दुआ मोमिन की ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा है। यह सिर्फ़ ज़रूरतों को पेश करने का नाम नहीं बल्कि अल्लाह से अपना रिश्ता मज़बूत करने का ज़रिया भी है। मोमिन अपने अल्लाह से दुआ करता है और दुआ के ज़रिए उसी से मदद माँगता है हिदायत की दुआ करता है और मग़फ़िरत की दुआ करता है। क़ुरआन और हदीस में दुआ की बड़ी फ़ज़ीलत बयान की गई है और दुआ इबादत का मुग्ज़ है।
दुआ का एहतिमाम
दुआ की अहमियत और हक़ीक़त
दुआ की अहमियत व अफादियत का ज़िक्र क़ुरआन में जा बजा मिलता है। दुआ मोमिन का हथियार है और दुआ इबादत का मग़ज़ भी है। दुआ के मानी पुकारना बुलाना मांगना और सवाल करना है। जिस तरह इबादत ख़ालिस अल्लाह के लिए है उसी तरह दुआ भी ख़ालिस अल्लाह के लिए होनी चाहिए। दुआ से इबादत करने वालों को तक़वियत मिलती है।
दुआ का हुक्म और क़ुबूलियत
अल्लाह तआला ने बंदों को दुआ करने की ताकीद फ़रमाई है। तर्जुमा (मुझे पुकारो मैं तुम्हारी पुकार को सुनता हूँ) बंदा जब दुआ करता है तो कभी कभी दुनिया में बंदे की दुआएँ क़बूल नहीं होतीं। जिन दुआओं के असर दुनिया में ज़ाहिर नहीं होते वह आख़िरत का ज़खीरा बन जाती हैं। अल्लाह तआला ने बंदे को दुआ मांगने का तरीका बताया है। फ़रमाता है: अपने रब को पुकारो गिड़गिड़ाते हुए और चुपके चुपके। यक़ीनन वह हद से गुज़रने वालों को पसंद नहीं करता। ज़मीन में फ़साद बरपा न करो जब कि उसकी इस्लाह हो चुकी है और ख़ुदा ही को पुकारो ख़ौफ़ के साथ और तमअ के साथ। यक़ीनन अल्लाह की रहमत नेक किरदार लोगों से क़रीब है। (सूरह आराफ़: 56, 55)
दुआ और शैतान से हिफाज़त
शैतान हमारा खुला दुश्मन है। वह हर वक़्त कोशिश करता है कि किसी तरह इंसान को ग़लत राह पर ले जाए। बुराई पर उकसाए मुसलमानों को ख़ौफ़ज़दा करता है और हिर्स व लालच के जाल बिछा कर उन्हें राहे हक़ से मोड़ना चाहता है। शैतान के बिछाए हुए जाल से वही शख़्स बच सकता है जिस को अल्लाह की पनाह मिल गई हो। इसलिए दुआ सिखाई गई है। दुआ करो कि परवरदिगार! मैं शयातीन की इन तर्ग़ीबात से तेरी पनाह मांगता हूँ बल्कि ऐ रब! मैं तो इससे भी तेरी पनाह मांगता हूँ कि वह मेरे पास आए। (सूरह अल-मोमिनून : 96, 97)
गुनाहों की माफ़ी और हिदायत की दुआ
रोज़मर्रा की ज़िंदगी में मोमिन से ऐसे गुनाह भी हो जाते हैं जिस का उसे एहसास भी नहीं होता लेकिन अल्लाह तआला ऐसे गुनाहों को भी पकड़ने वाला है लिहाज़ा हमें उन गुनाहों की भी माफ़ी मांगनी चाहिए जो अनजाने में हुए और हर वक़्त दुआओं के ज़रिए अल्लाह से मग़फ़िरत तलब करनी चाहिए। इल्म व हिदायत के लिए दुआ करनी चाहिए और शैतान के शर से महफ़ूज़ रहने की भी दुआ करनी चाहिए।
ख़ातिमा
हमें अपनी ज़िंदगी में दुआ का एहतेमाम करना चाहिए और हर छोटे-बड़े काम में अल्लाह की तरफ़ रुजू करना चाहिए। खुशहाली हो या परेशानी हर हाल में दुआ को अपनी आदत बनाना चाहिए। दुआ इंसान को अल्लाह के क़रीब करती है और दुआ से दुनिया सवरती है और आख़िरत में भलाईयां नसीब होंगी। इसलिए हमें हमेशा इल्म हिदायत मग़फ़िरत और शैतान के शर से हिफाज़त की दुआ करते रहना चाहिए।
