auliya ko madadgar kehna shirk nahi - औलिया अल्लाह मुश्किल कुशा और मददगार हैं

हमारा मक़सद हक आप तक पहुँचाना है और उन कम-इल्म भाइयों की इस्लाह करना है जो "औलिया अल्लाह की मदद" को शिर्क समझने लगे हैं। तो आइये मज़मून को पूरा पढ़ें.

अल्लाह तआला ने अपने ख़ास बन्दों को अपनी बारगाह में ख़ास मक़ाम अता फ़रमाया है।और अल्लाह तआला ने इन्हें ख़ास इख्तियारात तसर्रुफात और ताक़त अता फरमाई है मुसलमानों का हमेशा से यह अक़ीदा रहा है कि अल्लाह की अता से औलिया अल्लाह मुश्किल कुशा और मददगार हैं

इसी सिलसिले में, क़ुतुबे आलम, ग़ौसे आज़म, हज़रत शैख अब्दुल कादिर जीलानी (रज़ियल्लाहु अन्हु) को "मुश्किल कुशा" और "मददगार" मानना अहले-सुन्नत का अक़ीदा है। यह वो हस्ती हैं जिनका फ़ैज़ आज भी जारी है और जिनकी बारगाह में हाज़िरी देने वाले सदियों से अपनी मुरादें पाते रहे हैं।

हालाँकि, मौजूदा दौर में कुछ बद-अक़ीदा लोगों ने इस रौशन अक़ीदे पर एतराज़ उठाया है। उनका कहना है कि किसी को "मुश्किल कुशा" या "मददगार" कहना शिर्क और गुनाह है, और यह कि अल्लाह तआला के सिवा कोई ग़ौस नहीं। यह सोच रखने वाले लोग सिर्फ़ ज़ाहिरी अल्फ़ाज़ को पकड़ते हैं और हक़ीक़ी मआनी से ना-आशना हैं। वे इस बुनियादी फ़र्क़ को नहीं समझते कि अल्लाह तआला "हक़ीक़ी" मददगार है, जबकि उसके नेक बन्दे "मजाज़ी" मददगार हैं। अल्लाह की अता से मदद गार हैं

यह तंग-नज़री और सख़्तगीरी इस्लाम की रूह के ख़िलाफ़ है। हमारा यह मुख़्तसर मज़मून इसी मसले पर क़ुरआन-ओ-हदीस की रौशनी में हक़ बयान करने के लिए है। हम यह साबित करेंगे कि औलिया अल्लाह को मददगार कहना और मानना कोई शिर्क नहीं, बल्कि ख़ुद क़ुरआन पाक का हुक्म है। क़ुरआन मजीद में जगह-जगह अल्लाह तआला ने अपने रसूल और नेक बन्दों को भी "वली" और "मौला" फ़रमाया है।

हम इस मज़मून में क़ुरआनी आयात, ख़ास तौर पर सूरह अल-माइदा (आयत 55) और सूरह अत-तहरीम (आयत 4) की रौशनी में यह हक़ीक़त वाज़ेह करेंगे कि किस तरह अल्लाह तआला ने ख़ुद अपने प्यारे बन्दों को लोगों का मददगार क़रार दिया है।

हमारा मक़सद हक आप तक पहुँचाना है और उन कम-इल्म भाइयों की इस्लाह करना है जो "औलिया अल्लाह की मदद" को शिर्क समझने लगे हैं। तो आइये मज़मून को पूरा पढ़ें और यह जानें के औलिया ए किराम अल्लाह तआला की अता से मुश्किल कुशा हाजत रवा और मददगार हैं।

औलिया अल्लाह मुश्किल कुशा और मददगार हैं

कुछ बद अकीदा लोगों का यह अकीदा बातिल है कि इमामुल औलिया, ग़ौसुल आज़म हज़रत शैख अब्दुल कादिर जीलानी रज़ियल्लाहु अन्हु को मददगार नहीं कहना चाहिए, किसी को मुश्किल कुशा या मददगार कहना या समझना बद तरीन गुनाह और शिर्क है, अल्लाह तआला के सिवा कोई ग़ौस आज़म नहीं है।

जबकि क़ुरआन पाक में इरशादाते रब्बानी इस पर शाहिद व आदिल है कि औलिया किराम अलैहिमुर्रहमह अल्लाह तआला के हुक्म से मखलूक़े ख़ुदा की मदद फरमाते हैं। इस पर चंद दलीलें पेश हैं: इरशादे बारी तआला है:

अल्लाह तआला फरमाता है: तुम्हारा मददगार सिर्फ अल्लाह है और उसका रसूल है और वह ईमान वाले हैं जो नमाज़ क़ायम रखते हैं और ज़कात अदा करते हैं और अल्लाह के सामने आज़िज़ी से ) झुकने वाले हैं। (अल-माइदा: 55)

