आज हम एक ऐसी हदीस-ए-पाक का ज़िक्र करेंगे जिस में इंसान की ज़िंदगी की हक़ीक़त और इंसान के मरने के बाद उसके साथ क्या जाता है बताया गया है। तो आइए हदीस शरीफ को गौर से पढ़ें और जानें।
हदीस: हज़रत अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि सरकार-ए-दो-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया, मैय्यत के साथ तीन चीज़ें जाती हैं। दो वापस लौट आती हैं और एक उसके साथ रह जाती है। उसके साथ उसके अहल-ओ-अयाल, उसका माल और उसके आमाल जाते हैं। उसके अहल-ओ-अयाल और माल तो लौट आते हैं और उसके आमाल (साथ) रह जाते हैं। (बुख़ारी, मुस्लिम, मिश्कात किताब-अल-रिक़ाक़)
हदीस की तशरीह और तफ़्सीली तोज़ीह
सरकार-ए-दो-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस हदीस में इंसान की ज़िंदगी के बाद के उस सफ़र के बारे में बताया है जो हर एक को तय करना है। यह हदीस उस वक़्त की कैफ़ियत बयान कर रही है जब एक शख़्स का जनाज़ा घर से उठता है और वह क़ब्रिस्तान की तरफ़ रवाना होता है।
मैय्यत के पीछे क्या क्या जाता है
हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) फ़रमाते हैं कि मैय्यत के साथ तीन चीज़ें जाती हैं। इसका मतलब यह है कि जब इंसान का वक़्त पूरा हो जाता है और मल्कुल मौत उसकी रूह क़ब्ज़ कर लेते हैं, तो उसे तजहीज़-ओ-तकफ़ीन (ग़ुस्ल और कफ़न) के बाद आख़िरी बार उसके घर से उठाया जाता है। जनाज़े के पीछे चलने वाली ये तीन शैय (चीज़ें) हक़ीक़तन उसके साथ क़ब्रिस्तान तक जाती हैं:
1. उसके अहल-ओ-अयाल: यानी उसके घर वाले बाप, बच्चे भाई और रिश्तेदार वगैरह। ये सब रोते-ग़मज़दा, जनाज़े के साथ जाते हैं।
2. उसका माल: इससे मुराद सिर्फ़ रुपया-पैसा या ज़मीन-जायदाद नहीं, बल्कि वह तमाम सामान है, वह तमाम माल जिसे अल्लाह ने उसे दिया था।
3. उसके आमाल: यानी वह अच्छे और बुरे काम जो उसने अपनी ज़िंदगी में किए।
दो चीज़ों का लौट आना
फिर हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने बयान फ़रमाया कि "दो वापस लौट आती हैं।
अहल-ओ-अयाल का लौटना: क़ब्र पर मिट्टी डालने के बाद, मय्यत के अहलो अयाल सब के सब अपने-अपने घरों को वापस लौट आते हैं। वह लोग जो कल तक हर सांस पर निसार थे, वह बेटा जिसके लिए उम्र भर कमाया, वह वापस घर चला जाता है और कुछ ही दिनों में अपनी मशगूलियत में लग जाता है। वह मैय्यत को क़ब्र की तन्हाई और तारीकी में अकेला छोड़ कर लौट आते हैं।
माल का लौटना: जो रुपया-पैसा बैंक में था, जो जायदाद थी, जो कारोबार था, वह सब वारिसों में तक़सीम हो गया या दुनिया में ही रह गया। यहां तक कि जो अच्छा कफ़न दिया गया, वह भी मिट्टी के हवाले होकर ख़ाक हो जाएगा। माल का कोई ज़र्रा भी इंसान के साथ क़ब्र के अंदर नहीं जाता, सिवाय उस माल के जिसे उसने अल्लाह की राह में ख़र्च किया हो।
आमाल का साथ रह जाना
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: "और उसके आमाल (साथ) रह जाते हैं।
जो चीज़ दफ़्न के बाद भी मैय्यत के साथ रहती है, वह उसके आमाल हैं। जब क़ब्र की मिट्टी हमारे ऊपर डाल दी जाएगी और सब लौट जाएंगे, उस वक़्त हमारा हम-नशीं, हमारा साथी और हमारा अनिस-ओ-मुनीस सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारे आमाल होंगे। वह नेकियां या बदियां, जो हम करके दुनिया में छोड़ आए थे, वह एक मुजस्सम शक्ल इख़्तियार करके हमारे साथ क़ब्र में जाएंगी।
क़ब्र जन्नत का बाग़ या जहन्नम का गढ़ा
हदीस-ए-पाक में फ़रमाया गया कि: अगर आमाल अच्छे हैं तो मैय्यत की क़ब्र जन्नत का बाग़ बन जाती है, वरना जहन्नम का गढ़ा। क़ब्र आख़िरत की पहली मंज़िल है।
जो शख़्स नमाज़ का पाबंद रहा, क़ुरआन की तिलावत करता रहा, मां-बाप का फ़रमांबरदार रहा, लोगों को तकलीफ़ नहीं दी और अल्लाह से डरता रहा, तो उसकी क़ब्र जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बन जाएगी, जहां उसे राहत और सुकून मिलेगा।
नेक आमाल का तसव्वुर
नेक आमाल सिर्फ़ नमाज़-रोज़ा ही नहीं, बल्कि हर वह काम है जो अल्लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ख़ुशनूदी के लिए किया जाए। किसी यतीम के सर पर हाथ फेरना, किसी भूखे को खाना खिलाना, रास्ते से तकलीफ़देह चीज़ हटाना, पानी पिलाना, किसी की मदद करना, ये सब नेक आमाल हैं जिससे हमारी अँधेरी क़ब्र रौशन होंगी और नेक आमाल हमारा साथ देंगे, हमारी मदद करेंगे।
हमारी ज़िम्मेदारी और कौशिश क्या हो
इस लिए हमारी यह कोशिश होनी चाहिए कि हम दुनिया में नेक आमाल करें ताकि क़ब्र में परेशानी न हो।
ऐ ईमान वालो! यह हदीस हमें ग़फ़लत की नींद से जगाने के लिए काफ़ी है। हम दिन-रात माल जमा करने और अहल-ओ-अयाल के लिए महल बनाने की फ़िक्र में लगे रहते हैं, जबकि हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने साफ़ फ़रमा दिया कि ये दोनों ही तुम्हारे काम नहीं आएंगे। ये दोनों लौट आएंगे।
हमें अपनी ज़िंदगी का हर लम्हा "आमाल-ए-सालेहा" यानी नेक कामों की पूंजी इकट्ठी करने में गुज़ारना चाहिए। हमें सोचना चाहिए कि कल जब हम इस दुनिया से रुख़्सत होंगे, तो हमारे साथ क़ब्र में सिर्फ़ हमारी नमाज़ें, हमारे रोज़े, हमारी सदक़ा-ए-जारिया और हमारा इल्म-ए-नाफ़ेअ और हमारे नेक आमाल ही जाएंगे। तो दोस्तों तौबा करें, अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी मांगें और यह अज़्म करें कि आज के बाद कोई ऐसा अमल नहीं करेंगे जो हमारी क़ब्र को जहन्नम का गढ़ा बनाने का सबब बने।
इख़्तिताम
ऐ अल्लाह! हम सब के गुनाहों को बख़्श दे। हमें नेक आमाल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा। हमारी क़ब्रों को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना और हमें क़ब्र के अज़ाब और फ़ित्ने से महफ़ूज़ रख।
