मीलाद की खुशी मनाना सुन्नत ए हुज़ूर है | हदीस से साबित दलील

क्या मीलाद-उन-नबी मनाना सुन्नत है? जानिए सहीह मुस्लिम की हदीस की रौशनी में यौम-ए-मीलाद की खुशी मनाने का हुक्म।

जब रबी-उल-अव्वल का महीना आता है तो हर सच्चे आशिक़ ए रसूल का दिल मोहब्बत और अकीदत से झूम उठता है। गलियों में रौशनी होती है मस्जिदों में दरूद ओ सलाम की सदाएं बुलंद होती हैं और दिलों में एक अजीब सी रूहानी खुशी पैदा हो जाती है। और यह  उस अज़ीम हस्ती की याद होती है जिनकी आमद ने पूरी इंसानियत को अंधेरों से निकालकर रौशनी की राह दिखाई। आज कुछ लोग मीलाद शरीफ़ मनाने पर सवाल उठाते हैं लेकिन अगर हम क़ुरआन और हदीस की रौशनी में देखें तो हमें साफ़ मालूम होता है कि यह खुशी मनाना दरअसल मोहब्बत ए रसूल का इज़हार और सुन्नत पर अमल है।

हदीस ए पाक

عَنْ أَبِي قَتَادَةَ الْأَنْصَارِيِّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ: أَنَّ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ " سُئِلَ عَنْ صَوْمِ الاثْنَيْنِ ، فَقَالَ: " فِيهِ وُلِدْتُ، وَفِيهِ أُنْزِلَ عَلَى "( मुस्लिम शरीफ़ : किताब-उस-सियाम, हदीस नंबर : 2750 )

तर्जुमा: हज़रत सय्यिदना अबू क़तादा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से दोशंबा (सोमवार / पीर) के रोज़े के मुताल्लिक़ पूछा गया तो हुज़ूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने फ़रमाया: मैं उसी दिन पैदा हुआ और उसी दिन मुझ पर क़ुरआन नाज़िल किया गया।

शरह ए हदीस

अल्लाह के हबीब अलैहिस्सलातु वस्सलाम पीर के दिन रोज़ा रखा करते थे ख़ास उस दिन रोज़ा रखने की हिकमत व मसलहत के बारे में सहाबा ए किराम ने आपसे पूछा तो मोहसिन ए इंसानियत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: मैं उसी दिन पैदा हुआ और उसी दिन मुझ पर वही उतरी है।

प्यारे आक़ा अलैहिस्सलातु वस्सलाम के इस जवाब ने यौम ए मीलाद में ख़ुशी मनाने के जवाज़ को रोज़ ए रौशन की तरह अयां कर दिया। दुनियावी एतिबार से भी देखा जाए तो आज के दौर में यौमें पैदाइश को पूरी दुनिया में जश्न ए यौमें पैदाइश (बर्थडे पार्टी) के नाम से बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। जब आम इंसान की पैदाइश का दिन बाइस ए मसर्रत हो सकता है तो सय्यदुल अंबिया, इमामुलअंबिया वजह तख़लीक़ ए कायनात सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का यौमें  मीलाद (पैदाइश का दिन)मुबारक और पुर-मसर्रत क्यों नहीं हो सकता? यौमे मीलाद के मुबारक होने और यौमे मसर्रत होने में मुहिब्बाने मुस्तफ़ा को कोई शक ही नहीं इस लिए गुलामाने मुस्तफा बड़ी मोहब्बत और अक़ीदत से घर और गलियां सजाते हैं जुलूस निकालते हैं आमद ए मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर रब का शुक्र अदा करते हैं और ज़िंदादिली के साथ सरकार की आमद की ख़ुशी मनाते हैं।

ख़ाक हो जाएं अदू जल कर मगर हम तो रज़ा

दम में जब तक दम है ज़िक्र उन का सुनाते जाएंगे

हज़रत रज़ा बरेलवी

यौमें  मीलाद की मसर्रत

अल्लाह तआला ने अपने महबूब हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजा। आपकी ज़ात-ए-अक़दस की पैदाइश इंसानियत की तारीख़ का सबसे बेहतरीन और मुबारक दिन है। जब हम इस दिन को याद करते हैं तो हमारे दिलों में शुक्र और ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है। कुछ लोग यह सवाल उठाते हैं कि क्या ईद ए मीलाद उन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मनाना जायज़ है? क्या यह सुन्नत से साबित है? इसका जवाब ख़ुद सरकार ए दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने फ़ेल (काम) और अपने क़ौल (बात) से बहुत ख़ूबसूरती से दे दिया है। सहीह मुस्लिम की ऊपर मज़कूर हदीस ए पाक इस मसले में आफ़ताब की तरह रोशन है।

पीर के रोज़े की हिकमत सिर्फ़ इबादत नहीं शुक्राना ए पैदाइश भी

हदीस ए पाक के अल्फ़ाज़ पर ग़ौर करें तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से जब सहाबा ए किराम ने सवाल किया कि या रसूलल्लाह! आप पीर के दिन रोज़ा क्यों रखते हैं? तो आप यह फ़रमा सकते थे कि यह नफ़्ली रोज़ा है या इस दिन आमाल पेश किए जाते हैं। मगर आपने इरशाद फ़रमाया: فِيهِ وُلِدْتُ यानी उस दिन मेरी विलादत हुई।

