आईए आज बात करते हैं एक ऐसी रूहानी दौलत की, एक ऐसे क़ीमती तोहफ़े की जो नबी ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी चहीती बेटी सैय्यिदा फ़ातिमतुज़ ज़हरा रज़ी अल्लाहु अन्हा और उनके शौहर हज़रत अली अल-मुरतज़ा करम अल्लाहु वजहहु को अता फ़रमाया था। यह वो तस्बीह है जिसकी बरकतों का अंदाज़ा उसकी फ़ज़ीलत सुन कर ही हो जाता है। यह कोई आम वज़ीफ़ा नहीं बल्कि घरेलू मेहनत व मशक्कत और थकावट का रूहानी इलाज है।
वाक़िया का पस मंज़र रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शफ़क़त
हज़रत अली करम अल्लाहु तआला वजहहुल करीम से रिवायत है कि घर के काम काज, ख़ास तौर पर आटा पीसने की चक्की चलाने की वजह से हज़रत फ़ातिमा रज़ी अल्लाहु तआला अन्हा के मुबारक हाथों में निशान पड़ गए थे। यह देख कर दिल में ख़्याल आया कि अगर घर के काम में मदद के लिए एक ख़ादिम मिल जाए तो काम आसान हो सकता है।
इत्तेफ़ाक़ से उस वक़्त हुज़ूर ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास कुछ क़ैदी ग़ुलाम आए हुए थे। हज़रत फ़ातिमा रज़ी अल्लाहु अन्हा अपना मक़सद ले कर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़िदमत ए अक़दस में हाज़िर हुईं ताकि एक ख़ादिम के हुसूल की दरख़्वास्त कर सकें। लेकिन उस वक़्त आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम घर पर मौजूद नहीं थे। इस लिए हज़रत फ़ातिमा की मुलाक़ात सरकार दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से न हो सकी। उनकी मुलाक़ात हज़रत आयशा सिद्दीक़ा रज़ी अल्लाहु अन्हा से हुई जिन्हें उन्होंने अपना हाल और आने का मक़सद बता दिया और फिर वापस अपने घर तशरीफ़ ले आईं।
जब हुज़ूर अलैहिस सलाम घर वापस तशरीफ़ लाए तो हज़रत आयशा रज़ी अल्लाहु अन्हा ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को बताया कि हज़रत फ़ातिमा आप से मिलने आई थीं लेकिन मुलाक़ात न हो सकने की वजह से वापस चली गई हैं। यह सुन कर हुज़ूर ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपनी बेटी के घर ख़ुद तशरीफ़ ले गए। उस वक़्त हज़रत फ़ातिमा रज़ी अल्लाहु अन्हा अपने बिस्तर पर लेटी हुई थीं। जैसे ही उन्होंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखा, तअज़ीमन उठने लगीं। लेकिन सरकार दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया अपनी जगह पर बैठी रहो। फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उन दोनों (हज़रत फ़ातिमा और हज़रत अली) के दरमियान बैठ गए। हज़रत अली करम अल्लाहु वजहहु फ़रमाते हैं यहाँ तक कि मैंने अपने सीने के पास नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के क़दमों की ठंडक महसूस की।"
फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया "क्या मैं तुम दोनों को ऐसी चीज़ न बता दूँ जो तुम्हारे लिए ख़ादिम (नौकर) से बेहतर है? जब तुम दोनों अपने बिस्तरों पर जाओ (यानी सोने के लिए लेटो) तो 33 बार 'अल्लाहु अकबर', 33 बार 'सुब्हान अल्लाह' और 33 बार 'अल-हम्दु लिल्लाह' कहा करो। यह (ज़िक्र) तुम्हारे लिए ख़ादिम से बेहतर है। (सहीह अल-बुख़ारी)
तस्बीह फ़ातिमी का तरीक़ा और फ़ज़ीलत
दोस्तों इस मुबारक वज़ीफ़े को ही "तस्बीह फ़ातिमी" कहा जाता है। इस का तरीक़ा यह है कि रात को सोने से पहले
