Deeni ishteharat aur kitabon ka adab - हर मुसलमान के लिए ज़रूरी हिदायत और पैगाम

रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: जब अल्लाह के नाम वाला कोई काग़ज़ ज़मीन पर गिरता है तो अल्लाह तआला 70 हज़ार फ़रिश्ते भेजता है ..

पूरे आलम ए इस्लाम में अल्लाह और उसके रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की याद मनाने के लिए जलसे जुलूस और महफ़िलें मुनअक़िद की जाती हैं हमारे मुल्क में सालाना या माहाना दीनी प्रोग्राम मुनअक़िद किए जाते हैं और तमाम अंजुमनों और तंजीमों की ज़ेरे निगरानी सालाना या माहाना दीनी प्रोग्राम दीनी महफ़िलें दीनी जलसे करवाना अपना अहम तरीन फ़रीज़ा समझती हैं। लेकिन हम पर इससे भी बड़ा फ़रीज़ा आयात ए क़ुरआनिया और अल्लाह व रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नाम का अदबो एहतिराम है। मेरी मुराद इश्तिहारात वग़ैरह की सूरत में इन पाकीज़ा अल्फ़ाज़ की मुरव्वजा बेअदबी से है जिन पर बिस्मिल्लाह के साथ-साथ अल्लाह और उसके रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का नाम और साथ ही औलिया ए किराम और उलमा ए किराम के नाम भी प्रिंट होते हैं। और कभी-कभी तो इश्तिहारात पर ख़ाना ए काबा या गुम्बद ए ख़ज़रा का अक्स वग़ैरह भी प्रिंट होता है। जलसों में अवाम को दावत देने के लिए काग़ज़ी इश्तिहारात गली मोहल्ले की उमूमन ऐसी दीवारों पर बेदरेग़ चस्पाँ कर दिए जाते हैं जिनके नीचे से गंदी नालियाँ बह रही होती हैं। लेकिन अफ़सोस! कि ये मुतबर्रिक इश्तिहार जितने शौक़ से लगाए जाते हैं मुक़र्ररा मुद्दत के बाद इन्हें उतारने का हमारे यहाँ कोई भी इंतिज़ाम नहीं और न ही कमेटियों का इस तरफ़ कोई ध्यान होता है। जिसका नतीजा यह निकलता है कि ये इश्तिहारात कुछ अर्से बाद ख़ुद ही फट कर या बारिश से गल कर नीचे नालियों या गलियों में गिर जाते हैं।

हदीसे पाक और अकाबिर के वाक़ियात

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: जब अल्लाह के नाम वाला कोई काग़ज़ ज़मीन पर गिरता है तो अल्लाह तआला 70 हज़ार फ़रिश्ते भेजता है जो उस नाम को अपने परों में छुपा लेते हैं और उस वक़्त तक उसकी तक़दीस करते रहते हैं जब तक अल्लाह के वलियों में से कोई वली आकर उसे उठा नहीं लेता।

हज़रत बिशर हाफ़ी रहमतुल्लाहि तआला अलैह से किसी ने पूछा: क्या वजह है कि आपका नाम लोगों में मशहूर है?

आपने फ़रमाया एक दिन रास्ते में जाते हुए मुझे ज़मीन पर बिस्मिल्लाह शरीफ़ वाला काग़ज़ नज़र आया मैंने उसे उठा कर साफ़ किया और मुअत्तर कर के किसी महफ़ूज़ जगह पर रख दिया। शब को ख़्वाब में मुझे किसी कहने वाले ने कहा 'ऐ बिशर! तुमने हमारा नाम पाक किया हम तुम्हारा नाम दुनिया वालों में पाक कर देंगे।

हज़रत मंसूर बिन अम्मार अल-वाइज़ रहमतुल्लाहि तआला अलैह की तौबा का ये सबब बना कि: उन्होंने रास्ते में पड़ा एक सफ़्हा देखा जिस पर बिस्मिल्लाह शरीफ़ लिखी हुई थी उसे मुहब्बत से उठा लिया लेकिन उसे रखने के लिए कोई भी महफ़ूज़ जगह न मिली तो उन्होंने उसे एहतिरामन खा लिया। ख़्वाब में उन्हें फ़रमाया गया कि 'अल्लाह ने इस काग़ज़ के एहतिराम की वजह से तुझ पर अपनी हिकमतों के दरवाज़े खोल दिए हैं।

चंद ज़रूरी गुज़ारिशात

उलमा से सुना है कि:जब कोई बैठ कर क़ुरआन हाथ में लेकर तिलावत करता हो तो कोई दूसरा शख़्स उसके क़रीब कुर्सी वग़ैरह पर न बैठे। तो आयात या अदबी इबारात वाले औराक़ को पाँव तले रौंदना भला क्यूँकर जाइज़?

ख़ाना ए काबा का ग़िलाफ़ चूमा भी जाता है और उसके टुकड़े मुख़्तलिफ़ ममालिक को बतौर ए तबर्रुक भी भेजे जाते हैं। जब ग़िलाफ़ का ये अदब है तो इन काग़ज़ों का अदब क्यों नहीं जिन पर अदबी इबारात दर्ज होती हैं?

