अल्लाह तआला ने इंसान को बेशुमार नेमतों से नवाज़ा है, जिन्हें इंसान अगर अपनी पूरी ज़िन्दगी भी शुमार करता रहे, गिनता रहे। तो शुमार नहीं कर सकता, गिन नहीं सकता। सेहत, तंदरुस्ती, इस्लाम, ईमान, अमन, रिज़्क़, घर, औलाद, वालदैन, दोस्त, अहबाब, वक़्त, अक्ल, शऊर, और ज़िन्दगी की बेशुमार छोटी बड़ी सहुलतें, यह सब अल्लाह तआला की अता कर्दा नेमतें हैं।
अल्लाह की नेअमतें बेहिसाब हैं
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने इंसान को अपनी बेशुमार नेमतों से नवाज़ा है। कुरान मजीद में इरशाद-ए-बारी तआला है, "وإن تعدوا نعمت الله لا تحصوها" यानी अगर तुम अल्लाह की नेमतों को गिनना चाहो तो नहीं गिन सकते। (सूरह इब्राहीम: 34)।
यह आयत हमारे सामने एक आइना रखती है। सोचिए! क्या हमने कभी दिल पर हाथ रखकर सच्चाई से अपने आपसे यह सवाल किया है, कि हम अपने खालिक़ ओ मालिक के कितने शुक्रगुज़ार बन्दे हैं?
हमारी आँखें देख रही हैं, बिनाई से महरूम नहीं, हमारी ज़बान गोयाई की नेअमत से बेहरावर है, दिल मुसलसल धड़क रहा है, साँसों का निज़ाम बिला किसी खलल के जारी है, हाथ पावं सलामत हैं, अक्ल व शऊर काम कर रहे हैं, और सबसे बढ़कर ईमान और इस्लाम की दौलत हमें अता की गई है, घर में रहने की जगह है, और खाने पीने का सामान मौजूद है, यह सब नेअमतें हैं।
इसके अलावा ऐसी भी अनगिनत नेअमतें हैं, जिनका हमें पता तक नहीं चलता। किसी बीमारी से बच जाना, किसी मुम्किना हादसे से महफूज़ रहना, किसी फितने से बच निकलना, किसी मुसीबत का हम तक पहुँचने से पहले टल जाना, प्यास की शिद्दत में पानी का मयस्सर आजाना, भूक के वक़्त खाने का दस्तयाब हो जाना, यह सब ऐसी नेअमतें हैं जिन्हें हम महसूस तक नहीं कर पाते, मगर अल्लाह तआला मुसलसल अता करता जा रहा है। अगर हम हर रोज़ हर लम्हा एक-एक नेअमत को गिनने लगें, तो गिनते गिनते थक जाएँगे, लेकिन नेअमतें ख़त्म न होंगी।लेकिन इन बेशुमार नेमतों के बावजूद भी इंसान की जुबान में शिकवा, शिकायत और ना शुक्री के कलमात होते हैं।
इंसान की ना शुक्री
अल्लाह तआला फरमाता है: إن الإنسان لظلوم كفار यानी बेशक इंसान बड़ा ही ज़ालिम और नाशुक्रा है। वह ज़ुल्म करता है अपनी जान पर, ना फ़रमानी करता है अपने परवरदिगार की, और शुक्र करने के बजाए, हमेशा शिकवा शिकायत में मुब्तिला रहता है, हर नेमत पाकर भी उसकी ज़ुबान पर और चाहिए का विर्द रहता है, हर आशाइश मिलने के बावजूद उसके दिल में बेचैनी और इज़्तिराब बरपा रहता है, और वह हर वक़्त मज़ीद की हवस में गिरफ्तार रहता है।
हकीकी दुनियावी खुशहाली
जब इंसान उन अज़ीम नेमतों पर गौर करता है, जो उसे हर सुबह आँख खुलते ही बगैर किसी कीमत के मिल जाती हैं, तो यकीन कीजिये के उसके कदम खुद ब खुद रुक जाते हैं, आँखें नम हो जाती हैं और दिल से बे साख्ता आवाज़ निकलती है या अल्लाह में कितना गाफिल था, कितना बे खबर था कितना ना शुक्रा था।
हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस हकीकत को कितने सादा मगर कितने गहरे और जामे अलफ़ाज़ में बयान फरमाया है, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद मुबारक है, "जिस शख्स ने इस हालत में सुबह की के वह अपने घर व इलाक़े में अमन व सुकून से रह रहा हो, जिस्मानी तौर पर तंदरुस्त और सेहत मंद हो, और उसके पास उस दिन की खुराक यानी एक दिन का खाना मौजूद हो, तो गोया उसके लिए पूरी दुनिया समेट दी गई। (अल-मुफरद, हदीस नं. 300)