33 बार सुब्हान अल्लाह (अल्लाह पाक है)
33 बार अल-हम्दु लिल्लाह (हर तारीफ़ अल्लाह ही के लिए है)
33 बार अल्लाहु अकबर (अल्लाह सब से बड़ा है) कहा जाए।
इस वज़ीफ़े की ख़ूबी यह है कि दिन भर की मेहनत और थकावट के बावजूद, इसके पढ़ने से जिस्म और दिल को हैरत अंगेज़ सुकून व आराम मिलता है। और ऐसा क्यों न हो, क्योंकि यह ज़िक्र ए इलाही है। अल्लाह तआला का इरशाद है - सुन लो! अल्लाह के ज़िक्र से ही दिलों को इत्मिनान हासिल होता है।
इस तस्बीह की फ़ज़ीलत में सरकार दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है जो शख़्स हर नमाज़ के बाद 33 बार 'सुब्हान अल्लाह' 33 बार 'अल-हम्दु लिल्लाह' और 33 बार 'अल्लाहु अकबर' कहे (यह 99 हुए) और फिर सौ मुकम्मल करने के लिए एक बार 'ला इलाहा इल्लल्लाह वहदहू ला शरीका लह, लहुल मुल्कु व लहुल हम्द, व हुवा अला कुल्लि शयइन क़दीर' पढ़ ले, तो उसके सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे, ख़्वाह वह समंदर की झाग के बराबर ही क्यों न हों। (सहीह मुस्लिम)
आज की ख़ातून और तस्बीह फ़ातिमी का पैग़ाम
आज के दौर की ख़वातीन के पास दुनियावी तालीम और सहूलियतों की कोई कमी नहीं। दर्जनों गाने, ड्रामे और फ़िल्मी मुकालमे उन्हें ज़बानी याद होते हैं लेकिन अफ़सोस कि क़ुरान ए पाक की एक छोटी सी सूरत भी बग़ैर देखे नहीं पढ़ सकतीं। फ़िल्मी अदाकाराओं की तर्ज पर उनके लिबास ऐसे होते हैं जो पर्दे का मक़सद ही फ़ौत कर देते हैं। बे-पर्दगी के साथ बाज़ारों, शॉपिंग मॉल्ज़ और तफ़रीही मक़ामात पर घूमना, अपने हुस्न व जमाल की नुमाइश करना, उन्हें अपना हक़ समझने लगा है। यही वो चीज़ है जो उनकी इज़्ज़त व इफ़्फ़त को ख़तरे में डाल रही है।
मेरी प्यारी बहनो माओ बेटियो
अगर तुम वाक़ई इज़्ज़त की ज़िंदगी चाहती हो अगर तुम अपने आप को जहन्नम की भड़कती हुई आग से बचना चाहती हो, तो फिर अपने रहने सहने उठने बैठने का अंदाज़ बदलो वो ज़िंदगी अपनाओ जो हमारे उस्वा ए हसना रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पाकीज़ा अज़वाज ए मुतह्हरात और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की चहीती बेटी सैय्यिदा फ़ातिमतुज़ ज़हरा रज़ी अल्लाहु अन्हा ने गुज़ारी।
हिजाब इख़्तियार करो। यह तुम्हारी इज़्ज़त और इफ़्फ़त का तहफ़्फ़ुज़ है।
तिलावत ए क़ुरान को अपना रोज़ का मामूल बनाओ। यह तुम्हारे दिल की रोशनी है।
ज़िक्र ए इलाही में मशग़ूल रहो। यह तुम्हारे दिल का सुकून है।
दुरूद ए शरीफ का विर्द करो। यह तुम्हारे लिए शफ़ाअत का ज़रिया है।
तस्बीह-ए-फ़ातिमी को अपनी रात का आख़िरी अमल बनाओ। यह तुम्हारी थकावट दूर करके और तुम्हें अज्र ए अज़ीम मिलेगा।
अगर तुम ने ऐसी ज़िंदगी इख्तियार ली तो यक़ीन जानो तुम्हें दुनिया में भी इज़्ज़त मिलेगी और आख़िरत में भी जन्नत के दरवाज़े तुम पर खुल जाएँगे। सब से बढ़ कर तुम अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़ुशनूदी हासिल कर सको गी।
अल्लाह तआला हम सब को सैय्यिदा फ़ातिमतुज़ ज़हरा रज़ी अल्लाहु अन्हा के उस्वा ए हसना पर चलने और तस्बीह-ए-फ़ातिमी को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाने की तौफ़ीक अता फ़रमाए। आमीन
