इस वक़्त तमाम दुनिया को दर पेश संगीन और तश्वीशनाक मसाइल में से एक मसला ग़ुर्बत है।आज हम इसी पर गुफ्तगू करेंगे के यानि बढती हुई ग़ुरबत की वजह और उसका हल
इस्लाम एक जामे और कामिल दीन है इसकी तालीमात जहां हर शोबाहाए ज़िंदगी में रहनुमाई फ़राहम करती हैं वहीं ग़ुर्बत की वुजूहात और उसका जामे हल भी पेश करती हैं।
दुनियावी ज़िन्दगी तंग
इरशाद बारी तआला है :
وَمَن أَعْرَضَ عَن ذِكْرِي فَإِنَّ لَه مَعِيشَةً ضَنكًا وَنَحْشُرُ يَومَ القِيمَةِ أَعْلَى (सूरह ताहा : 124)
तर्जुमा : और जो मेरी नसीहत से मुंह फेरेगा उसकी ज़िंदगी तंग हो जाएगी और क़ियामत के दिन हम उसे अंधा कर के उठाएंगे।
यानी जिसने अल्लाह तआला के अहकामात की तामील न की बल्कि नाफ़रमानी की तो उस पर दुनियावी ज़िंदगी तंग हो जाएगी। अब हम अपना जायज़ा लें तो हमने मजमूई तौर पर अल्लाह तआला के अहकामात पर अमल करना छोड़ दिया है, जिन चीज़ों को अल्लाह तआला ने हराम क़रार दिया है हम उन्हीं चीज़ों में मुबतला हैं। आज जो मुसलमानों में ग़ुर्बत की शरह में इज़ाफ़ा हो रहा है तो उसकी एक बड़ी वजह हमारे अपने आमाले बद हैं।
मुसीबतों का आने का सबब
इसी तरह क़ुरआन करीम में एक और मकाम पर इरशाद फ़रमाया:
وَمَا أَصَابَكُم مِّن مُّصِيبَةٍ فَبِمَا كَسَبَتْ أَيْدِيكُم (सूरह अश्शूरा : 30)
तर्जुमा : और तुम्हें जो मुसीबत पहुंचती है वह उसके सबब से है जो तुम्हारे हाथों ने कमाया।
इस आयत से भी यही मालूम होता है कि ग़ुर्बत जैसी मुसीबत का सबब अल्लाह तआला की नाफ़रमानी और गुनाहों में मुबतला होना है। अगर हम अल्लाह तआला की इताअत बजालाएं और अल्लाह तआला की नाफ़रमानी से बचें तो ग़ुर्बत और उसके जैसे दीगर मसाइब से महफ़ूज़ रह सकते हैं, जैसा कि इरशाद बारी तआला है:
وَمَن يَتَّقِ اللَّهَ يَجْعَل لَّهُ مَحْرَجًا ، وَيَرْزُقَهُ مِن حَيْثُ لَا يَحْتَسِبُ (सूरह अत-तलाक (2,3)
तर्जुमा : और जो अल्लाह से डरे अल्लाह उसके लिए निजात की राह निकाल देगा और उसे वहां से रिज़्क़ देगा जहां उसका गुमान न हो।
इस आयत में तक़वा इख्तियार करने को निजात और वुसअत रिज़्क़ का सबब बताया गया है जबकि उसके बर अक्स नाफ़रमानी और गुनाह का इर्तिकाब किल्लत रिज़्क़, ग़ुर्बत और ज़वाल नेअमत का सबब है।
अनाज का ज़ियाअ ग़ुर्बत की एक अहम वजह
जैसा कि मा क़ब्ल में मज़कूर है, नीज़ मज़कूरा असबाब के साथ साथ मुसलमानों में ग़ुर्बत की एक बड़ी और ज़ाहिरी वजह अनाज का ज़ियाअ भी है, लिहाज़ा इस सबब पर ग़ौर करना निहायत ज़रूरी है। अनाज की बे-क़दरी और बे-हुरमती से कौन सा घर खाली है, बंगले में रहने वाले अरबपति से लेकर झोंपड़ी में रहने वाले मज़दूर व मेहनतकश तक सब इस हवाले से ग़फ़लत और बे-एहतियाती का मुज़ाहिरा करते नज़र आते हैं, अनपढ़ तो अनपढ़, पढ़े लिखे तहज़ीब याफ़्ता लोग भी अनाज को ज़ाए करने से नहीं बचते।