इस हदीस पाक में दुनिया की कामयाबी और खुशहाली का जो मैयार बताया गया है, वह कितना आसान और जामे है, न कोई बँगला, न बैंक में करोड़ों का बैलेंस, न कोई कीमती और लक्ज़री गाड़ी, और न ही शाहाना ऐश ओ आराम, बल्कि सिर्फ तीन चीज़ें। पहली चीज़ यह कि घर में खौफ, फितना, लड़ाई-झगड़ा न हो, यानी घर में अमन हो। दूसरी चीज़ यह कि इंसान अपने पांव में खड़ा हो, सांस ले सके, और चल फिर सके, यानी जिस्मानी तौर पर सेहतमंद हो। तीसरी चीज़ यह कि उस दिन की भूक मिटाने के लिए खाना मौजूद हो, घर में आटा व राशन मयस्सर हो, यानी एक दिन का खाना मौजूद हो।
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान-ए-आलिशान है, जिसे यह तीनों चीज़ें मिल जाएँ, तो गोया उसे सारी दुनिया मिल गई।
आज के दौर का अलमिया
आज का इंसान नेमतों के समंदर में डूबा हुआ है, नेअमतें ही नेअमतें हैं, मगर फिर भी उसके दिल में क़नाअत और सुकून का क़हत है। दिल बेचैन है, ज़बान पर शिकायत है। अच्छा घर है, मगर बड़ा घर चाहिए। खाना मौजूद है, मगर और बेहतर खाना चाहिए। मोबाइल है, लेकिन नया मॉडल चाहिए। रोज़गार है, पर आमदनी और ज़्यादा चाहिए। एक ख्वाहिश पूरी होती है तो दूसरी खड़ी हो जाती है। यही लगातार बढ़ती हुई ख्वाहिश इंसान से उसकी मौजूदा नेमतों की कद्र और अहसास छीन लेती है।
हमें गौर-ओ-फ़िक्र करना चाहिए और सोचना चाहिए कि, मैं जो सांस ले रहा हूँ यह भी नेअमत है, मेरे दोनों पावं सलामत हैं और में चल रहा हूँ, यह भी नेअमत है। मेरे पास खाने को खाना है, यह भी नेअमत है। मेरे पास घर है, घर में बच्चे हैं, उनकी मुस्कुराहट है, वालिद वाल्दा का साया है, यह कितनी बड़ी नेअमतें हैं। जब इंसान इस तरह सोचेगा, तो उसकी ज़ुबान पर शिकायत नहीं, बल्कि शुक्र होगा।
असल खुशकिस्मती चार चीज़ों में
हमें गौर-ओ-फ़िक्र की तौफ़ीक़ मिले तो हम जान लेंगे कि हकीकी खुशकिस्मती और सआदत ज़ाहिरी दौलत, ओहदे, शोहरत में नहीं है। बल्कि हकीकी खुशकिस्मती वह है, जिसे हुज़ूर रहमत-ए-आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने चार सादा मगर इन्तेहाई अहम नेमतों में समेट दिया है। रहमत-ए-आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है कि चार चीज़ें आदमी की खुशनसीबी और सआदत की अलामत हैं:
2. उसकी औलाद नेक और फ़रमाबरदार हो।
3. उसके मेल जोल के साथी और दोस्त अहबाब नेक चलन और अच्छे किरदार के हामिल हों।
4. उसकी रोज़ी उसका रिज़्क, और उसकी मुलाज़मत उसी जगह या शहर में हो जहां वह खुद रहता हो। (जामेउल अहादीस 3088)
इस हदीस मुबारक से मालूम हुआ कि असल खुशहाली सिर्फ बैंक बैलेंस से नहीं है। बल्कि अगर घर में नेक बीवी है, और घर में नेक और मुहब्बत करने वाले लोग हैं, औलाद नेक व सालेह हो, अच्छी हो, दोस्त नेक हों, और इंसान को अपने परिवार के पास रहकर हलाल रोज़गार हासिल हो, तो यही चीज़ें खुशकिस्मती और खुशनसीबी की अलामत हैं और यह अल्लाह की बहुत बड़ी नेअमतें हैं।
अपने शहर में रोज़गार भी एक नेमत है
आज बहुत से लोग रोज़गार की तलाश में अपना घर, शहर और कभी-कभी अपना मुल्क भी छोड़ देते हैं। रोज़गार हासिल करना अपनी जगह ज़रूरी है, लेकिन अगर किसी इंसान को अपने ही शहर में अपने घर के ही करीब हलाल और ब-कद्र-ए-किफायत रोज़गार मिल जाए और वह अपने वालिद-वाल्दा, बीवी-बच्चों और परिवार के साथ रह सके तो यह खुशनसीबी की अलामत है और यह बड़ी नेमत है।
