namaz ki barkat se qaid khana se aazadi एक नेक सीरत लोहार की दास्तान

नेक सीरत लोहार समझ गया कि अब मेरा मामला सिर्फ़ ख़ुदाए वहदहू ला शरीक की बारगाह से ही हल हो सकता है और मेरा मक़सद उसी के करम से हासिल हो सकता है।

आज के इस मज़मून में  एक ऐसे वाक़िआ को पेश कर रहा हूँ। जिस में हमारे लिए एक सबक है  यह एक नेक सीरत लोहार का क़िस्सा है जिसे बे-क़ुसूर होने के बावजूद क़ैदख़ाना में डाल दिया गया, लेकिन उसने किसी इंसान के सामने हाथ नहीं फैलाया, क़ैदख़ाना में नामाज़ पढ़ता अल्लाल्ह से रो रोकर दुआ करता और मदद मांगता। अल्लाह तआला ने किस तरह उसकी मदद फ़रमाई और एक बड़े हाकिम के दिल को बदल दिया, जानिये तफसील से।

क़ैदख़ाना का नमाज़ी और अमीरे ख़ुरासान

बयान किया जाता है कि अब्दुल्लाह ताहिर के दौर में जबकि वह ख़ुरासान के गवर्नर थे और नैशापुर उसकी राजधानी थी। एक लोहार शहर हिरात से नैशापुर गया और चंद दिन वहाँ कारोबार किया, फिर अपने अहल व अयाल से मुलाक़ात के लिए वतन (हिरात) लौटने का इरादा किया और रात के पिछले पहर सफ़र करना शुरू कर दिया। उन्हीं दिनों अब्दुल्लाह ताहिर ने सिपाहियों को हुक्म दे रखा था कि वह तमाम रास्ते चोरों से महफ़ूज़ व मामून बना दें ताकि किसी मुसाफ़िर को कोई ख़तरा लाहिक़ न हो। इत्तिफ़ाक़ ऐसा कि सिपाहियों ने उसी रात चंद चोरों को गिरफ़्तार किया और अमीर-ए-ख़ुरासान (अब्दुल्लाह ताहिर) को उसकी इत्तिला भी पहुँचा दी, लेकिन अचानक उनमें से एक चोर भाग खड़ा हुआ। अब यह घबराए कि अगर अमीर को मालूम हो गया कि एक चोर भाग गया है तो वह हमें सज़ा देगा। इतने में उन्हें सफ़र करता हुआ यह लोहार नज़र आ गया। उन्होंने उसे फ़ौरन गिरफ़्तार कर लिया और बाक़ी चोरों के साथ उसे भी अमीर के सामने पेश कर दिया। अमीर-ए-ख़ुरासान ने समझा कि यह सब चोरी करते हुए पकड़े गए हैं, इसलिए मज़ीद किसी तफ़्तीश व तहक़ीक़ के बग़ैर सब को क़ैदख़ाना में बंद करने का हुक्म जारी कर दिया।

बे-क़ुसूर लोहार की दुआ

नेक सीरत लोहार समझ गया कि अब मेरा मामला सिर्फ़ ख़ुदाए वहदहू ला शरीक की बारगाह से ही हल हो सकता है और मेरा मक़सद उसी के करम से हासिल हो सकता है। उसने वुज़ू किया और क़ैदख़ाना के एक गोशे में नमाज़ पढ़ना शुरू कर दिया। हर दो रकअत के बाद सर सज्दा में रख कर ख़ुदाए तआला की बारगाह में रिक़्क़तअंगेज़ दुआएँ और दिल सोज़ मुनाजात शुरू कर देता और कहता: ऐ मेरे परवरदिगार! तू अच्छी तरह जानता है कि मैं इस गुनाह से बरी हूँ और इस मामले में बे-क़ुसूर हूँ।

अमीरे ख़ुरासान का  ख़्वाब

जब रात हुई तो अब्दुल्लाह ताहिर ने ख़्वाब देखा कि चार बहादुर व ताक़तवर लोग आए और सख़्ती से उसके तख़्त के चारों पायों को पकड़ कर उठाया और उलटने लगे। इतने में उसकी नींद टूट गई। उसने फ़ौरन “ला हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह” पढ़ा, फिर वुज़ू किया और उस अहकमुल हाकिमीन की बारगाह में दो रकअत नमाज़ अदा की जिसकी तरफ़ तमाम शाह व गदा अपनी अपनी परेशानी के वक़्त रुजू करते हैं। उसके बाद दोबारा सोया तो फिर वही ख़्वाब नज़र आया। इस तरह चार मरतबा हुआ। हर बार वह यही देखता था कि वह चारों नौजवान उसके तख़्त के पायों को पकड़ कर उठाते हैं और उलटना चाहते हैं।

