आज के दौर में जब हमारी ज़िंदगियाँ सोशल मीडिया के जल्वों में ढल रही हैं, तो ऐसे वक़्त में ज़रुरत है के एक ऐसा मौज़ू जिस पर हमें शिद्दत से ग़ौर करने की ज़रूरत है और वह है "रिया कारी" का वबाल। आइए, सबसे पहले हदीस मुबारक पढ़ते हैं जिस में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रिया कारी का जो नुकसान है और जो उसकी सज़ा है ब्यान फरमाई है।
हदीस मुबारक और उसका पैग़ाम
हदीस का मतन और तर्जुमा: हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
"مَنْ سَمَّعَ النَّاسَ بِعَمَلِهِ ، سَمَّعَ اللهُ بِهِ سَامِعَ خَلْقِهِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ، وَحَقَّرَهُ وَصَغَرَهُ"
(मुस्नद अहमद: 6986, तबरानी: अल-मुजम उल-कबीर — सहीह)
तर्जुमा: जो शख़्स लोगों को सुनाने (शोहरत पाने) के लिए कोई अमल करता है, अल्लाह तआला क़यामत के दिन अपनी मख़लूक़ के कानों तक उस की (बदनीयती) पहुँचा देगा, फिर उसे ज़लील और रुसवा करेगा।
तस्मीअ का मफ़्हूम सुनाने की बीमारी
तस्मीअ क्या चीज़ है? तस्मीअ का मतलब है अपनी नेकी और इबादत का चर्चा करना लोगों को बताना कि देखो मैं कितना नमाज़ी हूँ कितना रोज़ादार हूँ कितना सदक़ा करने वाला हूँ। और यह सब बताने का मक़सद होता है कि लोग तारीफ़ करें वाह वाह करें और मुझे नेक समझें। लेकिन याद रखिए! ये रिया कारी ही की एक ख़तरनाक क़िस्म है जिसका ताल्लुक़ दिल की ख़राबी से है।
अमल का बदला जैसी करनी वैसी भरनी
दुनिया में ये शख़्स चाहता था कि लोग उसकी तारीफ़ सुनें उसकी नेकियों की धूम मचे। लेकिन आख़िरत में क़यामत के रोज़ अल्लाह उसको तमाम मख़्लूक़ के सामने ज़लील व रुसवा कर देगा। हर कोई जान लेगा कि ये शख़्स दिखावे के लिए अमल करता था। सोचिये जहाँ सारी मखलूक जमा होगी वहाँ ये रियाकार शख़्स का हाल क्या होगा अल्लाह की पनाह।
इख़्लास की अहमियत
भाइयो और बहनो! नेकी की क़बूलियत की पहली और सबसे अहम शर्त इख़्लास है। यानी अमल सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा के लिए हो। अगर कोई अमल अल्लाह के लिए नहीं, बल्कि लोगों को दिखाने के लिए है, तो उसका कोई अज्र नहीं। बल्कि ये अमल इंसान के लिए अज़ाब का सबब बन जाएगा।
अल्लाह तआला क़ुरआन में फ़रमाता है:
"فَمَنْ كَانَ يَرْجُو لِقَاءَ رَبِّهِ فَلْيَعْمَلْ عَمَلًا صَالِحًا وَلَا يُشْرِكْ بِعِبَادَةِ رَبِّهِ أَحَدًا"
(अल-कहफ़: 110)
तर्जुमा: जो शख़्स अपने रब की मुलाक़ात की उम्मीद रखता हो, उसे चाहिए कि नेक अमल करे और अपने रब की इबादत में किसी को शरीक न करे।
आज का डिजिटल दौर
जब हम अपने आसपास देखते हैं तो फेसबुक इंस्टाग्राम और यूट्यूब वगैरह पर व्यूज़, लाइक्स, शेयर्स और सब्सक्राइबर्स की दौड़ ने इख़्लास को किस तरह निगल लिया है? ज़रा तवज्जो की बात है और सोचने वाली बात है के कितनी बार हमने इबादत की वीडियो बनाई या सदक़े की तस्वीर इंस्टाग्राम पर लगाई या नमाज़ की स्टोरीज़ लगाईं? क्या वाक़ई दिल में अल्लाह की रज़ा थी या लोगों की तवज्जो हासिल करने की चाहत थी सोचने की बात है! अगर हमारी नमाज़, रोज़ा, तिलावत, सदक़ा, हज सब में कहीं न कहीं "दिखावे" का जुज़ शामिल हो गया तो वो अमल आख़िरत में हमारे लिए बजाए निजात के रुसवाई का सामान बन जाएगा।
रिया कारी से बचने के चंद राहनुमा उसूल
सबसे पहले नियत की इस्लाह कर लें यानी हर अमल से पहले दिल में ये अज़्म कर लें कि मैं ये जो नेक काम कर रहा हूँ सिर्फ़ अल्लाह के लिए कर रहा हूँ। अल्लाह की रज़ा के लिए कर रहा हूँ। इसी तरह जितना मुमकिन हो, सदक़ा, नवाफ़िल, तिलावत को पोशीदा रखें। और सोशल मीडिया पर इस बात का ख़याल रखें के जब आप अगर कोई इस्लामी पोस्ट करनी हो तो नियत को दुरुस्त करलें और देखें मकसद क्या है लोगों को तालीम देना या ख़ुदनुमाई और यह बहुत ज़रूरी है के सोने से पहले सुबह से लेकर रात के किये हुए आमाल का जाइज़ा लें कि अगर आज कोई अमल रिया से आलूदा हो गया है तो तौबा करें।
ख़ुलासा ए कलाम
याद रखिए! वो अमल जिस में ज़र्रा भर रिया हो, अल्लाह के हाँ क़बूलियत से महरूम है। नुमाइश के लिए की गई इबादत, में कोई अजर और सवाब नहीं हैं लिहाज़ा अपने अन्दर इखलास पैदा करें और रिया व नमूद से बचें यही कामयाबी है।
दुआ
ऐ अल्लाह! हमें रिया कारी और दिखावे की इस ख़तरनाक आफ़त से बचा ले। हमारे दिलों में अपनी मुहब्बत और अपनी रज़ा की चाशनी डाल दे। हमारे तमाम नेक अमल को क़बूल फ़रमा। हमें दुनिया में भी इज़्ज़त दे और आख़िरत में भी सरख़रू कर। आमीन या रब्बल आलमीन!