इस आयते करीमा में अल्लाह तआला और रसूल अक़रम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बाद उन ईमान वालों को भी मददगार कहा गया है जो नमाज़ क़ायम रखने वाले ज़कात अदा करने वाले और बारगाहे रब्बुल इज़्ज़त में आज़िज़ी व इन्किसारी के साथ झुकने वाले हैं। यह औलिया किराम की सिफत है तो गोया क़ुरआन पाक ने औलिया किराम को भी मददगार कहा है। ज़ाहिर है मददगार वही होता है जो मदद कर सकता है और जिससे मदद मांगी जा सकती हो।

दूसरे मक़ाम पर फरमाया: यानी पस बेशक अल्लाह तआला और जिब्रील और नेक मोमिन मददगार हैं। (अत-तहरीम)

इन आयाते क़ुरआनिया से यह हक़ीक़त अज़हर मिनश्शम्स होती है कि अल्लाह तआला जिन लोगों से भलाई बेहतरी और अच्छाई का इरादा फरमाता है उन्हें लोगों को मुश्किल कुशा और हाजत रवा बना देता है। भला अम्बिया किराम व मुरसलीन इज़ाम के बाद औलिया से बढ़ कर और कौन है जिसके साथ अल्लाह तआला भलाई का इरादा फरमा सकता है तो मालूम हुआ कि बंदगाने ख़ुदा और मुक़र्रबाने बारगाहे इलाही हाजत रवा और मुश्किल कुशा हैं और उनसे मदद मांगी जा सकती है।

मज़मून का ख़ुलासा

तो मालूम हुआ कि बंदगाने ख़ुदा और मुक़र्रबाने बारगाहे इलाही हाजत रवा और मुश्किल कुशा हैं और उनसे मदद माँगी जा सकती है।

यह कोई मन-गढ़ंत अक़ीदा नहीं, बल्कि ख़ुद क़ुरआन पाक की रौशन आयात से साबित हक़ीक़त है। सूरह अल-माइदा की आयत नंबर 55 में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है: "तुम्हारा मददगार सिर्फ़ अल्लाह है और उसका रसूल है और वह ईमान वाले हैं जो नमाज़ क़ायम रखते हैं और ज़कात अदा करते हैं और अल्लाह के सामने आजिज़ी से झुकने वाले हैं।" इस आयत में "वली" (मददगार) का लफ़्ज़ अल्लाह के लिए भी है, रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के लिए भी और उन ईमान वालों के लिए भी जो विलायत के दर्जे पर फ़ाइज़ हैं। इसी तरह सूरह अत-तहरीम की आयत नंबर 4 में फ़रमाया गया: "पस बेशक अल्लाह तआला और जिब्रील और नेक मोमिन मददगार हैं।" यहाँ जिब्रील (अलैहिस्सलाम) और सालेह मोमिनीन को मददगार क़रार दिया गया।

ज़रा ग़ौर कीजिए: अगर ग़ैरुल्लाह को मददगार कहना शिर्क होता तो अल्लाह तआला ख़ुद अपनी किताब में अपने रसूल, जिब्रील और नेक मोमिनों को मददगार क्यों फ़रमाता? यहाँ यह समझना बेहद ज़रूरी है कि "हक़ीक़ी" और "ज़ाती" मददगार सिर्फ़ अल्लाह तआला है।और औलिया ए किराम का मदद फरमाना यह अल्लाह की अता से है अल्लाह के इज़्न से है। औलिया अल्लाह तो अल्लाह तआला की अता किए हुए फ़ैज़ और क़ुदरत के मज़हर हैं। उनकी मदद दरअसल अल्लाह ही की दी हुई मदद होती है। जैसे डॉक्टर दवा देता है शिफ़ा देने वाला अल्लाह है; उस्ताद पढ़ाता है इल्म देने वाला अल्लाह है। इसी तरह वली मदद करता है मदद करने वाला अल्लाह है। औलिया अल्लाह मदद करते हैं अल्लाह की अता से।

बद-अक़ीदा लोग जो यह कहते हैं कि "अल्लाह के सिवा कोई ग़ौस आज़म नहीं" वो "ग़ौस" के मानी को नहीं समझते। "ग़ौस" का मतलब है "फ़रियाद रस" यानी मुसीबत के वक़्त मदद करने वाला। अल्लाह तआला के इज़्न से रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सदके से औलिया अल्लाह ग़ौस हैं। यह कोई शिर्क नहीं।

लिहाज़ा, हाजत रवा और मुश्किल कुशा जैसे अल्फ़ाज़ अगरचे बन्दों के लिए इस्तेमाल होते हैं, लेकिन उनका मफ़हूम यही है कि ये अल्लाह के मक़बूल बन्दे उसकी दी हुई ताक़त से लोगों की मदद फ़रमाते हैं। चुनाँचे, ग़ौस-ए-आज़म हज़रत शैख अब्दुल कादिर जीलानी (रज़ियल्लाहु अन्हु) को मुश्किल कुशा और मददगार कहना और मानना जाइज़ और क़ुरआन से साबित है, बल्कि यही अक़ीदा मुहब्बत और वफ़ा की निशानी है। अल्लाह तआला हम सबको सहीह अक़ीदे के साथ जीने और मरने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। (आमीन)

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