मज़लूम की आह का असर

अमीर-ए-ख़ुरासान अब्दुल्लाह ताहिर इस वाक़िआ से घबरा गए और उन्हें यक़ीन हो गया कि ज़रूर इसमें किसी मज़लूम की आह का असर है, जैसा कि किसी साहिब-ए-इल्म व दानिश ने कहा है: यानी लाखों तीर और भाले वह काम नहीं कर सकते जो काम एक बुढ़िया सुबह के वक़्त कर देती है। बारहा ऐसा हुआ है कि दुश्मनों से मर्दाना वार मुक़ाबला करने और उन्हें शिकस्त देने वाले, बुढ़ी औरतों की बद-दुआ से तबाह व बर्बाद हो गए हैं। (मसनवी फ़ारसी का उर्दू तर्जुमा)

जेलर से पूछताछ

अमीर-ए-ख़ुरासान ने रात ही में जेलर (क़ैदख़ाना का दारोग़ा) को बुलाया और उससे पूछा: बताओ तुम्हारे इल्म में कोई मज़लूम शख़्स जेल में बंद तो नहीं कर दिया गया है? जेलर ने अर्ज़ कियाहुज़ूर मैं तो यह नहीं जानता कि मज़लूम कौन है, लेकिन इतनी बात ज़रूर है कि मैं एक शख़्स को देख रहा हूँ जो जेल में नमाज़ पढ़ता है और रिक़्क़तअंगेज़ व दिल सोज़ दुआएँ करता है। बे-क़ुसूर लोहार की रिहाई अमीर ने हुक्म दिया उसे फ़ौरन हाज़िर किया जाए। जब वह शख़्स अमीर के सामने हाज़िर हुआ तो अमीर ने उसके मामले की तहक़ीक़ की। मालूम हुआ कि वह बे-क़ुसूर है। अमीर ने उस शख़्स से माफ़ी माँगी और कहा आप मेरे साथ तीन काम कीजिए। पहला काम यह है कि आप मुझे माफ़ कर दें। दूसरा काम यह है कि मेरी तरफ़ से एक हज़ार हलाल दिरहम क़बूल फ़रमाएँ। तीसरा काम यह है कि जब भी आपको किसी क़िस्म की परेशानी दरपेश हो तो मेरे पास तशरीफ़ लाएँ ताकि मैं आपकी मदद कर सकूँ।

नमाज़ की बरकत और भरोसा

नेक सीरत लोहार ने कहा: आपने जो यह फ़रमाया कि मैं आपको माफ़ कर दूँ, तो मैंने माफ़ कर दिया। और आपने जो यह फ़रमाया कि एक हज़ार दिरहम क़बूल कर लूँ, तो वह मैंने क़बूल किया। लेकिन आपने जो यह फ़रमाया कि जब मुझे कोई मुसीबत दरपेश हो तो मैं आपके पास आऊँ यह मुझसे नहीं हो सकता। अमीर ने पूछा यह क्यों नहीं हो सकता तो उस शख़्स ने जवाब दिया इसलिए कि वह परवरदिगार जो मुझ जैसे फ़क़ीर के लिए आप जैसे बादशाह का तख़्त एक रात में चार मरतबा औंधा करता है उसको छोड़ देना और अपनी ज़रूरत किसी दूसरे के पास ले जाना उसूल-ए-बंदगी के ख़िलाफ़ है। मेरा वह कौन सा काम है जो नमाज़ पढ़ने से पूरा नहीं हो जाता कि मैं उसे ग़ैर के पास ले जाऊँ। यानी जब मेरा सारा काम नमाज़ की बरकत से पूरा हो जाता है तो मुझे दूसरे के पास जाने की क्या ज़रूरत है। (रियाज़ुन्नासेहीन, सफ़्हा: 104, 105)

सबक़

इस वाक़िआ से हमें यह सबक़ मिलता है कि नमाज़ और सच्ची दुआ मोमिन का सबसे बड़ा सहारा हैं। हमें चाहिए के जब भी अगर कोई मुसीबत आये तकलीफ में घिर जाएँ तो नमाज़ पढ़ें अल्लाह से रो रोकर दुआ करें अल्लाह हमारे हाल पर ज़रूर रहम फरमाएगा हमारी ज़रूर मदद फरमाएगा। अल्लाह हम सब की गैब से मदद फ़रमाए. आमीन 

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