दक्षिण एशिया के मुख्तलिफ़ ममालिक में गिज़ाई अज्नास के ज़ियाअ की फ़ी कस शरह 6 से 11 किलो है और इसमें दिन ब दिन इज़ाफ़ा होता जा रहा है, एक रिपोर्ट के मुताबिक 15 से 20 फ़ीसद खाना सिर्फ शादी ब्याह और इस क़िस्म की दीगर तक़रीबात में ज़ाए होता है।
नेअमतों की नाशुक्री और उसका नतीजा
इरशाद बारी तआला है :
وَضَرَبَ اللَّهُ مَثَلاً قَرْيَةً كَانَتْ آمِنَةً مُّطَمَئِنَّةً يَاتِيهَا رِرْقُهَا رَغَدًا مِّن كُلِّ مَكَانٍ فَكَفَرَت بِأَنْعُمِ اللَّهِ فَاذْقَهَا اللَّهُ لِبَاسَ الجُوعِ وَالخَوفِ بِمَا كَانُوا يَصْنَعُونَ (सूरह अन-नहल : 112)
तर्जुमा : और अल्लाह ने कहावत बयान फ़रमाई एक बस्ती की कि अमन व इत्मिनान से थी हर तरफ़ से उसकी रोज़ी कसरत से आती तो वह क़ौम अल्लाह की नेअमतों की नाशुक्री करने लगी तो अल्लाह ने उसे यह सज़ा चखाई कि उसे भूख और डर का पहनावा पहना या बदला उनके किए का।"
मुसलमानों की मौजूदा ग़ुर्बत को सामने रखते हुए इस आयत मुबारका के तर्जुमा को बार बार पढ़ें और ग़ौर करें तो साफ़ ज़ाहिर होता है कि हम भी उस बस्ती वालों की तरह अल्लाह तआला के अता करदा रिज़्क़ की नाशुक्री करते हुए उसे ज़ाए कर रहे हैं यही वजह है कि आज हम पर ग़ुर्बत और मुफ़लिसी की चादर ओढ़ा दी गई है।
हदीस की रोशनी में रिज़्क़ का एहतराम
अहादीस मुबारका से नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का एक फ़रमान यहां क़लम बंद कर रहा हूं जो गिज़ाई अज्नास की अहमियत को उजागर करता है और हमें अनाज की क़द्र करने की तरफ़ रागिब करता है?
उम्मुल मोमिनीन सय्यिदा आयशा सिद्दीका रज़िअल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं: नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम काशाना ए अक़दस में तशरीफ़ लाए, आपने रोटी का टुकड़ा ज़मीन पर पड़ा हुआ देखा, आपने उसे उठाया और पोंछ कर तनाउल फ़रमा लिया, फिर इरशाद फ़रमाया:
يا عَائِشَةُ! أَكْرِ مِيْ كَرِيمًا فَإِنَّهَا مَا نَفَرَتْ عَنْ قَوْمٍ قَطَ فَعَادَتِ إِلَيْهِمْ
तर्जुमा : ऐ आयशा अच्छी चीज़ (रिज़्क़) का एहतराम करो कि यह चीज़ जब किसी क़ौम से भागी है लौट कर नहीं आई। (इब्न माजह, हदीस: 3353)
नतीजा
काश कि हम अल्लाह तआला की इस अज़ीम नेअमत अनाज को ज़ाए करने से बचें कि जिसके फ़क़त एक टुकड़े की बे-हुरमती पर प्यारे आका सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने किल्लत अनाज की वईद सुनाई है। आज हम अपना जायज़ा लें कि हम कितनी बे-एहतियाती से रिज़्क़ को ज़ाए करते हैं यक़ीनन यही वजह है आज हमारी क़ौम से रिज़्क़ उठता हुआ नज़र आ रहा है, लिहाज़ा हमें अनाज जैसी अज़ीम नेअमत की खूब क़द्र करनी चाहिए। अगर हम अनाज की बे-हुरमती से बचने में कामयाब हो गए तो रिज़्क़ में ख़ैर व बरकत के इनआम से माला माल हो जाएंगे।
