दुनिया की ज़िंदगी फ़ानी है जबकि आख़िरत की ज़िन्दगी हमेशा और बाक़ी रहने वाली ज़िन्दगी है। इस मज़मून में आख़िरत की तैयारी मौत की याद और अल्लाह तआला के सामने जवाबदेही के बारे में बताया गया है। ताके इंसान आखिरत की फ़िक्र करे आखिरत की तय्यारी करे।
फ़िक्रे आख़िरत
फिक्र ए आखिरत एक ऐसा वस्फ़ है जो मोमिन को हमेशा सही सिम्त में रखता है और इस बात का एहसास दिलाता है कि आख़िरत अबदी और बाकी रहने वाली है और आख़िरत का एहसास मुसलमान को अपनी सारी दौलत, वक़्त और तवानाई ख़र्च करने और दुनियावी राहत व सुकून कुर्बान कर देने पर उभारता है क्योंकि आख़िरत दाइमी और बाकी रहने वाली है। क़ुरआन कहता है: आख़िरत बेहतर और बाकी रहने वाली है। (सूरए आला : 17)
दुनिया में इंसान का वजूद महज़ इस लिए नहीं हुआ कि वह मौज मस्ती करे बल्कि इस लिए हुआ है कि अल्लाह तआला एक खास मुद्दत तक इम्तेहान के मरहले से गुज़ार कर आज़माना चाहता है ता कि देखें कौन बेहतर अमल करने वाला है। जो लोग सही अमल करेंगे उन्हें उनका बदला दिया जाएगा और किसी ने गलत राह को इख्तियार किया होगा उसे भी वहाँ सज़ा दी जाएगी। क़ुरआन कहता है:
फिर जिसने ज़र्रा बराबर नेकी की होगी वह उसको देख लेगा और जिसने ज़र्रा बराबर भी बदी की होगी वह उसको देख लेगा। (ज़िलज़ाल : 7,8)
आख़िरत का शऊर रखने वाले लोग
जो लोग आख़िरत का शऊर रखते हैं वह इस बात से वाकिफ़ होते हैं कि कहीं अल्लाह तआला उनकी छोटी छोटी हरकात पर पकड़ न ले, वह उस ख़ौफ़ से डरते हैं। क़ुरआन में इसे इस तरह कहा गया है:
वह अपने रब से डरते हैं और इस बात का ख़ौफ़ रखते हैं कि उनसे बुरी तरह हिसाब न लिया जाए। (सूरह रअद : 21)
अगरचे दुनिया आख़िरत की खेती है लेकिन मोमिन की निगाह हमेशा आख़िरत में कामयाबी पर टिकी होती है। वह लम्हा भर के लिए भी यह गवारा नहीं करता कि दुनिया से दिल लगाए और नतीजतन आख़िरत में नुकसान उठाना पड़े। और मोमिन इस बात पर यक़ीन रखता है कि आख़िरत की कामयाबी दरअसल हक़ीक़ी कामयाबी है। चाहे उसके लिए दुनिया में रुस्वा होना पड़े, मुसीबतें उठानी पड़ें, हर तरह की मज़म्मत सहनी पड़े और दुनिया की उन तमाम चीज़ों का नुकसान बर्दाश्त करना पड़े, यह मुमकिन है, लेकिन आख़िरत में रुस्वा होना पड़े यह हरगिज़ मुमकिन नहीं है।
दुनिया की मोहब्बत और आख़िरत से ग़फ़लत
अक़ीदए आख़िरत पर यक़ीन ही काफी नहीं है बल्कि उसका शऊर हो, इस लिए आख़िरत को ज़ेहन में ताज़ा करते रहना चाहिए वरना यह ऐन मुमकिन है कि मरगूबाते दुनिया कहीं आख़िरत से मोड़ कर दुनिया की तरफ खींच न लें। आख़िरत एक गैर महसूस शै है जो कल ज़ाहिर होने वाली है जब कि दुनिया एक महसूस शै है। यहाँ उसकी तल्खियाँ व शीरीनियाँ हर वक़्त छलकती रहती हैं। अगर कोई उसके दामे फ़रेब में आ जाए तो आख़िरत में नुकसान उठाएगा।
मौत की याद फ़िक्रे आख़िरत का पहला मरहला
फ़िक्रे आख़िरत का पहला मरहला मौत की याद है। मौत एक ऐसी हक़ीक़त है जिससे कोई फर्द इंकार नहीं कर सकता। ज़रा गौर कीजिए कि इस कायनात में मौत से ज़्यादा यक़ीनी हक़ीक़त और क्या होगी? लेकिन इंसान न जाने क्यों इससे ग़फ़लत का शिकार है। दुनिया की पुरतऐश ज़िंदगी, शान व शौकत और माल की हिरस ने बहुतों को गुमराह किया है और ऐसे लोग गोर तक पहुँच जाते हैं लेकिन ख़्वाबे ग़फ़लत से बेदार नहीं होते।
कभी कभी यह सवाल पैदा होता है कि क्या हमारे ज़ेहनों में आख़िरत का तसव्वुर और जवाबदेही का एहसास धुंधला तो नहीं हो गया है? कुछ लोगों के साथ ऐसा मामला भी है कि वह बहुतों को अपने कंधों पर उठा कर मिट्टी के सुपुर्द कर के चले आते हैं लेकिन आख़िरत का एहसास बेदार नहीं होता।
इस से पहले के आख़िरत में अल्लाह तआला के सामने रुस्वा हों हम गफलत की नींद से जाग जाएँ और हमें चाहिए के हम कसरत से मौत को याद करें और ज़ेहनों में बार बार आख़िरत को ताज़ा करें इसके लिए कभी कभी हम क़ब्रिस्तान भी जाया करें और वह किताबें जिनमें जहन्नम के होलनाक मनाज़िर ज़िक्र किये गए हैं उनका मुतालआ करें और तसव्वुर करें कि जन्नत की वह लाज़वाल नेमतें नेक व सालेह लोगों को अता की जाएँगी और कैसे आलीशान महल्लात होंगे जिसमें जन्नती रहेंगे। काश! हम भी उसमें रहें।
दुआ
अल्लाह से दुआ है कि हमें जन्नतुल फ़िरदौस अता करे। आमीन।
