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| मां-बाप की खिदमत जन्नत में आला मकाम का बाइस बनती है |
आज के मज़मून में हम एक ऐसे अमल की फ़ज़ीलत ब्यान करेंगे जो जन्नत में बुलंद दर्जात और अल्लाह की ख़ास रहमत हासिल करने का ज़रीया है। ये मौज़ू है वालिदैन की इताअत और दर्जात की बुलंदी का। हम सब जानते हैं कि अल्लाह तआला ने अपनी इबादत के बाद सबसे ज़्यादा ज़ोर वालिदैन के साथ हुस्न-ए-सुलूक पर दिया है। वालिदैन की खिदमत के सिलसिले का ही एक वाकिया पढेंगे जो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़बान-ए-मुबारक से इरशाद हुआ जिस से पता चलता है की माँ की ख़िदमत इंसान को कहाँ से कहाँ पहुँचा देती है। ये वाक़िया हमारे लिए सबक़ है। आइए, हदीस-ए-पाक की रौशनी में वालिदैन की खिदमत की फ़ज़ीलत को पढ़ते और समझते हैं।
हदीस मुबारक और माँ की खिदमत का सिला
इस सिलसिले में उम्मुल मोमिनीन हज़रत आइशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम ने इरशाद फरमाया:
عَنْ أُمِ الْمُؤْمِنِينَ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا، قَالَتْ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ:
"دَخَلْتُ الْجَنَّةَ فَسَمِعْتُ فِيهَا قِرَاءَةً، فَقُلْتُ: مَنْ هَذَا؟ قَالُوا: حَارِثَةُ بْنُ النُّعْمَانِ، فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: كَذَلِكُمُ الْبِرُّ كَذَلِكُمُ الْبِرُّ، وَكَانَ أَبَرَّ النَّاسِ بِأُمِّهِ"
उम्मुल मोमिनीन हज़रत आइशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहु अन्हा से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया:
मैं जन्नत में दाख़िल हुआ और वहाँ मैंने (ख़ूबसूरत आवाज़ में) क़िराअत सुनी, मैंने दरियाफ़्त फ़रमाया: ये कौन है? अर्ज़ किया गया: ये हारिसा बिन नोमान (रज़ियल्लाहु अन्हु) हैं। तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: नेकी और हुस्न-ए-सुलूक की जज़ा ऐसी ही होती है, नेकी की जज़ा ऐसी ही होती है! और वो (हज़रत हारिसा) तमाम लोगों में अपनी वालिदा के साथ सबसे बढ़ कर हुस्न-ए-सुलूक करने वाले थे।
हदीस की मुख़्तसर तशरीह और ख़ुलासा
ग़ौर फ़रमाइए इस हदीस-ए-पाक पर कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें ये बताया कि वालिदा की ख़िदमत का मक़ाम और सिला क्या होता है।
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं कि मैं जन्नत में दाख़िल हुआ। मैंने वहाँ "قِرَاءَةً" यानी क़ुरआन की तिलावत की बहुत ख़ूबसूरत आवाज़ सुनी। आपने पूछा कि ये किस की आवाज़ है? फ़रिश्तों ने बताया कि ये "حَارِثَةُ بْنُ النُّعْمَانِ" यानी हज़रत हारिसा बिन नोमान रज़ियल्लाहु अन्हु हैं, जो आपके एक सहाबी थे।
