हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की दौड़-धूप में कई बार ऐसी बातें, ऐसे उसूल और ऐसे क़वानीन हमारी नज़र से ओझल हो जाते हैं जो दर-अस्ल हमारी हस्ती की बुनियाद हैं। ये कोई नई बातें नहीं, बल्कि वही पुरानी सी सीख हैं जो हमारे बुज़ुर्गों की ज़बान पर हमेशा रहती थीं। आइए, आज उन तेरह उसूलों पर ग़ौर करें, जिन्हें अपना कर हम न सिर्फ़ अपनी ज़िन्दगी बेहतर बना सकते हैं, बल्कि दूसरों के लिए भी रोशनी का ज़रिया बन सकते हैं।
1. तीन चीज़ें एक ही जगह परवरिश पाती हैं
पहला है फूल, दूसरा काँटा और तीसरा है ख़ुशबू।
ज़िन्दगी एक ऐसा मैदान है जहाँ अच्छाई और बुराई, ख़ुशी और ग़म साथ-साथ रहते हैं। जिस मिट्टी में गुलाब का फूल खिलता है, उसी में उसके काँटे भी परवान चढ़ते हैं, और उसी से ख़ुशबू भी फैलती है। ये हमें सिखाता है कि ज़िन्दगी में हर चीज़ मिली-जुली है। परेशानियाँ (काँटे) आएँगी, लेकिन उनके बीच ख़ूबसूरती (फूल) और सकारात्मक असर (ख़ुशबू) भी मौजूद रहते हैं। हमें काँटों से डर कर फूल तोड़ने से नहीं घबराना चाहिए।
2. तीन चीज़ें हर किसी को मिलती हैं
पहली है ख़ुशी, दूसरी ग़म और तीसरी है मौत।
ये ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सच है कि कोई भी इंसान इन तीनों से नहीं बच सकता। ख़ुशी और ग़म तो ज़िन्दगी के दो पहलू हैं जो हर किसी की ज़िन्दगी में आते जाते रहते हैं। लेकिन मौत वो सच्चाई है जो हर किसी को आख़िरकार इस दुनिया से रुख़्सत कर देती है। इस हक़ीक़त को जान कर हमें ग़ुरूर नहीं करना चाहिए, न ही दूसरों के दुख पर ख़ुश होना चाहिए। हर इंसान एक जैसी सूरत-ए-हाल से गुज़रता है।
3. तीन चीज़ें हर किसी की अलग-अलग होती हैं
पहली है सूरत, दूसरी सीरत और तीसरी है क़िस्मत।
अल्लाह ने हर इंसान को अलग बनाया है। किसी की शक्ल-सूरत किसी और से नहीं मिलती, किसी का मिज़ाज और किरदार (सीरत) दूसरों से मुख़्तलिफ़ होता है, और हर किसी की तक़दीर अलग लिखी गई है। इसलिए हमें किसी से हसद नहीं करना चाहिए, न ही किसी को नीचा दिखाना चाहिए। हर किसी की अपनी ख़ासियत है और अपना सफ़र।
4. तीन बातों को कभी छोटा न समझो
पहला है क़र्ज़, दूसरा फ़र्ज़ और तीसरा है मरज़।
क़र्ज़ चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो, उसे फ़ौरन अदा करने की कोशिश करनी चाहिए। फ़र्ज़ (ज़िम्मेदारी) चाहे छोटा ही क्यों न लगे, उसे पूरी ईमानदारी से निभाना चाहिए। और बीमारी (मरज़) चाहे छोटी ही क्यों न हो, उसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। ये तीनों चीज़ें अगर वक़्त रहते न संभाली गईं तो बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकती हैं।
5. तीन चीज़ों को कभी न ठुकराओ
पहली है दावत, दूसरी तोहफ़ा और तीसरी है मशवरा।
किसी की दावत को ठुकराना उसके एहतराम को ठेस पहुँचाना है। तोहफ़ा चाहे छोटा ही क्यों न हो, उसे क़ुबूल करना दिल का वसी होना है। और मशवरा चाहे किसी छोटे ने ही क्यों न दिया हो, उसे सुनना अक़्लमंदी है। इन तीनों को ठुकराने से ताल्लुक़ात ख़राब होते हैं और मौक़े हाथ से निकल जाते हैं।
6. तीन चीज़ों को हर कोई अपना ले
पहला है सब्र, दूसरा रिज़्क़ और तीसरा है शुक्र।
सब्र (तहम्मुल) हर मुसीबत का इलाज है। रिज़्क़ (रोज़ी) हर किसी के हिस्से में लिखा आता है — जो आपका है, वो आप तक पहुँच कर ही रहेगा। और शुक्र (एहसानमंदी) हर नेमत को बढ़ाने का ज़रिया है। इन तीनों को अपना कर इंसान दुनिया की हर परेशानी से निपट सकता है और इत्मीनान से जी सकता है।
7. तीन चीज़ों को हमेशा पाक रखो