उलमा ये भी फ़रमाते हैं कि:गंदी जगहों पर क़ुरआन हदीस ज़िक्र ओ अज़कार या दुरूद ओ सलाम पढ़ना जाइज़ नहीं तो इन्हीं जगहों पर अदबी इबारात से भरे हुए इश्तिहारात लगाना या अदबी काग़ज़ात को फेंकना कैसे जाइज़ होगा?

हदीस शरीफ़ में आता है:सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के वुज़ू का मुबारक पानी भी नीचे नहीं गिरने देते थे। यही उनकी कामयाबी का राज़ था। जिस काग़ज़ पर अल्लाह या उसके रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का नाम ए गिरामी लिखा हो उसका अदब क्यूँकर न किया जाए?

क़ुरआनी आयात से दम किया हुआ पानी हम ज़मीन पर नहीं फेंकना पसंद करते तो क़ुरआनी या अदबी इबारात वाला काग़ज़ ज़मीन पर बल्कि गंदी नालियों और गटरों में जाता कैसे गवारा कर लेते हैं?

तावीज़ पर क़ुरआनी आयात या ज़िक्र ओ अज़कार दर्ज होते हैं उसे हम न तो ज़मीन पर गिरने देते हैं और न ही बैत उल ख़ला में लेकर जाते हैं। तो क्या दूसरे अदबी काग़ज़ इस एहतिराम के क़ाबिल नहीं?

उलमा फ़रमाते हैं कि:इस उम्मत के अमल दिन-रात रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बारगाह में ब-मअ' नाम ओ नसब पेश किए जाते हैं। तो क्या हम चाहेंगे कि: रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बारगाह ए आलिया में हमारे ऐसे करतूत पेश हों?

बेहतरीन उम्मत का फ़र्ज़

क़ुरआन मजीद में है कि:तुम बेहतरीन उम्मत हो। तो जब बनी इसराईल के 200 साल तक गुनाहों में ज़िंदगी गुज़ारने वाले शख़्स को सिर्फ़ नाम ए मुहम्मदी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अदब ओ एहतिराम और चूम कर आँखों पर लगाने की वजह से जन्नत मिल जाए तो सोचो!हम तो ग़ुलामी ए रसूल में मौत भी क़बूल है का नारा मारने वाली बेहतरीन उम्मत हैं हम पर इस एहतिराम के बदले क्या-क्या इनायत होंगी?

मौजूदा हालात पर अफ़सोस

एक वक़्त था जब बच्चों को अदब ओ एहतिराम भी सिखाया जाता था कि एक बच्चा दूसरे से कहता: यार मैं अपना बस्ता ज़मीन पर नहीं रख सकता। इसमें इस्लामी किताब हैं। लेकिन आज हालात देख कर दिल ख़ून के आँसू रोता है। मैं पूछता हूँ, क्या आज वो एहतिराम जुर्म है?

मुसलमानों से अपील

मैं मुसलमानों से अपील करता हूँ कि: ख़ुदारा, लफ़्ज़ "मुसलमान" के मतलब ओ मक़ासिद पर ग़ौर फ़रमाएँ, क्योंकि अपने ख़ुदा और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नाम की इज़्ज़त ओ आबरू रखना किसी एक फ़र्द की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि हर मुसलमान का फ़रीज़ा है। शायद कि अल्लाह तआला हमारी यही नेकी पसंद फ़रमाए!

क्या हम ये नहीं कर सकते

हम जलसे जुलूस या महाफ़िल में अवाम को जमा करने के लिए सादा काग़ज़ी इश्तिहार की बजाय आर्ट पेपर के लटकाए जाने वाले इश्तिहारात या पेनाफ़्लेक्स का सहारा ले लिया करें जिन्हें मुक़र्ररा मुद्दत के बाद बड़ी आसानी से उतार कर महफ़ूज़ जगह पहुँचा दिया जाए।

या इश्तिहारात की बजाय महज़ एलानात और दावतनामों के ज़रीये काम चलाया जाए ये तरीक़ा ज़्यादा कारआमद और मोहतात है।

जिसके ज़ेरे निगरानी दीनी प्रोग्राम हो जलसा हो और जहां जहां इश्तिहारत लगाए गए हों वहाँ से प्रोग्राम होने के बाद अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए पोस्टर इश्तिहारात निकालकर किसी महफ़ूज़ मक़ाम पर भेज दें।

राह चलते हुए किसी भी अदबी काग़ज़ को उठा कर महफ़ूज़ अच्छी जगह में रखें, या ज़मीन में दफ़्न करें ताकि लोगों के क़दमों तले आने से बच जाए।

आख़िर अपील

अपील है कि:ख़ुतबा उलमा और हर मुसलमान अपने-अपने हल्क़ा-ए-वसातत तक इस पैग़ाम को आम करें। ख़ुदा सब को इसकी जज़ा फ़रमाए!

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