ये सुन कर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो इरशाद फरमाया, वो हमारे लिए सबक़ हैं। आपने फ़रमाया: "كَذَلِكُمُ الْبِرُّ كَذَلِكُمُ الْبِرُّ" यानी नेकी और हुस्न-ए-सुलूक की जज़ा ऐसी ही होती है, नेकी की जज़ा ऐसी ही होती है! ये जुमला दो बार फ़रमा कर आपने इस बात की अहमियत को और बढ़ा दिया कि ये मक़ाम हज़रत हारिसा बिन नोमान रज़ियल्लाहु अन्हु को उनकी नेकी की वजह से मिला है।
और फिर आपने उस नेकी की तफ़सील भी बता दी जिसकी बदौलत हज़रत हारिसा रज़ियल्लाहु अन्हु ये बुलंद मक़ाम हासिल कर सके। आपने फ़रमाया:"وَكَانَ أَبَرَّ النَّاسِ بِأُمِّهِ" यानी वो तमाम लोगों में अपनी वालिदा के साथ सबसे बढ़ कर हुस्न-ए-सुलूक करने वाले थे। सुब्हान अल्लाह! ये है माँ की ख़िदमत का सिला।
तहक़ीक़ी हवाला (References)
ये हदीस-ए-पाक किस क़दर मज़बूत सनद के साथ हम तक पहुँची है, इसका हवाला भी पढ़ें। हवाला जात इस तरह हैं:
मिश्कात अल-मसाबीह:
किताब अल-आदाब, बाब अल-बिर्र वस्सिला, अल-हदीस: 4926
(तहक़ीक़ मिश्कात लिल-मुसन्निफ़ इब्न हजर अल-असक़लानी)
शोअब अल-ईमान लिल-बैहक़ी:
जिल्द 6, सफ़्हा 187, अल-हदीस: 7861
अल-मुस्नद लिल-इमाम अहमद:
जिल्द 6, सफ़्हा 151, अल-हदीस: 25224
अल-मुस्तदरक लिल-हाकिम:
जिल्द 3, सफ़्हा 208
(इमाम हाकिम ने इसे सहीह क़रार दिया है।)
अल्लामा इब्न हजर असक़लानी और दीगर मुहद्दिसीन ने इसे "हदीस हसन" क़रार दिया है। सुब्हानअल्लाह
इस्लाही निकात
अब इसी मौज़ू के तहत कुछ इस्लाही तरबियती नुकात की तरफ़ भी तवज्जोह दिलाना ज़रूरी है, ताकि हमारे इल्म में और इजाफा हो जाए कि वालिदैन की इज़्ज़त और ख़िदमत का कितना बड़ा मक़ाम है।
बिर्र (नेकी): इससे मुराद वालिदैन के साथ वो एहसान और भलाई है। (यानी वो ख़िदमत जो सिर्फ़ ज़बान से न हो, बल्कि दिल की गहराइयों, माल और जिस्मानी ताक़त के ज़रिए की जाए।)
जन्नत में आवाज़: अल्लाह तआला ने हज़रत हारिसा रज़ियल्लाहु अन्हु की क़िराअत को उनकी ज़िंदगी ही में जन्नत की फ़ज़ाओं का हिस्सा बना दिया, जो उनके इख़्लास-ए-ख़िदमत की निशानी है। (ये उनके लिए अल्लाह की तरफ़ से एक ख़ास इकराम और इनाम है।)
वालिदैन की ख़िदमत: ये हदीस वाज़ेह करती है कि अगर कोई जन्नत में अपना मक़ाम बुलंद करना चाहता है तो उसे अपने वालिदैन (ख़ुसूसन माँ) की ख़िदमत करना होगा। (वालिदैन की खिदमत, जन्नत के बाग़ात और बुलंद दर्जात हासिल करने का सबसे आसान ज़रिया है।)
खुलासा ए कलाम
हमने आज इस मज़मून में वालिदैन, ख़ास तौर पर वालिदा की ख़िदमत की फ़ज़ीलत का एक अनोखा पहलू पढ़ा। हमें सोचना चाहिए और अपना जाइज़ा लेना चाहिए कि कहीं हम इस अज़ीम नेकी से ग़ाफ़िल तो नहीं। हज़रत हारिसा बिन नोमान रज़ियल्लाहु अन्हु का मक़ाम हमारे सामने है। आइए, हम भी अहद करें कि हम अपने वालिदैन की दिलजोई करेंगे, उनकी इज़्ज़त करेंगे उनकी खिदमत करेंगे और उनकी हर जायज़ बात मानेंगे। यही हमारी दुनिया और आख़िरत की कामयाबी का राज़ है।