हज़रत वहब बिन मुनब्बिह रहमतुल्लाह अलैह से मर्वी है की एक साइल ने हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के दरवाज़े पर आवाज़ दी, सदा लगाई के ए अहले-बैत-ए-नुबुव्वत, ए सर-चश्मा-ए-रिसालत वालों, मुझपर कुछ सदका कीजिये अल्लाह आपको और आपके घर वालों को मुकीम ताजिर जैसा रिज़्क अता फरमाए। हज़रत दावूद अलैहिस्सलाम ने फरमाया, "इसे दो" उस ज़ात की क़सम जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है। ज़बूर में भी यही लिखा है। (हिल्यतुल ओलिया 4/63)
इस रिवायत से यह बात मालूम हुई की इंसान को ऐसा रोज़गार मिलना, मुलाज़मत मिलना, जिसमें वह अपने घर और अपने परिवार के पास रह सके यह बड़ी सआदत की बात है और यह बड़ी नेअमत है।
क़नाअत बेहतरीन दौलत
शुक्रगुज़ार बंदा दुनिया का सबसे ग़नी इंसान होता है, और न शुक्रा सबसे बड़ा फकीर! आजके इस दौर-ए-हिर्स-ओ-हवस में लोग कामयाबी को दौलत, शोहरत, ओहदा और मुआशरती हैसियत में तलाश करते हैं, लेकिन रब के महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फलाह और कामयाबी का जो मैयार हमें सिखाया, वह इन सब दुनियावी ज़ाहिरी चीज़ों से यक्सर मुख्तलिफ है। नबी करीम सलाल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: वह शख्स कामयाब हो गया इस दुनिया में भी और आखिरत में भी, क्यूंकि फलाह का मतलब ही दोनों जहानों की कामयाबी है। कौन कामयाब हुआ? फरमाया: जो इस्लाम लाया, और जिसे बक़द्र किफायत रोज़ी मिली, और अल्लाह ने उसे जो दिया उस पर क़नाअत करने की तौफीक भी अता फरमाई" (सहीह मुस्लिम: 1054)
क़नाअत ही वह दौलत है जिससे दिल को सुकून मिलता है, रात की नींद मीठी होती है, और ज़िन्दगी सादा मगर बाबरकत गुज़रती है। लेकिन आज का इंसान क़नाअत को छोड़कर हिर्स और लालच के पीछे भाग रहा है। नतीजा क्या निकल रहा है? दिल से सुकून गायब है, रिज़्क़ से बरकत खत्म होती जा रही है, और चेहरे पर हर वक़्त बेचैनी और तनाव के आसार नुमाया हैं। क़नाअत का मतलब सिर्फ कम पर गुज़ारा करना नहीं है, बल्कि अल्लाह की अता कर्दा नेमतों पर दिल से राज़ी और खुश होना है। और जो बन्दा रब की तकसीम पर राज़ी हो जाता है, अल्लाह पाक उसे गिना से नवाज़ता है। रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है: "अल्लाह के दिए पर राज़ी हो जाओ, तुम सबसे ज़्यादा मालदार हो जाओगे" (जामे तिरमिज़ी)
ठंडा पानी भी अल्लाह की नेअमत है
यही पैगाम हमें सीरत-ए-सहाबा किराम रज़ीअल्लाहु अन्हुम से भी मिलता है। जब कुरान मजीद की यह आयत नाज़िल हुई की " तुमसे उस दिन नेमतों के बारे में ज़रूर पूछा जाएगा" तो सहाबा किराम ने अर्ज़ की: या रसूलल्लाह हमसे किस नेअमत के बारे में पूछा जाएगा? हम तो सिर्फ आधे पेट जौ की रोटी खाते हैं। इस पर वही नाज़िल हुई, "क्या तुम जूते नहीं पहनते, क्या तुम ठंडा पानी नहीं पीते, यह सब भी अल्लाह की नेमतों में से हैं"। (अद-दुर्र अल-मंसूर 613/8)
गोया नेमत का ताल्लुक मिकदार और तादाद से नहीं है, बल्कि इसका ताल्लुक शऊर और शुक्र से है। अगर दिल राज़ी बारज़ा हो तो थोड़ी सी रोटी भी सुकून और लज़्ज़त देती है, और अगर दिल ना शुक्रा हो तो शाही दस्तरख्वान पर भी बेचैनी और बेसुकूनी का राज रहता है।
नतीजा शुक्रगुज़ार बन्दा बनें
अल्लाह तआला की नेअमतें बेशुमार हैं, उनका शुमार करना इन्सान के बस में नहीं। लेकिन अफ़सोस कि इंसान इन नेमतों को भूलकर ना शुक्री और हिर्स में मुब्तिला हो गया है। हमें चाहिए के अल्लाह की अता करदा नेमतों का शुक्र अदा करें, जो शुक्र अदा करता है, अल्लाह उसे और ज़्यादा अता फरमाता है। अल्लाह तआला हमें नेमतों की कद्र करने वाला शुक्र गुज़ार बन्दा बनाए, हमें क़नाअत की दौलत अता फरमाए, और ना शुक्री, हिरस और बे सबरी से महफूज़ रखे।
