हालते जनाबत नापाकी में क़ुरआन मजीद पढ़ना और छूने का हुक्म

नापाकी की हालत में क़ुरआन पाक की तिलावत और उसे छूने का शरई हुक्म और कुरान को दुआ और ज़िक्र की नीयत से पढ़ना कैसा जानिए तफसील से

प्यारे इस्लामी भाइयो और बहनो! ना पाकी या जनाबत, हैज़ या निफ़ास की हालत में क्या हम क़ुरआन पाक को छू सकते हैं? क्या उसकी तिलावत कर सकते हैं? आइए इस निहायत अहम मसले को क़ुरआन और फ़िक्ह की रौशनी में तफ़सील से समझते हैं, और जानते हैं के हालते जनाबत में क़ुरआन करीम की तिलावत और उसे छू सकते हैं क्या।

नापाकी में कुरान की तिलावत और छूना हराम 

जिस शख़्स पर ग़ुस्ल वाजिब हो (जुनुबी) या औरत अय्याम-ए-मख़्सूसा (हैज़ व निफ़ास) में हो उन के लिए क़ुरआन करीम की तिलावत करना या उसे छूना शरअन नाजाइज़ व हराम है।

यानी अगर कोई आदमी जनाबत की हालत में है (जिस पर ग़ुस्ल फ़र्ज़ हो) या कोई औरत हैज़ या निफ़ास (बच्चे की जनन के बाद के दिनों) में हो तो ऐसे में उसके लिए क़ुरआन पाक को पढ़ना और उसे हाथ लगाना दोनों ही नाजाइज़ और हराम हैं।

तिलावत की मुमानियत

नापाकी की हालत में क़ुरआन पाक को देख कर पढ़ना या छुए बगैर ज़बानी तिलावत करना दोनों मनअ हैं। चाहे पूरी आयत पढ़ी जाए या आयत का कुछ हिस्सा असह क़ौल के मुताबिक ये हराम है।

और गहराई से सम्झें। कई लोग समझते हैं कि अगर वो क़ुरआन को छू नहीं रहे सिर्फ देख कर या ज़बानी पढ़ रहे हैं तो शायद जाइज़ हो। लेकिन नहीं नापाकी की हालत में क़ुरआन को देख कर पढ़ना (तिलावत करना) भी मना है। और बिना देखे सिर्फ ज़बानी पढ़ना भी मना है। चाहे आप पूरी आयत पढ़ें या आयत का आधा हिस्सा यह भी हराम है। ये बात फ़ुक़हा के असह (सबसे सही) क़ौल के मुताबिक है। क्योंकि तिलावत खुद क़ुरआन के साथ एक खास एहतिराम का तकाज़ा करती है और नापाकी की हालत में वो एहतिराम नहीं रहता।

दुआ व ज़िक्र की नियत से पढ़ना

अगर तिलावत की नियत न हो बल्कि दुआ सना या अल्लाह के ज़िक्र की नियत हो तो वो आयात जो दुआ पर मुश्तमिल हैं (मसलन : सूरतुल फ़ातिहा, आयतुल कुर्सी, या रब्बना आतिना ...) पढ़ना जाइज़ है। लेकिन अगर आपकी नीयत तिलावत (क़ुरआन पढ़ने) की नहीं है बल्कि आप दुआ करना चाह रहे हैं या अल्लाह की सना (तारीफ) बयान कर रहे हैं या ज़िक्र कर रहे हैं तो उन आयात को पढ़ने की इजाज़त है जो अपने आप में दुआ हैं। जैसे सूरतुल फ़ातिहा (जो पूरी दुआ है) आयतुल कुर्सी (जिसमें अल्लाह की बड़ाई है) या "रब्बना आतिना फ़िद्दुन्या हसनतन" वाली आयत। ये आप नापाकी की हालत में बिना हर्ज के पढ़ सकते हैं बशर्ते नीयत दुआ या ज़िक्र की हो तिलावत की न हो।

रोज़मर्रा के अज़कार में हर्ज नहीं

खाने से पहले बिस्मिल्लाह कहना ब-नियत-ए-ज़िक्र या छींक आने पर अल्हम्दु लिल्लाह कहना ब-नियत-ए-शुक्र नापाकी की हालत में भी बिल्कुल जाइज़ है और इसमें कोई हर्ज नहीं।

हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जो अल्फ़ाज़ हम बोलते हैं जैसे खाना खाने से पहले बिस्मिल्लाह कहना ज़िक्र की नीयत से या छींक आने पर अल्हम्दु लिल्लाह कहना शुक्र करने की नीयत से  ये सब नापाकी की हालत में भी जाइज़ हैं। इनमें कोई हर्ज नहीं। यह भी अल्लाह की रहमत है कि उसने हमें अपने ज़िक्र से महरूम नहीं किया चाहे हम किसी भी हालत में हों। बस याद रखें नीयत ज़िक्र और शुक्र की हो तिलावत की नहीं।

नापाक आदमी कुरान को नहीं छू सकता

अल्लाह तआला का इरशाद لَّا يَمَسُّهُ إِلَّا الْمُطَهَّرُونَ इस क़ुरआन को वही छूते हैं जो पाक हैं।

