आज हम इस मज़मून में किसी मुसलमान का ऐब छुपाने की जो फ़ज़ीलत है उस पर हदीस शरीफ़ की रौशनी में बात करेंगे। हदीस शरीफ़ से हमें इंसानियत का एक अज़ीम दर्स मिलता है जिसमें आज के इस ख़ुदग़रज़ और ऐब तलाश करने वाले दौर में हमारे लिए एक अज़ीम सबक है।
हदीस मुबारका का मतन और तर्जुमा
हज़रत उक्बा बिन आमिर रज़ियल्लाहो तआला अन्हो से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़र्माया:जिस शख़्स ने किसी का कोई ऐब देखा और उसे छुपा दिया गोया उसने किसी ज़िंदा दफ़न की हुई बच्ची को क़ब्र से निकाल कर ज़िंदगी बख़्शी। (अल-मुस्तदरक अलाअस-सहीहैन रक़मुल हदीस: 8162 हुक्मुल हदीस: सहीह)
हदीस की वज़ाहत
हुज़ूर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया “जिस शख़्स ने किसी का कोई ऐब देखा”। ऐब जिस का मतलब है नक़्स ख़ामी किसी चीज़ की कमज़ोरी या वो बात जो उसे मेयार पर पूरा न उतरने दे। यहाँ मुराद वो जिस्मानी अख़्लाक़ी या मुआशरती ख़ामियाँ हैं जिन्हें आम तौर पर शर्मिंदगी का बाइस समझा जाता है।
आगे हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं ‘और उसे छुपा दिया’ मतलब छुपा लिया ढांक लिया। ये सिर्फ़ ज़बान से न छुपाने का नाम नहीं बल्कि अमलन उसे फ़ाश होने से बचाया और दूसरों से पोशीदा रखा।
और फिर हुज़ूर ने फ़रमाया ‘गोया कि’यानी हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने बा-ज़ाहिर एक छोटे से अमल को एक इंतहाई अज़ीम अमल से तश्बीह दे रहे हैं ताकि उस की फ़ज़ीलत और अज़मत दिलों में उतर जाए।
हदीस शरीफ़ के अगले हिस्से में हुज़ूर ने फ़रमाया ‘उसने किसी ज़िंदा दफ़न की हुई बच्ची को क़ब्र से निकाल कर ज़िंदगी बख़्शी। ज़माना-ए-जाहिलियत में बच्चियों को ज़िंदा दफ़न कर दिया जाता था। यानी ऐसे शख़्स ने जिसने किसी का कोई ऐब देखा और उसे छुपा दिया तो गोया के उसने बच्ची को दोबारा ज़िंदगी बख़्शी जिसे उस के रिश्तेदारों ने ज़िंदा ही मिट्टी में दबा दिया था।
ऐब छुपाने की फ़ज़ीलत
क़ारईन! ग़ौर कीजिए नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने एक शख़्स के ऐब छुपाने को एक ज़िंदा दफ़न की हुई बच्ची को बचाने के बराबर क़रार दिया। ज़माना-ए-जाहिलियत में लोग लड़कियों को ज़िंदा दफ़न कर देते थे ये इंतहाई वहशियाना और संगदिलाना फ़ेल था। आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम फ़र्माते हैं कि जब तुम किसी के ऐब को छुपाते हो तो दरअस्ल तुम उस की इज़्ज़त उस की आबरू उस की साख़ और उस के वक़ार को बचा लेते हो।
एक इंसान की इज़्ज़त और आबरू उस की इज्तिमाई ज़िंदगी की जान है। जिस तरह ज़िंदा दफ़न की हुई बच्ची को क़ब्र से निकालकर उसकी ज़िन्दगी बचाना है इसी तरह किसी की इज़्ज़त बचाना गोया के मुआशरे में उसकी सामाजिक ज़िंदगी बचाना है। और किसी का ऐब फ़ाश करना किसी की ख़ामी ज़ाहिर करना गोया के उसे मुआशरे में ज़लील ओ रुसवा करना है।
ऐब छुपाने के फ़वाइद और समरात
अब ज़रा इस अमल के इन्फ़िरादी व इज्तिमाई फ़वाइद पर एक नज़र डालते हैं।
जब लोग ये जान लें कि उन की कमज़ोरियाँ और ग़लतियाँ दूसरों के ज़रिए छुपाई जाएंगी न कि उछाली जाएंगी तो मुआशरे में बाहमी एतेमाद मुहब्बत और उख़ुव्वत की फिज़ा क़ायम होगी।
इसी तरह जब कोई शख़्स ये जानेगा कि उस की ख़ता को छुपाया गया है तो वो इस एहसान-मंदी के जज़्बे के तहत ख़ुद-ब-ख़ुद अपनी इस्लाह की तरफ़ माइल होगा। उस के बर-अक्स, अगर उसे रुसवा कर दिया गया तो वो ज़िद और बुग़्ज़ में और बिगड़ सकता है।
हदीस में है कि जो बंदा दुनिया में किसी के ऐब छुपाता है अल्लाह तआला क़यामत के दिन उस के ऐब छुपाएगा। ये अज्र ए अज़ीम है।
ऐब छुपाने की हुदूद व क़यूद
ये बात ज़ेहन में रहे कि ऐब छुपाना हर जगह मुतलक़न अच्छा नहीं है। बावजूद हालात में ऐब छुपाना जुर्म बन सकता है।
मिसाल के तौर पर अगर किसी का ऐब मुआशरे के लिए ख़तरा बन रहा हो (जैसे कोई मुजरिम या ज़ालिम) तो उस का पर्दा फ़ाश करना ज़रूरी है।
ऐसे ही अगर किसी के ऐब को छुपाने से किसी दूसरे का नुक़सान हो रहा हो (जैसे निकाह में तरफ़ैन को धोखा देना)।
ऐसे मुआमलात में मसलहत का तक़ाज़ा यही है कि मुनासिब अथॉरिटी को इत्तिला दी जाए न कि उसे अवामी सतह पर उछाला जाए।
ख़ुलासा ए कलाम
प्यारे भाइयो! इस हदीस मुबारका का ख़ुलासा ये है कि इस्लाम हमें ऐब-बीन बनने की बजाय ऐब-पोश बनने की तरग़ीब देता है। ये अमल हमें संगदिली ख़ुदग़रज़ी और बे-हसी से निकाल कर हसासियत हमदर्दी और ग़म-ख़्वारी का दर्स देता है।
आइए हम अहद करें कि हम अपनी ज़बान क़लम और अमल से किसी की इज़्ज़त को मजरूह नहीं करेंगे। अगर किसी की कोई कमज़ोरी नज़र आएगी तो उसे छुपाने की कोशिश करेंगे उसे फ़ाश करने की नहीं। हम दूसरों के ऐबो को ढांपेंगे ताकि अल्लाह तआला क़यामत के दिन हमारे ऐबो को ढांपे और हमें अपनी रहमत के साए में जगह अता फ़रमाए। अल्लाह तआला हमें इस अज़ीम हदीस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
