क्या बच्चों को नज़र से बचाने के लिए काला टीका लगाना जाइज़ है

काला टीका लगाने का इस्लामी हुक्म क्या है क्या यह शिर्क है या जाइज़ जानिए हदीस और फ़िक़ह की रोशनी में सही जवाब।

आज के इस मज़मून में हम एक ऐसे मामूली से लगने वाले लेकिन अहम मसअले पर गुफ़्तगू करेंगे जो हमारे समाज में आम तौर पर देखा जाता है। अक्सर आपने देखा होगा कि छोटे बच्चों की पेशानी, ठोड़ी या गाल पर काला टीका लगाया जाता है। कुछ लोग इस अमल को सिर्फ़ एक रिवाज या देहाती रस्म समझ कर नापसंद करते हैं और कभी-कभी इस पर ये हुक्म भी लगा देते हैं कि ये ग़लत है या शिर्क है। तो आइए, इस मसअले को फ़िक़ह की रौशनी में और अपने असलाफ़ के अक़वाल के आईने में देखते हैं कि बच्चों की पेशानी पर सियाह टीका लगाना कैसा है? और इसका शरई हुक्म क्या है?

बच्चों की पेशानी पर सियाह टीका लगाना कैसा है

अज़ीज़ दोस्तो! इस मसअले का जवाब बहुत साफ़ और वाज़ेह है: बच्चों को नज़र-ए-बद से महफ़ूज़ रखने के लिए पेशानी, ठोड़ी या गाल पर सियाह टीका लगाना शरअन जाइज़ है।

लेकिन याद रखें, यह कोई फ़र्ज़ या वाजिब नहीं है बल्कि यह एक तजुर्बाती तदबीर (टोटका) है। और फ़िक़ह का क़ायदा है कि: हर वह तदबीर जो शरीअत के ख़िलाफ़ न हो और तजुर्बा से मुफ़ीद हो जाइज़ होती है। और इस अमल की ताईद हज़रत उस्मान ग़नी रज़ियल्लाहु अन्हु के अमल से भी मिलती है।

हज़रत उस्मान ग़नी रज़ियल्लाहु अन्हु का अमल

मुहतरम हाज़रीन! इस तदबीर की असल बहुत मज़बूत और बुलंद है। यह हमें ख़ुद एक जलीलुल-क़द्र सहाबी, हज़रत उस्मान इब्ने अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अन्हु के अमल से मिलती है।

अल्लामा अली इब्ने सुल्तान मुहम्मद अल-क़ारी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

"وَفِي شَرْحِ السُّنَّةِ رُوِيَ أَنَّ عُثْمَانَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ رَأَى صَبِيًّا مَلِيحًا، فَقَالَ: دَسِمُوا نُونَتَهُ كَيْلَا تُصِيبَهُ الْعَيْنُ"

हज़रत उस्मान ग़नी रज़ियल्लाहु अन्हु ने एक ख़ूबसूरत बच्चा देखा तो फ़रमाया: "इसकी ठोड़ी पर सियाह निशान लगा दो ताकि नज़र-ए-बद न लगे।

इस रिवायत में लफ़्ज़ "दस्सिमू" का मानी है: "सियाह करना" और "अन-नूनह" से मुराद है: "बच्चे की ठोड़ी पर लगाया जाने वाला छोटा निशान। (मिरक़ात अल-मफ़ातीह शरह मिश्कात अल-मसाबीह)

गौर करें जब एक सहाबी-ए-रसूल, जिन्होंने खुद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से  दीन की तालीम हासिल की, वह ऐसी तदबीर का हुक्म दे रहे हैं, तो इससे इस अमल की जवाज़ और मशरूइयत साबित होती है। यह हमारे लिए काफ़ी है, इस अमल को ग़लत या नाजाइज़ नहीं कहा जा सकता।

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह की तशरीह

दोस्तों: इस मसअले को और वज़ाहत के साथ समझिए, मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह, जो बहुत बड़े फ़क़ीह और मुहद्दिस थे, फ़रमाते हैं: अवाम में मशहूर टोटके अगर ख़िलाफ़ ए शरअ न हों तो उनका बंद करना ज़रूरी नहीं। जैसे दवाओं में नक़्ल (शरई दलील) ज़रूरी नहीं बल्कि तजुर्बा काफ़ी है, इसी तरह दुआओं और ऐसे टोटकों में भी, अगर ख़िलाफ़ ए शरअ न हों तो दुरुस्त हैं, अगरचे मासूर दुआएं अफ़ज़ल हैं। (मिरआत अल-मनाजीह) इस इबारत में एक बहुत बड़ा उसूल बयान कर दिया गया है। और मज़ीद फ़रमाते हैं: जब दवाओं में हमारी अक़्ल काम नहीं करती तो टोटकों में क्यों करे? लिहाज़ा ऐसे आमाल पर बिला वजह एतिराज़ दुरुस्त नहीं। (मिरआत अल-मनाजीह) यह एक बहुत ही अहम तनबीह है। किसी चीज़ की हक़ीक़त और असलियत को समझे बग़ैर उस पर फ़ौरन शिर्क या बिदअत का फ़तवा लगा देना सहीह नहीं है।

ख़ुलासा ए हुक्म

प्यारे इस्लामी भाइयो और बहनो! अब हम इस पूरे मसअले का ख़ुलासा इस तरह पेश करते हैं ताकि किसी के दिल में कोई शक या शुबहा बाक़ी न रहे: बच्चों को नज़र-ए-बद से बचाने के लिए सियाह टीका लगाना जाइज़ है ब-शर्त यह कि: इसे मुअस्सिर बिज़ात-ए-ख़ुद न समझा जाए। यानी यह अक़ीदा न हो कि यह काला रंग ही नज़र बद को दूर करता है, बल्कि यह एक ज़रिया और तदबीर है। असल हिफ़ाज़त करने वाला और शिफा देने वाला तो सिर्फ़ अल्लाह तआला ही है। शरई अक़ाइद के ख़िलाफ़ कोई तसव्वुर शामिल न हो। इसमें कोई शिर्किया कलिमात न हो। दुआओं और अज़कार के साथ ब-तौर तजुर्बाती तदबीर इख़्तियार करना दुरुस्त है। बेहतर यह है कि साथ ही मासूर दुआएं भी पढ़ी जाएं, जैसे कि नज़र बद से बचने की दुआएं जो हदीस में आई हैं।

दुआ

या अल्लाह! हमें और हमारी औलाद को हर क़िस्म की बला, बीमारी और नज़र-ए-बद से महफ़ूज़ फ़रमा। या अल्लाह! हमारे अक़ाइद की हिफाज़त फरमा और हमें शरीअत के मुताबिक ज़िन्दगी गुज़ारने की तौफीक अता फरमा।

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