इमाम बुखारी की ज़िन्दगी के आखरी लम्हात का वाक़िया और आख़िरी दिनों की आज़माइशें

इमाम बुखारी के आख़िरी दिनों की दर्द भरी कहानी। जानिए कैसे उन्हें नैशापुर बुखारा और समरकंद से निकाला गया और ईद की रात सड़क किनारे उनकी वफात हुई।

आज हम इतिहास के उन पन्नों को पलटने जा रहे हैं जो हमें एक महान हस्ती की ज़िंदगी के आख़िरी लम्हात बयान करते हैं। यह कोई आम दास्तान नहीं बल्कि उन इमाम की कहानी है जिन्होंने इल्म की दुनिया को "सहीह बुखारी" जैसा अनमोल ख़ज़ाना दिया।

आज़माइशों का दौर

इमाम बुखारी रहमतुल्लाह अलैहि को अपनी ज़िंदगी के आख़िरी हिस्से में इस्लामी दुनिया के मशरिकी हिस्से के हाकिमों की तरफ से शदीद ज़ुल्म व सितम का सामना करना पड़ा खास तौर पर नैशापुर बुखारा और समरकंद में।

इस की कई वजुहात थीं जिन में शामिल हैं

उन्होंने उमरा के बच्चों को उन के महलात में तालीम देने से इनकार कर दिया।

कुछ लोगों ने उन की शोहरत और सीरत से हसद किया।

नैशापुर से निकाले गए

जब इमाम बुखारी की उम्र 62 साल हुई तो नैशापुर के हाकिम ने उन्हें शहर छोड़ने का हुक्म दिया और कहा कि वह वहाँ नापसन्दीदा हैं।

वह वहाँ से हिजरत कर के अपने आबाई शहर बुखारा पहुंचे। शहर के दरवाज़ों पर लोगों ने उन का इस्तक़बाल किया और लोग और तलबा उन के गिर्द जमा हो गए यहाँ तक कि दूसरे मुहद्दिसीन की मजालिस छोड़ दीं जिस से कुछ लोगों के दिलों में उन के खिलाफ बुग्ज़ पैदा हुआ।

बुखारा से भी बेदखली

लेकिन जल्द ही बुखारा के हाकिम उन की शोहरत से नाराज़ हो गए और नैशापुर के हाकिम की तरफ से भी पैग़ाम आए कि इमाम को बुखारा से भी निकाल दिया जाए, जैसे नैशापुर से निकाला गया था।

शहर के हाकिम का नुमाइन्दा इमाम बुखारी के घर पहुंचा और उन्हें फौरन तौर पर शहर छोड़ने का हुक्म दिया। हुक्म यह था कि "अभी" शहर छोड़ दें।

इमाम को इतनी मोहलत भी न मिली कि वह अपनी किताबें जमा कर सकें और उन्हें तरतीब दे सकें। वह शहर से निकले और तीन दिन तक शहर के मज़ाफात में एक खैमे में रहे, अपनी किताबें तरतीब देते रहे और नहीं जानते थे कि कहाँ जाएँ।

सड़क किनारे अंतिम साँसें

फिर इमाम बुखारी समरकंद की तरफ रवाना हुए, लेकिन वह शहर में दाखिल नहीं हुए बल्कि उस के एक गाँव खरतंग में अपने रिश्तेदारों के हाँ ठहरे। उन के साथ इब्राहीम बिन मुक़िल भी थे।

ज़्यादा वक़्त नहीं गुज़रा कि हाकिम समरकंद के हुक्म पर फौजी उन के घर पहुँच गए और उन्हें समरकंद और उस के नवाही इलाकों से निकलने का हुक्म दिया। यह ईद उल-फ़ित्र की रात थी।

हुक्म यह था कि "अभी" निकलें ईद के बाद नहीं। इमाम को खौफ था कि उन के रिश्तेदारों को कोई नुकसान न पहुँचे जिन्होंने उन की मेहमान नवाज़ी की।

इब्राहीम बिन मुक़िल ने उन की किताबें एक जानवर पर लाद दीं और दूसरे पर इमाम को सवार किया। फिर इब्न मुक़िल घर वापस आया और इमाम बुखारी को सहारा दे कर बाहर ले आया। वह दोनों सवारियाँ की तरफ चलने लगे।

तकरीबन 20 कदम चलने के बाद इमाम बुखारी ने ज़्यादा थकावट महसूस की और इब्न मुक़िल से चंद मिनट आराम करने की दरख्वास्त की।

इमाम बुखारी सड़क के किनारे बैठ गए और सो गए। चंद मिनट बाद, जब इब्न मुक़िल ने इमाम को जगाने की कोशिश की, तो देखा कि उन की रूह अल्लाह के पास जा चुकी थी। अल्लाह उन पर रहम फरमाए।

इतिहास का सबक

इमाम बुखारी ईद उल-फ़ित्र की रात 1 शव्वाल 256 हिजरी को सड़क के किनारे वफात पा गए। वह एक शहर से दूसरे शहर निकाले गए और उन की उम्र 62 साल से ज़्यादा थी।

आज लोग नैशापुर बुखारा और समरकंद के हाकिमों के नाम नहीं जानते लेकिन सब इमाम बुखारी को जानते हैं।

दुआ

अल्लाह पाक इमाम बुखारी के दरजात बुलन्द फरमाए, नबियों, शहीदों और सालेहीन के साथ उन का हश्र फरमाए 

आमीन

(सीरत आ'लाम अन-नुबला, सफ़ा 468, जिल्द 12)

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