पड़ोसी हो, नौकरानी हो, सहेली हो, या डॉक्टर) मुसलमान औरत के पास आए तो उसके सामने पूरा सतरी पर्दा किया जाए। लिबास ऐसा हो जो सर के बालों गर्दन सीने बाज़ुओं कलाइयों और टख़्नों से लेकर पूरे पाँव को ढकने वाला हो। बड़े बुज़ुर्गों का मामूल ऐसा ही रहा है। जब घरों में ग़ैर-मुस्लिम काम वाली आती थीं, तो मुसलमान औरतें या तो सामने आती ही नहीं थीं, या पूरे बदन के कपड़े पहन कर, बड़ी चादर से सर और जिस्म ढक कर मिलती थीं। ये पाबंदी सिर्फ़ जवान औरतों के लिए नहीं बूढ़ी औरतों पर भी है चाहे जवान हो बूढी हो  बदन के उन हिस्सों की हिफ़ाज़त हर हाल में वाजिब है।

हमारी कोशिश ये होनी चाहिए

हम अपनी बच्चियों और नौजवान लड़कियों को ये मसाइल शुरू से सिखाएँ ताकि वो बालिग़ होने पर बिना शर्म-ओ-झिझक इस पर अमल कर सकें। घर के मर्दों की ये ज़िम्मेदारी है कि वो इस पर्दे का इंतिज़ाम करें और अगर घर में काफ़िरा औरतों का आना-जाना मजबूरी हो तो अपनी औरतों को पर्दे का सामान फ़राहम करें।

इख़्तिताम

ऐ अल्लाह! हमें अपनी बेटियों और बहनों को इस हुक्म की सही समझ और इस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा। ऐ अल्लाह! मुसलमान औरतों को पाकीज़गी पर्दे और हया की ज़िंदगी नसीब कर और उनको हर बुरी नज़र और फ़ितने से बचा।

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