यह फ़रमान खुद अल्लाह का है सूरतुल वाक़ेया (आयत 79) में। तर्जुमा है  इस क़ुरआन को वही छूते हैं जो पाक होते हैं। यानी जिन पर ग़ुस्ल फ़र्ज़ न हो, और जो वुज़ू से हों। इस आयत से मालूम हुआ कि नापाक शख़्स का क़ुरआन को छूना दुरुस्त नहीं।

नापाक मर्द व औरत का कुरान पढ़ना हराम

नापाक मर्द व औरत जुनुबी, हाइज़ा, नुफसा के लिए क़ुरआन में से कुछ भी पढ़ना हराम है ख़्वाह वो एक मुकम्मल आयत हो या उससे कम। मगर ये कि उसका इरादा तिलावत-ए-क़ुरआन का न हो बल्कि ज़िक्र व शुक्र का हो (मसलन बिस्मिल्लाह या अल्हम्दु लिल्लाह कहना), तो उसमें कोई हर्ज नहीं। (अलफ़तावा अलहिंदिया, जिल्द 1, सफ़्हा 38) (सूरतुल वाक़िया, आयत: 79)

फ़िक़्ह की मोतबर किताब फ़तावा आलमगीरी (फ़तावा हिंदिया) के जिल्द 1, सफ़्हा 38 पर यही हुक्म मौजूद है। और वहाँ साफ लिखा है कि जुनुबी, हाइज़ा और नुफसा के लिए क़ुरआन में से कुछ भी पढ़ना हराम है, चाहे वह पूरी आयत हो या उससे कम (जैसे आयत का आधा हिस्सा)। हाँ, अगर उनकी नीयत तिलावत की नहीं बल्कि ज़िक्र और शुक्र की है  जैसे बिस्मिल्लाह या अल्हम्दु लिल्लाह कहना  तो उसमें कोई हर्ज नहीं। यही वही बात है जो ऊपर हमने बयान की।

मोबाइल पर तिलावत

जदीद फ़ुक़हा के मुताबिक, अगर मोबाइल की स्क्रीन पर क़ुरआन पाक खुला हो तो बे-वज़ू या नापाकी की हालत में स्क्रीन पर जहाँ क़ुरआनी अल्फ़ाज़ हों वहाँ हाथ लगाना जाइज़ नहीं, अलबत्ता स्क्रीन के ख़ाली हिस्सों को छू कर पेज बदला जा सकता है (मगर तिलावत फिर भी ज़बान से करना जुनुबी के लिए मनअ है)।

आजकल हम मोबाइल और टैबलेट पर क़ुरआन पढ़ते हैं। जदीद फ़ुक़हा ने इस बारे में तफसील से बताया है। अगर आप नापाकी की हालत में हैं और मोबाइल की स्क्रीन पर क़ुरआन पाक की आयतें खुली हुई हैं तो उन अल्फ़ाज़ पर हाथ रखना जाइज़ नहीं है। हाँ अगर स्क्रीन का कोई खाली हिस्सा है जहाँ कोई आयत नहीं लिखी तो उसे छू कर आप पेज बदल सकते हैं या ऐप बंद कर सकते हैं। लेकिन याद रखें तिलावत ज़बानी पढ़ना जुनुबी के लिए तब भी मना है चाहे मोबाइल पर हो या कागज़ पर।

कुरान की तालीम में रिआयत

वो ख़तालीम वातीन जो क़ुरआन पढ़ाती हैं वो नापाकी के अय्याम में तिलावत के बजाय लफ़्ज़ ब लफ़्ज़ (रवां के बगैर) टुकड़े कर के दे सकती हैं। उन बहनों के लिए ख़ुसूसी रहमत है जो क़ुरआन की तालीम (टीचिंग) देती हैं। अगर कोई औरत क़ुरआन पढ़ाने वाली है, और वो हैज़ या निफ़ास की हालत में है, तो वह तिलावत (रवाँ पढ़ने) के बजाय लफ़्ज़ ब लफ़्ज़ तोड़ कर बच्चों को सीखा सकती है। यानी बिना तरतील और तिलावत के अंदाज़ के, सिर्फ हिज्जे करवा सकती है, या बता सकती है कि ये लफ़्ज़ कैसे पढ़ा जाता है। यह तब जाइज़ है जब नीयत तालीम की हो, तिलावत की नहीं। ये ज़रूरी रिआयत है, ताकि तालीम का सिलसिला न रुके।

आखरी दुआ

या अल्लाह ! हमें क़ुरआन करीम की सच्ची अज़मत नसीब फरमा और हमें ज़ाहिरी व बातिनी पाकीज़गी के साथ ज़िंदगी गुज़ारने की तौफ़ीक़ अता फरमा। ऐ अल्लाह! हमें क़ुरआन की असली अज़मत (बड़ाई) समझने की तौफ़ीक़ दे। हमें ये नसीब फरमा कि हम ज़ाहिरी तौर पर भी पाक रहें (ग़ुस्ल, वुज़ू के साथ) और बातिनी तौर पर भी (गुनाहों और बुराइयों से पाक रहें)। हमें क़ुरआन का एहतिराम करने वाला बना। आमीन या रब्बल आलमीन!

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