पहला है जिस्म, दूसरा लिबास और तीसरा है ख़यालात।
जिस्म की सफ़ाई न सिर्फ़ सेहत के लिए ज़रूरी है, बल्कि ये इबादत का भी हिस्सा है। कपड़ों की सफ़ाई आपकी शख़्सियत का आईना है। और ख़यालात की पाकीज़गी आपके किरदार की बुनियाद है। गंदे ख़यालात आपकी रूह को आलूदा करते हैं। इन तीनों की पाकीज़गी इंसान को अंदर और बाहर से ख़ूबसूरत बनाती है।
8. तीन चीज़ों को हमेशा याद रखो
पहली है नेमत, दूसरी एहसान और तीसरी है मौत।
अल्लाह की दी हुई नेमतों को याद रखना शुक्रगुज़ारी है। दूसरों के एहसान (अच्छाई) को याद रखना इंसानियत है। और मौत को याद रखना समझदारी है। मौत की याद हमें ग़लत कामों से रोकती है, अच्छे कामों के लिए तहरीक देती है और दुनिया की मोहब्बत और लालच से बचाती है।
9. तीन चीज़ों को हमेशा हासिल करो
पहला है इल्म, दूसरा अख़लाक़ और तीसरा है हुनर।
इल्म (दानाई) वो दौलत है जो चोरी नहीं जा सकती। अख़लाक़ (नेकी) वो ख़ूबी है जो इंसान को इंसान बनाती है। हुनर (महारत) वो हथियार है जो हर हाल में काम आता है। इन तीनों को हासिल करने में जो वक़्त और मेहनत लगती है, वो कभी ज़ाया नहीं जाती।
10. तीन चीज़ों से परहेज़ करो
पहला है हसद, दूसरी ग़ीबत और तीसरी है चुग़लख़ोरी।
हसद (रश्क) दिल को जलाता है। ग़ीबत (पीठ पीछे बुराई करना) ताल्लुक़ात को तोड़ती है। चुग़लख़ोरी (फ़साद डालना) मुआशरे में इंतेशार लाती है। ये तीनों बुराइयाँ न सिर्फ़ दूसरों का नुक़सान करती हैं, बल्कि करने वाले को भी अंदर ही अंदर खोखला कर देती हैं। इनसे बच कर ही इंसान इत्मीनान से जी सकता है।
11. तीन चीज़ों को हमेशा क़ाबू में रखो
पहली है ज़बान, दूसरा ग़ुस्सा और तीसरा है नफ़्स।
ज़बान पर क़ाबू बड़ी ताक़त है — एक लफ़्ज़ रिश्ता जोड़ सकता है, तोड़ सकता है। ग़ुस्सा आग की तरह है — क़ाबू में रहे तो मुफ़ीद, बे-क़ाबू हो तो तबाह-कुन। नफ़्स (ख़्वाहिशात) घोड़े की तरह हैं — लगाम में रहें तो सवारी आसान, लगाम टूटी तो गिरना तय। इन तीनों को क़ाबू में रखना ही असल कामयाबी है।
12. तीन चीज़ों के लिए लड़ो
पहला है दीन, दूसरा हक़ और तीसरी है इज़्ज़त।
अपने दीन (मज़हब) की हिफ़ाज़त के लिए, अपने हक़ (इंसाफ़) के लिए, और अपनी इज़्ज़त के लिए हमेशा खड़े रहना चाहिए। ये तीनों चीज़ें ऐसी हैं जिन पर समझौता करना इंसान को गिरा देता है। लेकिन याद रहे, इस "लड़ाई" का मतलब तशद्दुद नहीं, बल्कि इंसाफ़, तहम्मुल और सही तरीक़े से अपनी बात रखना है।
13. तीन चीज़ें हमेशा वापस नहीं आतीं
पहली है ज़िन्दगी, दूसरा वक़्त और तीसरी है जवानी।
ये सबसे अहम सबक़ है। गुज़रा हुआ वक़्त, गुज़री हुई जवानी और चली गई ज़िन्दगी कभी वापस नहीं आती। इसलिए हर लम्हे की क़द्र करो, जवानी की ताक़त को अच्छे कामों में लगाओ, और ज़िन्दगी को ऐसे जियो कि मौत आने पर कोई पछतावा न रहे।
इन उसूलों को पढ़ना और समझना आसान है, लेकिन असल चैलेंज है इन्हें ज़िन्दगी में उतारना। ये कोई नए उसूल नहीं, बल्कि वही पुरानी सच्चाइयाँ हैं जो हमारे दादा-परदादा अपने तजुर्बे से जानते थे। इन्हें अपना कर हम न सिर्फ़ अपनी ज़िन्दगी बेहतर बना सकते हैं, बल्कि अपने आस-पास के लोगों के लिए तहरीक का ज़रिया भी बन सकते हैं।
इन बातों को दूसरों तक पहुँचाना सिर्फ़ एक पैग़ाम आगे भेजने से ज़्यादा है — ये एक अमानत है, एक ज़िम्मेदारी है। कौन जाने, शायद इन अल्फ़ाज़ से किसी का दिल छू जाए, किसी की सोच बदल जाए, या किसी की ज़िन्दगी की सीध ही बदल जाए। अल्लाह हम सब को इन बातों को समझने और अपनाने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।