इस जवाब में ग़ौरो फ़िक्र की दो बहुत बड़ी बातें पोशीदा हैं

1. जश्न ए पैदाइश का जवाज़: आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी विलादत के दिन रोज़ा रखा करते। और सहाबा के सवाल पर आपने यह नहीं फ़रमाया कि मैं इस दिन ग़म मनाता हूँ या इस दिन को याद करके अफ़सोस करता हूँ बल्कि आपने इस दिन अल्लाह की इबादत की जो ख़ुशी और शुक्र की बेहतरीन सूरत है। इससे साबित हुआ कि यौम ए विलादत पर शुक्र गुज़ारी और इबादत करना आपकी सुन्नत है।

2. ताल्लुक़ ए ख़ास: अगर यह सिर्फ़ एक आम दिन होता तो आप इसकी वजह अपनी पैदाइश को क्यों बताते? जब सहाबा ए किराम ने सवाल किया कि या रसूलल्लाह!आप पीर के दिन रोज़ा क्यों रखते हैं? आपने इरशाद फ़रमाया: فِيهِ وُلِدْتُ यानी उस दिन मेरी विलादत हुई। यह आपकी तरफ़ से उस दिन को  यौम ए मसर्रत (ख़ुशी का दिन) क़रार देने का ऐलान है।

 रोज़ा रखना एक सुन्नत खाना खिलाना और जुलूस शुक्र के मज़ाहिर हैं

बाज़ लोग यह कह सकते हैं कि हुज़ूर ने तो रोज़ा रखा था आजकल लोग जुलूस निकालते हैं और खाने खिलाते हैं। इस पर अर्ज़ यह है कि ख़ुशी के इज़हार के तरीक़े अलग-अलग हो सकते हैं मक़सद तो मोहब्बत और शुक्र है।

रोज़ा: रोज़ा अल्लाह के लिए भूका रहना है जो निहायत ख़ालिस इबादत है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह सुन्नत अदा की ताकि उम्मत जान ले कि इस दिन शुक्र ज़रूर करो चाहे रोज़े की सूरत में या नमाज़ की सूरत में।

चराग़ां और जुलूस: यह मोहब्बत का इज़हार है। हदीसों में आता है कि जब हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हिजरत करके मदीना तशरीफ़ लाए तो अहल ए मदीना ने हुज़ूर की शान में नात पढ़कर आपका इस्तक़बाल किया। आपने उन्हें मना नहीं फ़रमाया बल्कि उनकी मोहब्बत को पसंद फ़रमाया। आज जब हम आपके आमद की ख़ुशी में जुलूस निकालते हैं तो यह उसी मुहब्बत का इज़हार है।

खाना खिलाना:रोज़ा रखने पर अल्लाह के हाँ बहुत अज्र है लेकिन दूसरों को खाना खिलाना भी बहुत बड़ी नेकी है। अगर कोई शख़्स यौम-ए-मीलाद पर रोज़ा रखकर सुन्नत पर अमल करता है और कोई ख़ुशी में ग़रीबों और दोस्तों को खाना खिलाकर शुक्र अदा करता है तो दोनों ही अमल जाईज़ हैं।

दुनियावी मिसाल 

आज के ज़माने में अगर कोई आम इंसान अपना जन्मदिन मनाता है दोस्तों को दावत देता है तो इसे हर कोई एक मअक़ूल और फ़ितरी अमल समझता है। इंसानी फ़ितरत है कि वह ख़ुशी के मौक़ों पर शुक्र और इज़हार-ए-मसर्रत करता है। जब एक आम इंसान की आमद दुनिया में मसर्रत और जश्न का बाइस हो सकती है तो उस हस्ती की आमद जो रहमत ए आलम है जिसके तुफ़ैल हमें ईमान और कुरआन मिला उसकी विलादत का दिन कैसे अज़ीमतर और बाइस ए मसर्रत नहीं होगा? अल्लाह तआला ख़ुद कुरआन ए पाक में फ़रमाता है:قُلْ بِفَضْلِ اللّٰهِ وَبِرَحْمَتِهٖ فَبِذٰلِكَ فَلْيَفْرَحُوْا " तुम फरमाओ अल्लाह ही के फज़ल और उसी की रहमत और उसी पर चाहिए के ख़ुशी करें। (सूरह यूनुस, 58)

हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बड़ी रहमत और कोई नहीं। तो आपकी आमद  पर ख़ुशी मनाना क़ुरआनी हुक्म है।

ज़िक्र ए हबीब करते रहो

मीलाद उन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मनाना कोई नई बात या बिदअत नहीं है बल्कि यह दिल में बसी मोहब्बत का इज़हार है जिसकी दलील  हदीस ए पाक में मौजूद है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का यह फ़रमाना कि "मैं उस दिन पैदा हुआ" हमें यह तालीम देता है कि हमें इस दिन को ग़फ़लत में नहीं बल्कि शुक्र नात ओ मनक़बत और इबादत में गुज़ारना चाहिए।

ख़ातिमा

आख़िर में यही अर्ज़ है कि मीलाद शरीफ़ सिर्फ़ एक रस्म नहीं बल्कि ईमान की ताज़गी और मोहब्बत ए रसूल का इज़हार है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हम किस नबी के उम्मती हैं और हमें उनकी सुन्नतों पर कितना अमल करना चाहिए।

आइए, हम इस दिन को सिर्फ़ जश्न तक महदूद न रखें, बल्कि अपनी ज़िंदगी को भी सुन्नत-ए-मुस्तफ़ा के मुताबिक़ ढालने की कोशिश करें। दरूद-ओ-सलाम की कसरत करें, गरीबों की मदद करें, और अपने दिलों को मोहब्बत-ए-रसूल से रोशन रखें।

अल्लाह तआला हमें सच्ची मोहब्बत, सही समझ और अमल की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।

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